बिना प्रत्यक्ष विधिक क्षति साबित किए सहकर्मी की बहाली को चुनौती नहीं दे सकता कर्मचारी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक कर्मचारी द्वारा अपने सहकर्मी की सेवा में बहाली को चुनौती देने वाली विशेष अपील को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक कोई प्रत्यक्ष विधिक क्षति (Legal Injury) साबित न हो, तब तक कोई तीसरा पक्ष नियोक्ता और कर्मचारी के बीच के सेवा मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार (Locus Standi) नहीं रखता।

मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के कर्मचारी नीरज कुमार सिंह द्वारा आनंद कुमार मिश्रा की बहाली के खिलाफ दायर विशेष अपील पर यह निर्णय सुनाया। हाईकोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता ‘व्यथित व्यक्ति’ (Aggrieved Person) की श्रेणी में नहीं आता है।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की जड़ प्रतिवादी आनंद कुमार मिश्रा की 2004 में केजीएमयू (KGMU) में अनुकंपा के आधार पर हुई नियुक्ति थी। वर्ष 2018 और 2020 में शिकायतों के माध्यम से आरोप लगाया गया कि मिश्रा की नियुक्ति वैधानिक नियमों के विरुद्ध थी। इन शिकायतों और लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद, केजीएमयू ने 2 दिसंबर, 2022 को मिश्रा को सेवा से बर्खास्त कर दिया था।

मिश्रा ने अपनी बर्खास्तगी को रिट-ए संख्या 1414/2023 के माध्यम से चुनौती दी। 15 जुलाई, 2024 को एकल पीठ ने इस रिट याचिका को स्वीकार करते हुए बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया और उन्हें सभी परिणामी लाभों के साथ बहाल करने का निर्देश दिया। अपीलकर्ता नीरज कुमार सिंह, जो स्वयं केजीएमयू में कार्यरत हैं, ने इस आदेश के खिलाफ अपील करने की अनुमति मांगी, हालांकि वे मूल रिट कार्यवाही में पक्षकार नहीं थे।

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पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता (नीरज कुमार सिंह) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता संजय भसीन ने तर्क दिया कि प्रतिवादी की नियुक्ति शून्य और वैधानिक नियमों के विपरीत थी। उन्होंने दलील दी कि चूंकि अपीलकर्ता और प्रतिवादी एक ही कैडर के हैं, इसलिए प्रतिवादी की निरंतर सेवा से अपीलकर्ता की वरिष्ठता और पदोन्नति की संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यह भी तर्क दिया गया कि चूंकि नियोक्ता (केजीएमयू) ने आदेश के खिलाफ अपील नहीं की, इसलिए अपीलकर्ता को ‘व्यथित पक्ष’ के रूप में अपील करने का अधिकार है।

प्रतिवादी (आनंद कुमार मिश्रा) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप नारायण माथुर ने अपील की पोषणीयता (Maintainability) पर प्रारंभिक आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि अपीलकर्ता इस कार्यवाही के लिए पूरी तरह से ‘अजनबी’ है। उनका कहना था कि सेवा विवाद मुख्य रूप से नियोक्ता और कर्मचारी के बीच का मामला होता है और कोई तीसरा पक्ष तब तक शिकायत नहीं कर सकता जब तक कि उसे कोई विशिष्ट विधिक क्षति न हुई हो।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने सेवा कानून के संदर्भ में ‘लोकस स्टैंडी’ और ‘व्यथित व्यक्ति’ की परिभाषा पर ध्यान केंद्रित किया। बेंच ने उल्लेख किया कि केजीएमयू संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ की श्रेणी में आता है, जिससे कर्मचारियों के साथ इसके विवाद व्यक्तियों के बीच के निजी (Private) विवादों के समान हैं।

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हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जसभाई मोतीभाई देसाई बनाम रोशन कुमार (1976) मामले का हवाला देते हुए कहा कि एक ‘व्यथित व्यक्ति’ वह है जिसके कानूनी अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा हो। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को तीन श्रेणियों में विभाजित किया: (i) व्यथित व्यक्ति, (ii) अजनबी, और (iii) अनावश्यक हस्तक्षेप करने वाला (Busybody)।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ:

  • जनहित याचिका (PIL) पर: हरि बंश लाल बनाम सहोदर प्रसाद महतो (2010) का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा, “अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) की रिट को छोड़कर, सेवा मामलों में जनहित याचिका विचारणीय नहीं है।”
  • प्रत्यक्ष प्रभाव पर: कोर्ट ने राजस्थान लोक सेवा आयोग बनाम यति जैन (2026) का हवाला देते हुए जोर दिया कि व्यथित व्यक्ति वह होना चाहिए जो किसी निर्णय से “प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित” हो।
  • वरिष्ठता पर: कोर्ट ने वरिष्ठता में बड़े अंतर को नोट किया—प्रतिवादी 73वें स्थान पर है और अपीलकर्ता 118वें स्थान पर। बेंच ने कहा, “वरिष्ठता के इतने बड़े अंतर पर, भले ही प्रतिवादी की नियुक्ति को गलत माना जाए, फिर भी यह अपीलकर्ता की वरिष्ठता या पदोन्नति की संभावना को प्रभावित नहीं कर सकता है।”

शिकायतकर्ता की भूमिका पर कोर्ट ने स्पष्ट किया: “वह एक शिकायतकर्ता हो सकता है… लेकिन ऐसे शिकायतकर्ता को केवल एक मुखबिर (Informant) माना जा सकता है… कार्यवाही में भाग लेने के उसके अधिकार को इतना नहीं बढ़ाया जा सकता कि उसे अपील दायर करने का अधिकार मिल जाए, जो केवल व्यथित व्यक्ति तक सीमित है।”

न्यायालय का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता एकल न्यायाधीश के आदेश से होने वाली किसी भी वास्तविक क्षति या प्रतिकूल प्रभाव को साबित करने में विफल रहा।

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बेंच ने निर्णय दिया, “वास्तविक क्षति के अभाव में, अपीलकर्ता को व्यथित व्यक्ति नहीं माना जा सकता।”

अपील करने की अनुमति के आवेदन को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने प्रतिवादी की नियुक्ति की वैधता पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। कोर्ट ने कहा कि यदि नियोक्ता (केजीएमयू) बहाली को चुनौती देना चाहता है, तो यह आदेश उसके आड़े नहीं आएगा।

मामले का विवरण

  • केस टाइटल: नीरज कुमार सिंह बनाम आनंद कुमार मिश्रा एवं 4 अन्य
  • केस नंबर: स्पेशल अपील डिफेक्टिव संख्या 554/2024
  • बेंच: मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह
  • दिनांक: 19 मार्च, 2026

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