दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी पक्ष ने वैट (VAT) अधिनियम के तहत इनवॉइस के आधार पर इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का लाभ उठा लिया है, तो वह बाद में उन इनवॉइस को फर्जी बताकर अपनी देनदारी से बच नहीं सकता। जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की बेंच ने कहा कि वाणिज्यिक लेनदेन में इस तरह के विरोधाभासी तर्क स्वीकार्य नहीं हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला फिरोज खान और अन्य (अपीलकर्ता) द्वारा तीस हजारी कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील से जुड़ा है, जिसमें उन्हें अनिल जैन (वादी) को ₹8,89,350/- का भुगतान करने का आदेश दिया गया था। वादी ‘जैन केमिकल्स’ के नाम से व्यवसाय करते हैं और उन्होंने मार्च 2016 में अपीलकर्ताओं को केमिकल की आपूर्ति करने का दावा किया था। तीन इनवॉइस के आधार पर ₹5,77,500/- की मूल राशि बकाया थी। भुगतान न होने पर वादी ने कानूनी कार्रवाई शुरू की थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि उन्हें कभी भी सामान की डिलीवरी नहीं मिली और ये इनवॉइस केवल “कागजी” या “प्रविष्टि बिल” (entry bills) थे। उनके वकील गौरव दलाल ने तर्क दिया कि वादी के पास माल भेजने की कोई रसीद, ट्रांसपोर्ट विवरण या हस्ताक्षर युक्त पावती नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके अकाउंटेंट ने गलती से इन इनवॉइस को बही-खातों और वैट रिटर्न में दर्ज कर लिया था।
वहीं, वादी के वकील तेजवीर सिंह ने दलील दी कि यह बचाव केवल एक बहाना है। उन्होंने न्यायालय का ध्यान इस तथ्य की ओर दिलाया कि अपीलकर्ताओं ने इन्हीं इनवॉइस के आधार पर टैक्स क्रेडिट का लाभ उठाया था। जब उन्होंने इसे “खरीद” मानकर टैक्स लाभ लिया, तो अब वे इस लेनदेन के अस्तित्व को नकार नहीं सकते।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने वैट रिटर्न के साक्ष्य मूल्य और “अप्रोबेट एंड रेप्रोबेट” (Approbate and Reprobate) के सिद्धांत पर ध्यान केंद्रित किया।
1. वैट रिटर्न का महत्व: कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी (DW1) ने जिरह के दौरान स्वीकार किया था कि उन्होंने तीनों इनवॉइस पर वैट इनपुट लिया था। बेंच ने टिप्पणी की:
“वैट इनपुट क्रेडिट का दावा अनिवार्य रूप से इस आधार पर किया जाता है कि खरीदार उस लेनदेन को आपूर्तिकर्ता से की गई एक वास्तविक खरीद के रूप में मान्यता देता है।”
न्यायालय ने रंजीत सैनी बनाम मेसर्स बनवारीलाल अरोड़ा एंड संस (2026) के फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि एक ही इनवॉइस के लिए टैक्स क्रेडिट लेना और फिर उसी के लिए माल की आपूर्ति न होने का तर्क देना परस्पर विरोधी है।
2. कानूनी नोटिस का जवाब न देना: कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि जब वादी ने फरवरी 2019 में कानूनी नोटिस भेजा था, तो प्रतिवादियों ने उसका कोई जवाब नहीं दिया और न ही तब इन लेनदेन पर कोई आपत्ति जताई। मेट्रोपोलिस ट्रेवल्स एंड रिसॉर्ट्स बनाम सुमित कालरा मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि कानूनी मांग पर चुप्पी साधने से बाद में दिए गए बचाव पर संदेह पैदा होता है।
3. डिलीवरी दस्तावेजों की कमी: सामान की रसीद पर हस्ताक्षर न होने के संबंध में, कोर्ट ने वादी के उस स्पष्टीकरण को स्वीकार किया कि उस समय रोड परमिट और ‘बिल्टी’ तैयार करने की जिम्मेदारी खरीदार की होती थी। कोर्ट ने माना कि केवल इन दस्तावेजों की अनुपस्थिति, प्रतिवादियों द्वारा स्वयं दाखिल किए गए टैक्स रिटर्न के सामने कोई मायने नहीं रखती।
4. एस्टोपेल (Estoppel) का सिद्धांत: सुप्रीम कोर्ट के कावेरी कॉफी ट्रेडर्स बनाम हॉर्नर रिसोर्सेज मामले का जिक्र करते हुए बेंच ने कहा कि कोई भी व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार एक ही लेनदेन को स्वीकार और अस्वीकार नहीं कर सकता।
फैसला
हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं की देनदारी को बरकरार रखा, लेकिन ब्याज दर में कुछ संशोधन किया। कोर्ट ने मुकदमे से पहले की 18% ब्याज दर को कायम रखा, लेकिन ‘पेंडेंट लाइट’ (pendente lite) और भविष्य के ब्याज को 9% से घटाकर 6% प्रति वर्ष कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वाणिज्यिक दरों के हिसाब से 6% ब्याज उचित है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा ₹5,75,500/- की राशि (FDR) ब्याज सहित वादी को जारी कर दी जाए। बाकी बची हुई राशि के लिए वादी कानूनी रूप से डिक्री निष्पादित करने के लिए स्वतंत्र है।
केस विवरण
- केस शीर्षक: फिरोज खान और अन्य बनाम अनिल जैन
- केस संख्या: RFA (COMM) 162/2025
- पीठ: जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन
- दिनांक: 30 मार्च, 2026

