झारखंड हाईकोर्ट ने पलामू टाइगर रिजर्व (PTR) में बाघों के संरक्षण से जुड़ी एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) के प्रति कड़ी नाराजगी जाहिर की है। चीफ जस्टिस एम.एस. सोनिक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने अदालती निर्देशों की अनदेखी करने पर पीसीसीएफ को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में हाजिर होने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने यह सख्त रुख तब अपनाया जब यह पाया गया कि 1974 में स्थापित इस रिजर्व में बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। हाईकोर्ट पिछले काफी समय से इस मामले की निगरानी कर रहा है, लेकिन वन विभाग की कार्यप्रणाली पर असंतोष जताते हुए कोर्ट ने कहा कि अधिकारी अदालती आदेशों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।
सुनवाई के दौरान विवाद का मुख्य केंद्र वह हलफनामा रहा जिसे पीसीसीएफ की ओर से उनके एक अधीनस्थ अधिकारी ने दाखिल किया था। हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट का कहना था कि एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) के सुझावों के आधार पर कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां मांगी गई थीं, जिन्हें स्वयं पीसीसीएफ को अपने व्यक्तिगत हलफनामे के जरिए देना था।
खंडपीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि पीसीसीएफ ने न तो हाईकोर्ट के पिछले आदेशों को पढ़ा है और न ही इस संवेदनशील विषय को जरूरी प्राथमिकता दी है। अब अधिकारी को कोर्ट के समक्ष उपस्थित होकर यह स्पष्ट करना होगा कि उन्होंने व्यक्तिगत हलफनामा क्यों दाखिल नहीं किया।
पलामू टाइगर रिजर्व देश के सबसे पुराने बाघ अभयारण्यों में से एक है, लेकिन कोर्ट ने पहले की सुनवाइयों में इस बात पर चिंता जताई थी कि यहां बाघों की संख्या में वृद्धि का कोई रिकॉर्ड नहीं मिल रहा है। विकास महतो द्वारा दायर इस जनहित याचिका में रिजर्व के रख-रखाव और वहां वन्यजीवों की स्थिति सुधारने की मांग की गई है। कोर्ट ने सरकार को कई बार निर्देश दिए हैं ताकि रिजर्व में बाघों की आबादी बढ़ सके, लेकिन धरातल पर परिणाम संतोषजनक नहीं दिखे हैं।
हाईकोर्ट का यह आदेश प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। अधीनस्थ के माध्यम से खानापूर्ति करने की कोशिश को नकार कर कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण जैसे गंभीर मुद्दों पर विभाग के शीर्ष अधिकारियों को सीधे तौर पर जिम्मेदारी लेनी होगी।

