जमीन विवादों के निपटारे के लिए ‘राजस्व न्यायिक सेवा’ की मांग, सुप्रीम कोर्ट 2 अप्रैल को करेगा सुनवाई

भारत में जमीन से जुड़े विवादों के समाधान की प्रक्रिया में बड़े बदलाव की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। इस याचिका में एक विशेष ‘राजस्व न्यायिक सेवा’ (Revenue Judicial Service) गठित करने और संपत्ति से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले लोक सेवकों के लिए न्यूनतम कानूनी योग्यता और मानक न्यायिक प्रशिक्षण अनिवार्य करने की मांग की गई है। शीर्ष अदालत इस मामले पर 2 अप्रैल को सुनवाई कर सकती है।

अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर और अधिवक्ता अश्वनी दुबे द्वारा तैयार की गई इस याचिका में तर्क दिया गया है कि वर्तमान व्यवस्था—जहां बिना कानूनी पृष्ठभूमि वाले राजस्व अधिकारी मालिकाना हक, विरासत और कब्जे जैसे जटिल कानूनी मुद्दों पर निर्णय लेते हैं—मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

याचिका के अनुसार, भारत में लगभग 66 प्रतिशत दीवानी मामले जमीन विवादों से संबंधित हैं। याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि इन महत्वपूर्ण मामलों का फैसला ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है जिनके पास औपचारिक कानूनी शिक्षा नहीं है।

याचिका में तर्क दिया गया है कि कानूनी विशेषज्ञता की इस कमी के कारण “त्रुटिपूर्ण और असंगत निर्णय” आते हैं, जिससे:

  • संपत्ति के अधिकारों को लेकर लंबे समय तक अनिश्चितता बनी रहती है।
  • जमीन के उपयोग और हस्तांतरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • नागरिकों के लिए मुकदमेबाजी का खर्च बढ़ जाता है।
  • न्याय तक प्रभावी पहुंच बाधित होती है।
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PIL में कहा गया है कि गैर-योग्य पेशेवरों द्वारा न्यायिक कार्य कराना संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का हनन है।

याचिका में कहा गया है, “वर्तमान प्रणाली बिना कानूनी पृष्ठभूमि वाले राजस्व अधिकारियों को भूमि विवादों के न्यायिक निर्णय का अधिकार देकर नागरिकों को व्यापक क्षति पहुंचा रही है, जिसके परिणामस्वरूप मनमाने और गलत निर्णय सामने आते हैं।”

याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत से कई महत्वपूर्ण निर्देश देने का अनुरोध किया है:

  1. राजस्व न्यायिक सेवा: भूमि संबंधी न्यायिक मामलों को संभालने के लिए एक विशेष सेवा का गठन।
  2. न्यूनतम योग्यता: केंद्र और राज्यों को निर्देश देना कि वे राजस्व अधिकारियों के लिए न्यूनतम कानूनी योग्यता और न्यायिक प्रशिक्षण मॉड्यूल निर्धारित करें, जिसे संबंधित हाईकोर्ट के परामर्श से तैयार किया जाए।
  3. न्यायिक घोषणा: यह घोषित करना कि औपचारिक कानूनी शिक्षा और न्यायिक प्रशिक्षण के बिना लोक सेवकों द्वारा मालिकाना हक और विरासत जैसे मामलों का निर्णय लेना कानूनी रूप से अस्वीकार्य है।
  4. हाईकोर्ट की निगरानी: यह सुनिश्चित करना कि संपत्ति अधिकारों से जुड़े ऐसे न्यायिक कार्यों की निगरानी संबंधित हाईकोर्ट द्वारा की जाए।
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याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहले भी इस मुद्दे पर विचार किया था, लेकिन उसके निर्देशों को अब तक पूरी तरह लागू नहीं किया गया है।

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