इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण (Maintenance) की बकाया राशि का भुगतान न करने के कारण यदि पति को सिविल जेल भेजा जाता है, तो इससे उसकी बकाया राशि चुकाने की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। हाईकोर्ट ने जोर देते हुए कहा कि जेल भेजना आदेश को लागू कराने का एक माध्यम (Mode of enforcement) है, न कि कर्ज से मुक्ति (Satisfaction of liability) का तरीका।
यह आदेश जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि ने मुरादाबाद की एक निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए दिया। निचली अदालत ने यह मानते हुए ₹2,64,000/- की वसूली याचिका खारिज कर दी थी कि पति पहले ही इस चूक के लिए 30 दिन की जेल काट चुका है।
मामले की पृष्ठभूमि
आवेदक (पत्नी) और विपक्षी संख्या-2 (पति) का निकाह 23 मई, 1990 को हुआ था। उनके वैवाहिक जीवन से एक पुत्र हुआ, जो दिव्यांग है। आवेदक के अनुसार, उसे और उसके बेटे को 1995 में ससुराल से निकाल दिया गया था। 2011 में एक समझौते के बाद वह वापस रहने गई, लेकिन आरोप है कि 2017 में उसे फिर से घर से निकाल दिया गया, जिसके बाद से वह किराए के मकान में रह रही है।
आवेदक ने 2017 में घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 (D.V. Act) की धारा 12 के तहत राहत मांगी थी। 19 जुलाई, 2019 को ट्रायल कोर्ट ने पत्नी और दिव्यांग बेटे के लिए ₹4,000-₹4,000 (कुल ₹8,000 प्रतिमाह) का अंतरिम भरण-पोषण तय किया। यह आदेश अपीलीय स्तर पर भी बरकरार रहा।
जुलाई 2019 से अप्रैल 2022 की अवधि के लिए ₹2,64,000 की बकाया राशि न मिलने पर निष्पादन याचिका (Execution application) दायर की गई। भुगतान से इनकार करने पर पति को 30 अक्टूबर, 2022 को गिरफ्तार कर 30 दिन के लिए सिविल जेल भेजा गया। जेल से छूटने के बाद भी पति ने बकाया राशि नहीं चुकाई। जब आवेदक ने दोबारा वसूली के लिए आवेदन किया, तो ट्रायल कोर्ट ने 23 जनवरी, 2023 को इस आधार पर आवेदन खारिज कर दिया कि पति पहले ही सजा काट चुका है, इसलिए Cr.P.C. की धारा 300 (दोहरे दंड का निषेध) के तहत उसे फिर से दंडित नहीं किया जा सकता।
पक्षों के तर्क
आवेदक के वकील: आवेदक के विद्वान अधिवक्ता ने दलील दी कि निचली अदालत का तर्क पूरी तरह त्रुटिपूर्ण है। उन्होंने कहा कि Cr.P.C. की धारा 300 यहाँ लागू नहीं होती क्योंकि भरण-पोषण की कार्यवाही सिविल प्रकृति की होती है और इसमें जेल जाना कोई “दोषसिद्धि” (Conviction) नहीं है। जेल भेजना केवल एक दबाव बनाने का जरिया है ताकि असहाय पत्नी और दिव्यांग बच्चे को उनका अधिकार मिल सके।
विपक्षी (पति) के वकील: पति के वकील ने तर्क दिया कि 30 दिन की जेल एक सजा के रूप में थी, इसलिए निचली अदालत का आदेश सही था। उन्होंने यह भी आपत्ति जताई कि बेटा अब बालिग हो चुका है, इसलिए वह वित्तीय राहत का हकदार नहीं है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा धारा 300 के इस्तेमाल को पूरी तरह खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत भरण-पोषण की कार्यवाही का परिणाम न तो दोषसिद्धि है और न ही दोषमुक्ति… ऐसी हिरासत Cr.P.C. की धारा 300 के दायरे में नहीं आती।”
सुप्रीम कोर्ट के कुलदीप कौर बनाम सुरिंदर सिंह (1989) मामले का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“किसी व्यक्ति को जेल भेजना ‘वसूली लागू करने का एक तरीका’ है। यह दायित्व की ‘संतुष्टि का तरीका’ नहीं है। दायित्व केवल बकाया राशि का वास्तविक भुगतान करके ही पूरा किया जा सकता है… जेल भेजने का उद्देश्य उस जिम्मेदारी को खत्म करना नहीं है जिसे उसने निभाने से इनकार कर दिया है।”
कोर्ट ने रजनीश बनाम नेहा (2021) के ऐतिहासिक फैसले का भी जिक्र किया और कहा कि भरण-पोषण के आदेश सामाजिक कल्याण के लिए हैं ताकि महिलाओं और बच्चों को दर-दर भटकने से बचाया जा सके। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे आदेशों को सिविल कोर्ट की डिक्री की तरह संपत्ति कुर्क करके भी लागू किया जाना चाहिए।
पति के व्यवहार पर सख्त टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“एक चूककर्ता (Defaulter) के साथ लोहे के हाथों (Iron hand) से निपटा जाना चाहिए… यह एक अक्षम्य अपराध और पाप है जिसके लिए बिना किसी दया के सजा दी जानी चाहिए।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने 23 जनवरी, 2023 के आदेश को रद्द करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:
- निचली अदालत बकाया राशि की वसूली के लिए नया आदेश जारी करे, जिसमें देरी के लिए 6% साधारण वार्षिक ब्याज भी जोड़ा जाए।
- यदि पति राशि जमा करने में विफल रहता है, तो मजिस्ट्रेट को उसकी संपत्ति कुर्क करने का निर्देश दिया जाता है।
- संपत्ति की नीलामी से प्राप्त राशि का उपयोग बकाया और ब्याज चुकाने के लिए किया जाएगा।
- पति को निर्देश दिया गया है कि वह नियमित रूप से मासिक भरण-पोषण का भुगतान जारी रखे।
- भुगतान की यह पूरी प्रक्रिया 60 दिनों के भीतर संपन्न की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने अंत में चेतावनी दी कि यदि संबंधित पीठासीन अधिकारी इन निर्देशों का पालन करने में देरी करते हैं, तो इसे क्षेत्राधिकार का प्रयोग न करना माना जाएगा और उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: श्रीमती हसीना खातून बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस संख्या: आवेदन U/s 482 संख्या 7721/2023
- बेंच: जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि
- आवेदक के वकील: श्री अक्षय कुमार, श्री जयदीप पांडेय
- विपक्षी के वकील: जी.ए. (श्री शशिधर पांडेय), श्री महताब आलम, श्री आर.के. शुक्ला
- दिनांक: 24 मार्च, 2026

