“स्वतंत्र देश में वयस्क अपनी पसंद से विवाह के लिए स्वतंत्र”: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवाहित जोड़े को दी पुलिस सुरक्षा, दो महीने में पंजीकरण की रखी शर्त

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक विवाहित जोड़े द्वारा अपनी सुरक्षा और वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप रोकने के लिए दायर याचिका पर महत्वपूर्ण आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि याचिकाकर्ता एक विवाहित जोड़े के रूप में साथ रहने के लिए स्वतंत्र हैं और पुलिस को उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा डालने वालों के खिलाफ तत्काल सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया है। हालांकि, कोर्ट ने इस सुरक्षा को अगले दो महीने के भीतर विवाह पंजीकरण कराने की शर्त से जोड़ा है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता काजल और उनके साथी ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर मांग की थी कि उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य प्रतिवादियों को उनके वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप न करने और उन्हें सुरक्षा प्रदान करने का आदेश दिया जाए। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, वे दोनों वयस्क हैं और उन्होंने 10 फरवरी, 2026 को रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया था।

याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट को बताया कि यह उनका पहला विवाह है, जो बिना किसी दबाव और पूर्ण सहमति के हुआ है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनके खिलाफ कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं है, लेकिन परिजनों और अन्य प्रतिवादियों द्वारा उन्हें लगातार डराया-धमकाया और प्रताड़ित किया जा रहा है।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकीलों—जय प्रकाश पांडेय, सुधांशु तिवारी और उमेश चंद्र तिवारी—ने तर्क दिया कि वयस्क होने के नाते याचिकाकर्ताओं को अपनी पसंद से शादी करने और बिना किसी उत्पीड़न के साथ रहने का संवैधानिक अधिकार है।

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वहीं, राज्य सरकार की ओर से पेश हुए अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता श्री प्रभास कुमार तिवारी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस संबंध में दिए गए दिशा-निर्देशों का उत्तर प्रदेश में पालन किया जा रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं की आशंकाएं केवल अनुमान पर आधारित हैं, इसलिए इस स्तर पर किसी अतिरिक्त निर्देश की आवश्यकता नहीं है।

न्यायालय का विश्लेषण और कानूनी नजीरें

जस्टिस विवेक कुमार सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के उन ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया जो वयस्कों की पसंद की स्वतंत्रता और “ऑनर किलिंग” (सम्मान के नाम पर हत्या) की रोकथाम से संबंधित हैं।

कोर्ट ने लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006) मामले का उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:

“यह एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश है, और एक बार जब कोई व्यक्ति वयस्क हो जाता है, तो वह जिससे चाहे उससे शादी कर सकता है। यदि लड़के या लड़की के माता-पिता ऐसे अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह को स्वीकार नहीं करते हैं, तो वे अधिकतम सामाजिक संबंध तोड़ सकते हैं… लेकिन वे धमकी नहीं दे सकते, हिंसा नहीं कर सकते और न ही प्रताड़ित कर सकते हैं।”

इसके अलावा, कोर्ट ने भगवान दास बनाम राज्य (NCT दिल्ली), (2011) का भी संदर्भ दिया, जिसके पैराग्राफ 28 में कहा गया है:

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“हमने लता सिंह मामले में माना है कि ‘ऑनर किलिंग’ में कुछ भी ‘समानजनक’ नहीं है, और ये सामंती मानसिकता वाले कट्टर व्यक्तियों द्वारा की गई बर्बर और क्रूर हत्याओं के अलावा कुछ नहीं हैं। हमारी राय में ऑनर किलिंग ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ श्रेणी में आती है, जो मृत्युदंड की पात्र है।”

न्यायालय का निर्णय

मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, हाईकोर्ट ने निम्नलिखित निर्देशों के साथ याचिका का निस्तारण किया:

  1. साथ रहने का अधिकार: याचिकाकर्ता एक विवाहित जोड़े के रूप में साथ रहने के लिए स्वतंत्र हैं और किसी भी व्यक्ति को उनके शांतिपूर्ण जीवन में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
  2. पुलिस सुरक्षा: यदि उनके जीवन में कोई बाधा उत्पन्न होती है, तो याचिकाकर्ता संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) या पुलिस अधीक्षक (SP) से संपर्क करेंगे। अधिकारी मामले की जांच कर उन्हें तत्काल सुरक्षा प्रदान करेंगे। पुलिस यह भी सुनिश्चित करेगी कि किसी “निर्दोष व्यक्ति” को परेशान न किया जाए।
  3. पंजीकरण की समय सीमा: 10 फरवरी, 2026 को हुए विवाह का पंजीकरण ‘उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण नियमावली, 2017’ के तहत आज से दो महीने के भीतर कराना अनिवार्य होगा।
  4. सुरक्षा की शर्त: कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि याचिकाकर्ता निर्धारित समय सीमा के भीतर विवाह का पंजीकरण नहीं कराते हैं, तो “प्रदान की गई सुरक्षा स्वतः समाप्त हो जाएगी।”
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कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने विवाह की वैधता, आयु की सत्यता या विवाह प्रमाण पत्र की प्रमाणिकता पर कोई फैसला नहीं दिया है। यह आदेश किसी भी कानूनी कार्रवाई या लंबित पुलिस जांच में बाधा नहीं बनेगा।

केस विवरण:

  • केस: काजल एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 4 अन्य
  • केस संख्या: रिट-सी संख्या 10633/2026
  • न्यायाधीश: जस्टिस विवेक कुमार सिंह
  • दिनांक: 20 मार्च, 2026

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