कार्यात्मक दिव्यांगता से कमाई की क्षमता में वास्तविक नुकसान झलकना चाहिए; सुप्रीम कोर्ट ने 100% दिव्यांगता मानी, मुआवजा बढ़ाकर ₹97.73 लाख किया

सुप्रीम कोर्ट ने एक मोटर दुर्घटना पीड़ित के मुआवजे को बढ़ाकर ₹97,73,011 कर दिया है। कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसने मुआवजे की राशि में भारी कटौती की थी। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि अपीलकर्ता, जो एक मैनेजर के रूप में कार्यरत था, मस्तिष्क की चोट के कारण गंभीर संज्ञानात्मक दोष (Cognitive Impairment) और “मंद बौद्धिक दिव्यांगता” (Mild Intellectual Disability) से जूझ रहा है। कोर्ट के अनुसार, यह स्थिति उसे उसके पिछले पेशे के लिए पूरी तरह अनुपयुक्त बनाती है, जिसे 100% कार्यात्मक दिव्यांगता माना जाना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 5 मई, 2016 की रात को हुई एक दुर्घटना से जुड़ा है। अपीलकर्ता आर. हल्ले (R. Halle), जिनकी उम्र उस समय 30 वर्ष थी और वे फ्लाईजैक लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड (चेन्नई) में मैनेजर थे, अपनी मोटरसाइकिल से जा रहे थे। इसी दौरान आर. चिन्नादुरई द्वारा लापरवाही से चलाई जा रही एक अन्य मोटरसाइकिल ने उन्हें सामने से टक्कर मार दी।

इस टक्कर के कारण हल्ले को गंभीर चोटें आईं, जिनमें सिर की गंभीर चोट, चेहरे की चोट और बाएं पैर (femur) का फ्रैक्चर शामिल था। लंबे इलाज के बावजूद वे स्थायी रूप से दिव्यांग हो गए। उन्होंने मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT), कोयंबटूर का दरवाजा खटखटाया, जिसने उनकी शारीरिक दिव्यांगता को 63% मानते हुए ₹65,53,811 का मुआवजा देने का निर्देश दिया था।

हालांकि, मद्रास हाईकोर्ट ने जनवरी 2022 में इस मुआवजे को घटाकर ₹35,61,000 कर दिया। मेडिकल बोर्ड द्वारा 63% शारीरिक दिव्यांगता प्रमाणित करने के बावजूद, हाईकोर्ट ने बिना किसी ठोस आधार के यह निष्कर्ष निकाला कि कार्यात्मक दिव्यांगता केवल 30% मानी जानी चाहिए। इसके खिलाफ पीड़ित ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सुश्री हरिप्रिया पद्मनाभन ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट न्यूरोलॉजिकल क्षति की गंभीरता को समझने में विफल रहा। उन्होंने न्यूरोसाइकोलॉजिकल असेसमेंट रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि पीड़ित की याददाश्त (मौखिक और दृश्य दोनों) गंभीर रूप से प्रभावित हुई है और उसका IQ स्कोर 65 है, जो “मंद बौद्धिक दिव्यांगता” की श्रेणी में आता है। उन्होंने दलील दी कि एक मैनेजर के पद के लिए ये कमियां 100% कार्यात्मक दिव्यांगता के समान हैं।

दूसरी ओर, रिलायंस जनरल इंश्योरेंस की वकील सुश्री प्रेरणा मेहता ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि शारीरिक दिव्यांगता को सीधे तौर पर कार्यात्मक दिव्यांगता के बराबर नहीं माना जा सकता और इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि अपीलकर्ता किसी भी तरह का रोजगार पाने में पूरी तरह अक्षम हो गया है।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल साक्ष्यों के स्वतंत्र विश्लेषण के बिना दिव्यांगता प्रतिशत कम करने के लिए हाईकोर्ट की आलोचना की। बेंच ने कहा:

“हमारी सुविचारित राय में, साक्ष्यों की उचित सराहना किए बिना और पर्याप्त कारण दर्ज किए बिना अचानक निकाले गए ऐसे निष्कर्ष केवल अनुमानों और धारणाओं पर आधारित हैं और कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं हैं।”

कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्टों पर भरोसा करते हुए नोट किया कि चोटों के कारण आंशिक अंधापन, याददाश्त में कमी और सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित हुई है। राज कुमार बनाम अजय कुमार (2011) 1 SCC 343 के ऐतिहासिक मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि कार्यात्मक दिव्यांगता का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि उस चोट का पीड़ित के विशिष्ट पेशे पर वास्तव में क्या प्रभाव पड़ा है।

अपीलकर्ता की मैनेजर की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:

“साक्ष्य दक्षता में मामूली कमी का संकेत नहीं देते, बल्कि यह उस पेशे के लिए आवश्यक क्षमताओं के पूरी तरह खत्म होने को दर्शाता है… अपीलकर्ता न तो मैनेजर के पद के लिए उपयुक्त माना जाएगा और न ही वह उस पद की जिम्मेदारियों को निभाने में सक्षम होगा।”

कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य की कमाई की क्षमता के नुकसान की गणना के लिए कार्यात्मक दिव्यांगता को 100% माना। नया मुआवजा निम्नानुसार तय किया गया:

  • भविष्य की कमाई का नुकसान: ₹81,60,000 (100% दिव्यांगता पर)
  • चिकित्सा व्यय: ₹5,88,011
  • दर्द और पीड़ा (Pain and Sufferings): ₹5,00,000
  • सुविधाओं का नुकसान (Loss of Amenities): ₹3,00,000
  • अन्य मद (परिवहन, वैवाहिक संभावनाएं, आदि): ₹2,25,000
  • कुल राशि: ₹97,73,011
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कोर्ट ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह शेष राशि 7.5% ब्याज के साथ छह सप्ताह के भीतर जमा करे। बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट जैसे अपीलीय न्यायालयों को ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करते समय स्पष्ट और ठोस कारण देने चाहिए, क्योंकि मोटर वाहन अधिनियम एक “कल्याणकारी कानून” है जिसका उद्देश्य पीड़ितों को त्वरित न्याय और उचित मुआवजा प्रदान करना है।

केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: आर. हल्ले बनाम रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या… 2026 (SLP (Civil) डायरी नंबर 37186/2023 से उत्पन्न)
  • बेंच: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस संदीप मेहता
  • तारीख: 18 मार्च, 2026

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