एकपक्षीय भरण-पोषण आदेश के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट में रिविजन नहीं, धारा 145(2) BNSS के तहत फैमिली कोर्ट जाना अनिवार्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि फैमिली कोर्ट द्वारा भरण-पोषण का कोई एकपक्षीय (ex-parte) आदेश पारित किया गया है, तो उसके खिलाफ सीधे क्रिमिनल रिविजन दाखिल नहीं किया जा सकता। जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी की एकल पीठ ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 145(2) के तहत ऐसे आदेश को वापस लेने (recall) का प्रभावी वैकल्पिक उपचार उपलब्ध है, इसलिए रिविजन पोषणीय (maintainable) नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला झांसी की फैमिली कोर्ट द्वारा 20 अगस्त 2025 को पारित एक आदेश से जुड़ा है। झांसी के प्रिंसिपल जज ने BNSS की धारा 144 (जो पूर्ववर्ती CrPC की धारा 125 के समान है) के तहत सुनवाई करते हुए रिविजनकर्ता (पति), जो कि वायुसेना के सेवानिवृत्त कर्मी हैं, को अपनी पत्नी को ₹30,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। रिविजनकर्ता का तर्क था कि यह आदेश उनकी अनुपस्थिति में एकपक्षीय रूप से पारित किया गया और उन्हें इसकी जानकारी जनवरी 2026 में हुई। इसी आदेश को रद्द करने के लिए उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

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पक्षों के तर्क

रिविजनकर्ता के वकील ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट ने उन्हें सुनवाई का उचित अवसर दिए बिना ही आदेश पारित कर दिया। यह भी तर्क दिया गया कि कोर्ट ने उनकी आय का सही आकलन नहीं किया और ₹30,000 की राशि अत्यधिक है, क्योंकि उनकी वर्तमान कमाई के संबंध में कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं थे।

वहीं, विपक्षी पक्ष (पत्नी) के वकील ने प्रारंभिक आपत्ति जताते हुए कहा कि रिविजन पोषणीय नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि पत्नी के पास आय का कोई साधन नहीं है और पति को नोटिस मिलने के बावजूद वह जानबूझकर कोर्ट में पेश नहीं हुए। वकील ने स्पष्ट किया कि BNSS की धारा 145(2) के तहत एकपक्षीय आदेश को रद्द कराने का वैधानिक विकल्प पहले से मौजूद है, जिसका उपयोग किया जाना चाहिए था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने BNSS की धारा 145(2) (पूर्ववर्ती CrPC की धारा 126(2)) का अवलोकन किया, जो यह प्रावधान करती है कि यदि मजिस्ट्रेट या फैमिली कोर्ट इस बात से संतुष्ट है कि कोई व्यक्ति जानबूझकर तामीली से बच रहा है, तो वह एकपक्षीय आदेश दे सकता है। साथ ही, उचित कारण दिखाने पर उसी कोर्ट द्वारा उस आदेश को रद्द करने का भी प्रावधान है।

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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा:

“इस कोर्ट की राय है कि BNSS की धारा 144 (CrPC की धारा 125 के अनुरूप) के तहत पारित एकपक्षीय आदेश के मामले में, BNSS की धारा 145(2) (CrPC की धारा 126(2) के अनुरूप) के तहत आदेश को वापस लेने का अधिकार न्यायिक मजिस्ट्रेट या फैमिली कोर्ट के पास निहित है। इसलिए, इस शक्ति का प्रयोग न्यायिक मजिस्ट्रेट या फैमिली कोर्ट द्वारा किया जाना चाहिए, न कि इस कोर्ट के समक्ष रिविजन दाखिल करके।”

हाईकोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि एक बार जब फैमिली कोर्ट धारा 145(2) के तहत आवेदन पर अपना निर्णय दे देता है, उसके बाद ही फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 19(4) के तहत हाईकोर्ट में रिविजन दाखिल की जा सकती है। कोर्ट ने पाया कि नोटिस की तामीली के बावजूद रिविजनकर्ता सीधे हाईकोर्ट आए, जो प्रक्रियागत रूप से सही नहीं है।

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फैसला

जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी ने वैकल्पिक वैधानिक उपचार की उपलब्धता को देखते हुए वर्तमान रिविजन को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने रिविजनकर्ता को निर्देशित किया कि वह झांसी की संबंधित फैमिली कोर्ट में जाएं और धारा 145(2) BNSS के तहत आदेश को वापस लेने (recall) का आवेदन दाखिल करें।

कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि यदि इस प्रक्रिया में कोई देरी हुई है, तो रिविजनकर्ता विलंब माफी (condonation of delay) के लिए उचित शपथ पत्र के साथ आवेदन दे सकते हैं, जिस पर संबंधित कोर्ट कानून के अनुसार विचार करेगा।

केस का विवरण:

  • केस का नाम: अनूप कुमार बनाम श्रीमती प्रतिभा कुशवाहा
  • केस संख्या: क्रिमिनल रिविजन डिफेक्टिव नं. 141 ऑफ 2026
  • पीठ: जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी
  • दिनांक: 30 मार्च, 2026

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