नाबालिग पीड़िता की विश्वसनीय गवाही को मामूली विरोधाभास खारिज नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म की सजा बहाल की

सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें नौ साल की बच्ची के साथ यौन शोषण के आरोपी को बरी कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा साक्ष्यों का विश्लेषण “गलत दिशा” में था। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को बहाल करते हुए कहा कि घटना के समय या दूरी को लेकर छोटी-मोटी विसंगतियां किसी नाबालिग पीड़िता की विश्वसनीय गवाही और मेडिकल साक्ष्यों को झुठला नहीं सकतीं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 27 अगस्त 2007 का है, जब एक नौ साल की बच्ची को उसकी मां ने सुबह-सुबह छाछ लेने भेजा था। वापस लौटते समय, पड़ोस के बेटे (आरोपी) ने उसे एक गौशाला में ले जाकर उसके साथ यौन शोषण किया। बच्ची ने इस घटना के बारे में अपनी मां को बताया और फिर शाम को अपने पिता को जानकारी दी।

इस मामले में सुंदरनगर पुलिस स्टेशन में अगले दिन प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई। पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 (दुष्कर्म) और 201 (साक्ष्य मिटाना) के साथ-साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(xii) के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।

ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट का रुख

सितंबर 2008 में, ट्रायल कोर्ट (जिला और सत्र न्यायाधीश, मंडी) ने आरोपी को धारा 376 IPC और SC/ST एक्ट के तहत दोषी ठहराया और 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। कोर्ट ने पीड़िता की गवाही और मेडिकल रिपोर्ट पर भरोसा किया, जिसमें चोटों और यौन हमले की पुष्टि हुई थी।

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हालांकि, जून 2014 में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के दावे को “असंभव” करार दिया, विशेष रूप से इस बात पर सवाल उठाया कि नौ साल की बच्ची दो घंटे के भीतर छाछ लाने के लिए 16 किलोमीटर की दूरी (आना-जाना) कैसे तय कर सकती है। हाईकोर्ट ने परिवारों के बीच “कटु संबंधों” और गवाहों के बयानों में समय को लेकर विरोधाभासों का भी उल्लेख किया था।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

हिमाचल प्रदेश राज्य ने इस बरी किए जाने के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। बेंच ने इस बात की समीक्षा की कि क्या हाईकोर्ट का फैसला कानून के सिद्धांतों के अनुरूप था।

1. बाल गवाह की गवाही का मूल्यांकन

बाल गवाहों के संबंध में स्थापित सिद्धांतों को दोहराते हुए जस्टिस संजय करोल ने स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम चैत्रा (2025) का हवाला दिया। बेंच ने कहा कि अगर कोर्ट संतुष्ट है कि बच्चा सच और झूठ के बीच अंतर समझता है, तो उसकी गवाही पर भरोसा किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा:

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“पीड़िता की गवाही की पुष्टि करना कानून की अनिवार्यता नहीं है, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार विवेक का मार्गदर्शन है। मामूली विरोधाभास या छोटी विसंगतियां पीड़िता की गवाही को खारिज करने का आधार नहीं होनी चाहिए।”

2. ‘गणितीय सटीकता’ की आवश्यकता नहीं

हाईकोर्ट द्वारा 16 किलोमीटर की दूरी पर उठाए गए सवाल का जवाब देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मानवीय स्मृति और धारणा स्वाभाविक रूप से अपूर्ण होती है। स्टेट ऑफ यू.पी. बनाम एम.के. एंथोनी (1985) का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“तुच्छ मामलों में भिन्नताएं, जो मामले के मूल आधार को प्रभावित नहीं करतीं, विश्वसनीय गवाही को पूरी तरह से खारिज करने का कारण नहीं बननी चाहिए… किसी घटना के होने को साबित करने के लिए कोर्ट गणितीय सटीकता की तलाश नहीं करता।”

3. मेडिकल और चश्मदीद सबूत

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि मेडिकल साक्ष्य (PW-7) स्पष्ट रूप से पीड़िता द्वारा आरोपी की पहचान और हमले के विवरण की पुष्टि करते हैं। कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने केवल “समय की कथित असंभवता” के आधार पर विश्वसनीय चश्मदीद सबूतों की अनदेखी करके गलती की।

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पीड़िता की पहचान उजागर करने पर कड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गहरा असंतोष व्यक्त किया कि पूरे रिकॉर्ड में पीड़िता की पहचान उजागर की गई थी, जो IPC की धारा 228-A का उल्लंघन है। बेंच ने कहा:

“इस धारा की मंशा को इन कार्यवाहियों में नजरअंदाज किया गया है। पीड़िता के नाम का इस्तेमाल किसी अन्य गवाह की तरह स्वतंत्र रूप से किया गया है। इसकी कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए।”

कोर्ट ने इसे “निचली अदालतों की सामान्य उदासीनता” और “सामाजिक कलंक के प्रति जागरूकता की कमी” बताया।

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट की सजा बहाल कर दी। आरोपी को निर्देश दिया गया है कि वह “तत्काल आत्मसमर्पण करे और शेष सजा पूरी करे।”

मामले का विवरण:

  • केस का शीर्षक: स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश बनाम हुकम चंद उर्फ मोनू
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1275/2015
  • बेंच: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह
  • फैसले की तारीख: 24 मार्च, 2026

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