दिल्ली हाईकोर्ट ने चेक बाउंस के एक मामले में एक महिला के खिलाफ आपराधिक शिकायत और समन आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत आपराधिक जिम्मेदारी पूरी तरह से चेक जारी करने वाले (ड्रॉअर) तक ही सीमित है।
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि भले ही मामला संयुक्त देनदारी (joint liability) का हो, लेकिन जिस व्यक्ति ने चेक पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं और जिसका संबंधित बैंक खाता नहीं है, उस पर इस अपराध के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
प्रतिवादी अनिल कुमार ने याचिकाकर्ता सुधा देवी और उनके बेटे तरुण कुमार के खिलाफ धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज की थी। शिकायत के अनुसार, माँ-बेटे ने अगस्त 2020 में वित्तीय कठिनाइयों के कारण अपना घर बेचने के लिए प्रतिवादी से संपर्क किया था। प्रतिवादी ने कथित तौर पर अगस्त 2020 से अप्रैल 2021 के बीच 10,00,000 रुपये किश्तों में दिए थे।
बाद में, याचिकाकर्ता ने संपत्ति बेचने से इनकार कर दिया। इस राशि को वापस करने के लिए याचिकाकर्ता के बेटे ने 1 सितंबर, 2021 को 10,00,000 रुपये का एक चेक जारी किया। बैंक में पेश करने पर चेक “अपर्याप्त धन” (funds insufficient) होने के कारण वापस आ गया। कानूनी नोटिस भेजने के बाद भी भुगतान न होने पर प्रतिवादी ने निचली अदालत में शिकायत दर्ज की। 15 दिसंबर, 2021 को निचली अदालत ने सुधा देवी और उनके बेटे दोनों को समन जारी कर दिया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि निचली अदालत ने “यांत्रिक तरीके” (mechanical manner) से समन आदेश पारित किया है। उन्होंने कहा कि सुधा देवी न तो चेक की हस्ताक्षरकर्ता थीं और न ही वह खाता उनके नाम पर था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अलका खंडू अव्हाड बनाम अमर श्यामप्रसाद मिश्रा और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के शालू अरोड़ा बनाम तनु बाथला मामलों का हवाला दिया।
वहीं, प्रतिवादी के वकील ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्रियों पर विचार करने के बाद ही आदेश पारित किया है, इसलिए इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने धारा 138 के तहत अपराध के लिए तीन अनिवार्य शर्तों का उल्लेख किया:
- चेक उस व्यक्ति द्वारा अपने बैंक खाते से जारी किया गया हो।
- चेक किसी कानूनी रूप से लागू होने वाली देनदारी के बदले जारी किया गया हो।
- चेक बैंक द्वारा “अपर्याप्त धन” या अन्य कारणों से बिना भुगतान के वापस कर दिया गया हो।
तथ्यों की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि स्वयं प्रतिवादी का यह कहना था कि चेक सुधा देवी के बेटे ने जारी किया था। कोर्ट ने कहा:
“तथ्यों से पता चलता है कि स्वीकार्य रूप से, न तो विवादित चेक याचिकाकर्ता द्वारा जारी किया गया है और न ही यह उनके द्वारा संचालित किसी बैंक खाते (अकेले या संयुक्त) से जारी हुआ है।”
कोर्ट ने आगे जोर दिया कि “आपराधिक जिम्मेदारी पूरी तरह से चेक के ‘ड्रॉअर’ तक सीमित है, जो याचिकाकर्ता नहीं हैं।”
प्रमुख मिसालें
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अलका खंडू अव्हाड (सुप्रा) मामले का हवाला देते हुए कहा:
“NI एक्ट की धारा 138 संयुक्त देनदारी की बात नहीं करती है। व्यक्तिगत व्यक्तियों के मामले में, यदि संयुक्त देनदारी भी है, तो भी उस व्यक्ति के अलावा जिसने चेक जारी नहीं किया है, उस पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।”
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि किसी व्यक्ति को तब तक उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि वह चेक पर हस्ताक्षरकर्ता न हो और बैंक खाता संयुक्त रूप से न हो।
निर्णय
यह देखते हुए कि चेक जारी करने या उसके अनादर (dishonor) में याचिकाकर्ता की कोई भूमिका नहीं थी, हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने सुधा देवी से संबंधित आपराधिक शिकायत (CC NI Act No. 26009/2021) और 15 दिसंबर, 2021 के समन आदेश को रद्द कर दिया।
केस विवरण ब्लॉक
- केस टाइटल: सुधा देवी बनाम अनिल कुमार
- केस नंबर: CRL.M.C. 6636/2022
- बेंच: जस्टिस सौरभ बनर्जी
- फैसले की तारीख: 30 मार्च, 2026

