हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट: यदि ट्रायल कोर्ट का दृष्टिकोण ‘तर्कसंगत’ है, तो दोषमुक्ति के फैसले में हस्तक्षेप आवश्यक नहीं

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दंगों और गंभीर चोट पहुंचाने के आरोपियों की दोषमुक्ति के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया है। जस्टिस राकेश कैंथला की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यदि साक्ष्यों के आधार पर दो तर्कसंगत विचार संभव हैं, तो अपीलीय अदालत को निचली अदालत द्वारा दिए गए दोषमुक्ति के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 14 फरवरी 2009 की रात करीब 8:30 बजे का है। शिकायतकर्ता रजनीश कुमार (PW1) और उनके भाई सजनीश कुमार (PW2) अपनी दुकान बंद कर रहे थे, तभी आरोपी राकेश कुमार और पंकज कुमार वहां आए और गाली-गलौज करने लगे। आरोप था कि राकेश कुमार ने रजनीश के सिर पर ईंट से वार किया, जबकि परिवार के अन्य सदस्यों—प्रकाश चंद, श्रेष्ठ देवी और मोना देवी—ने भी उनके साथ मारपीट की।

चिकित्सा परीक्षण में रजनीश कुमार को कई चोटें पाई गईं, जिसमें एक दांत का टूटना भी शामिल था, जिसे ‘गंभीर चोट’ की श्रेणी में रखा गया। पुलिस ने 17 फरवरी 2009 को आईपीसी की धारा 147, 148, 323 और 325 (पठित धारा 149) के तहत एफआईआर दर्ज की। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, धर्मशाला ने 30 अप्रैल 2014 को सभी आरोपियों को बरी कर दिया था, जिसके विरुद्ध राज्य ने हाईकोर्ट में अपील की थी।

पक्षों की दलीलें

राज्य की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही ढंग से मूल्यांकन नहीं किया। उन्होंने कहा कि घटना के दिन ही पुलिस को सूचना दी गई थी और डेली डायरी में प्रविष्टि की गई थी। साथ ही, घायलों और चश्मदीद गवाहों के बयान चिकित्सा साक्ष्यों से पुष्ट होते हैं।

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वहीं, आरोपियों के वकील ने दलील दी कि दोनों पक्षों के बीच भूमि विवाद के कारण संबंध तनावपूर्ण थे। उन्होंने एफआईआर को मजिस्ट्रेट के पास भेजने में हुई देरी की ओर इशारा करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर एक तर्कसंगत निष्कर्ष था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने दोषमुक्ति के मामलों में हस्तक्षेप की सीमा स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (सुरेंद्र सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य (2025) और मध्य प्रदेश राज्य बनाम रामवीर सिंह (2025)) का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा:

“दोषमुक्ति के फैसले में हाईकोर्ट का हस्तक्षेप केवल तभी उचित है जब फैसला स्पष्ट रूप से विकृत (perverse) हो; या वह साक्ष्यों को गलत तरीके से पढ़ने या महत्वपूर्ण सबूतों को नजरअंदाज करने पर आधारित हो; और जहां साक्ष्यों से दो तर्कसंगत विचार संभव न हों।”

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मेडिकल रिपोर्ट में विसंगतियां और शराब का प्रभाव कोर्ट ने मेडिकल साक्ष्यों में बड़ी विसंगतियों को रेखांकित किया। दंत चिकित्सक डॉ. रणदीप कुमार (PW6) ने क्रॉस-एग्जामिनेशन में स्वीकार किया कि शिकायतकर्ता के दांत पहले से ही हिल रहे थे और टूटा हुआ दांत “प्राकृतिक रूप से भी बाहर आ सकता था।” इसके अलावा, मेडिकल रिपोर्ट और स्वयं शिकायतकर्ता के बयान से यह स्पष्ट हुआ कि घटना की रात उन्होंने शराब का सेवन किया था। डॉक्टरों ने गवाही दी कि शराब के प्रभाव में गिरने के कारण भी ऐसी चोटें लग सकती हैं।

गवाहों की विश्वसनीयता पर सवाल हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता के बयानों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया माना। रजनीश ने कोर्ट में दावा किया कि आरोपियों ने उसे दांतों से काटा था, जबकि एफआईआर या मेडिकल ऑफिसर की रिपोर्ट में काटने के कोई निशान नहीं थे। जस्टिस कैंथला ने टिप्पणी की:

“बयान में यह सुधार (improvement) किसी भी कीमत पर सजा दिलाने की शिकायतकर्ता की हताशा को दर्शाता है।”

स्वतंत्र गवाहों, बलदेव कुमार (PW3) और नरेश कुमार (PW7) को कोर्ट ने ‘चांस विटनेस’ (अचानक उपस्थित होने वाले गवाह) की श्रेणी में रखा। कोर्ट ने पाया कि बलदेव कुमार ने सभी हमलावरों के नाम नहीं बताए और घटना स्थल पर उनकी उपस्थिति संदिग्ध थी। वहीं नरेश कुमार के बयान भी चोटों के स्थान और मौके पर मौजूद भीड़ के संबंध में अभियोजन पक्ष की कहानी से मेल नहीं खा रहे थे।

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कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट का दृष्टिकोण तर्कसंगत था और अभियोजन पक्ष के गवाह पूरी तरह विश्वसनीय नहीं थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही साक्ष्यों का कोई दूसरा पहलू संभव हो, फिर भी वह दोषमुक्ति के फैसले में बदलाव नहीं करेगा।

इसी के साथ राज्य की अपील खारिज कर दी गई। सीआरपीसी की धारा 437-ए (बीएनएसएस, 2023 की धारा 481) के तहत, आरोपियों को ₹25,000 के बेल बॉन्ड भरने का निर्देश दिया गया है।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम राकेश कुमार और अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 290/2014
  • न्यायाधीश: जस्टिस राकेश कैंथला
  • निर्णय की तिथि: 20 मार्च, 2026

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