साज़िश साबित करने के लिए ‘विचारों का मिलना’ आवश्यक; वरिष्ठ के आदेश का पालन करना अपराध नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के 40 साल पुराने एक मामले में नौ अधीनस्थ अधिकारियों की सजा को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि साज़िश (Conspiracy) का आरोप तब तक नहीं टिक सकता जब तक कि एक साझा आपराधिक योजना का ठोस सबूत न हो।

जस्टिस बिभु दत्त गुरु ने जगदलपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय के कई लेखाकारों और क्लर्कों द्वारा दायर अपील (CRA No. 130 of 2002) को स्वीकार कर लिया। हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि वेतन की कथित धोखाधड़ीपूर्ण निकासी में इन कर्मचारियों की कोई स्वतंत्र भूमिका या साज़िश थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला जुलाई 1979 से मई 1985 के बीच का है। आरोप था कि तत्कालीन CMHO डॉ. आर.के. सेन (आरोपी नंबर 1) ने अन्य नौ कर्मचारियों (आरोपी नंबर 2 से 10) के साथ मिलकर तीन सफाईकर्मियों—जयसिंह, लालमणि और मायाराम—के नौकरी छोड़ने के बाद भी उनके नाम पर फर्जी वेतन बिल तैयार करना जारी रखा।

अभियोजन का आरोप था कि इन सफाईकर्मियों को डॉ. सेन के आवास पर घरेलू नौकर के रूप में लगाया गया था। उनके जाने के बाद, आरोपियों ने कथित तौर पर वेतन बिलों पर फर्जी अंगूठे के निशान लगाकर कुल 42,040.35 रुपये की धोखाधड़ी की। 28 जनवरी, 2002 को जगदलपुर की एक विशेष अदालत ने इन कर्मचारियों को आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471 के साथ 120-बी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(d) के तहत दोषी ठहराया था।

READ ALSO  "अंकल जज सिंड्रोम" पर मचा बवाल: जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले ने उठाई न्यायिक सुधारों की मांग

अपील लंबित रहने के दौरान एम.आर. मलिक, बी.एस. मौर्य, टी.के.सी. बोस, के.आर.सी. पिल्लई और जी.आर. सम्भलकर सहित कई अपीलकर्ताओं का निधन हो गया, जिनका प्रतिनिधित्व अब उनके कानूनी वारिस कर रहे हैं।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि दोषसिद्धि केवल “अनुमानों” पर आधारित थी। उन्होंने कहा कि आईपीसी की धारा 463 के तहत जालसाजी का कोई सबूत नहीं था और अधीनस्थ अधिकारी होने के नाते, अपीलकर्ताओं ने केवल CMHO के अनिवार्य निर्देशों के तहत काम किया था। यह भी तर्क दिया गया कि कुछ अवधियों के लिए कथित लाभार्थियों ने वास्तव में काम किया था, और धारा 120-बी के तहत साज़िश के लिए ‘विचारों के मिलन’ (Meeting of Minds) की आवश्यकता होती है, जिसे अभियोजन साबित नहीं कर सका।

राज्य ने तर्क दिया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह साबित होता है कि अपीलकर्ताओं ने फर्जी बिल तैयार करने और सरकारी धन निकालने में मदद की, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान हुआ।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने इंडियाबुल्स मामले में CBI-SEBI की “अनिच्छा” पर नाराज़गी जताई; सभी एजेंसियों के उच्चस्तरीय बैठक का निर्देश

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि मुख्य गवाहों (PW-17 और PW-18) ने गवाही दी थी कि वेतन वितरण और बिल प्रोसेसिंग पूरी तरह से डॉ. सेन के निर्देशों के तहत की गई थी।

जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोपों पर हाईकोर्ट ने कहा कि बुनियादी सबूतों का अभाव है। हाईकोर्ट का अवलोकन था:

“वर्तमान मामले में, अभियोजन पक्ष यह प्रदर्शित करने के लिए कोई विशेषज्ञ साक्ष्य या अन्य विश्वसनीय सामग्री पेश करने में विफल रहा है कि दस्तावेजों पर दिखने वाले हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान जाली या मनगढ़ंत थे। ऐसा कोई सबूत भी नहीं है जो यह दिखाए कि अपीलकर्ता ऐसे किसी भी झूठे दस्तावेज को तैयार करने में शामिल थे।”

हाईकोर्ट ने साज़िश के संबंध में ‘हेड नोट’ (Headnote) के मूल सिद्धांत पर जोर देते हुए कहा:

“साज़िश के आरोप को स्थापित करने के लिए, अभियोजन पक्ष को एक अवैध कार्य करने के लिए दो या दो अधिक व्यक्तियों के बीच समझौते या विचारों के मिलन (Meeting of Minds) के अस्तित्व को साबित करना होगा। ऐसा समझौता या तो प्रत्यक्ष साक्ष्य द्वारा या ऐसी परिस्थितियों द्वारा स्थापित किया जाना चाहिए जो निश्चित रूप से एक सामान्य योजना की ओर इशारा करती हों।”

READ ALSO  केरल हाईकोर्ट ने सबरीमाला पर टिप्पणी को लेकर गोवा के राज्यपाल पी.एस. श्रीधरन पिल्लई के खिलाफ दर्ज एफआईआर को खारिज कर दिया

हाईकोर्ट ने आगे कहा कि जांच अधिकारी (PW-29) ने स्वीकार किया था कि अपीलकर्ता डॉ. सेन के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य थे।

निर्णय

अपीलकर्ताओं को बरी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि संदेह, चाहे वह कितना भी गहरा क्यों न हो, कानूनी सबूत की जगह नहीं ले सकता। हाईकोर्ट ने कहा:

“अपने वरिष्ठ अधिकारी के निर्देशों के तहत किए गए नियमित आधिकारिक काम में केवल भागीदारी को, आपराधिक मंशा या पद के दुरुपयोग के सबूत के अभाव में, अधिनियम के अर्थ में आपराधिक कदाचार नहीं माना जा सकता है।”

हाईकोर्ट ने 28 जनवरी, 2002 के निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया और सभी अपीलकर्ताओं को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: एम. आर. मलिक (मृत) कानूनी वारिसों के माध्यम से और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
  • केस नंबर: CRA No. 130 of 2002
  • बेंच: जस्टिस बिभु दत्त गुरु
  • तारीख: 30 मार्च, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles