अंतरिम आदेश के उल्लंघन पर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट सख्त; संपत्ति बेचने और गिरवी रखने वाले व्यक्ति को एक महीने की जेल

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने अदालत के अंतरिम आदेश की अवहेलना करते हुए संपत्ति को गिरवी रखने और बेचने के मामले में एक व्यक्ति को एक महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई है। हाईकोर्ट ने इसे “जानबूझकर की गई अवज्ञा” (Willful Disobedience) करार देते हुए स्पष्ट किया कि न्यायिक आदेशों का उल्लंघन कानून के शासन के खिलाफ है।

जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचेम की खंडपीठ ने अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी ने अदालती रोक के बावजूद न केवल संपत्ति गिरवी रखी, बल्कि उसे तीसरे पक्ष को बेच भी दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मूल रूप से एक विभाजन डिक्री (Partition Decree) से जुड़ा है। इस डिक्री के खिलाफ A.S. No. 1280 of 2017 में अपील दायर की गई थी। 16 जुलाई 2021 को हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ (Co-ordinate Bench) ने I.A. No. 1 of 2021 में एक अंतरिम आदेश पारित किया था। इस आदेश के तहत प्रतिवादी नंबर 2 (नागाथम मुकुंदा रेड्डी) को कुछ मूल दस्तावेज लौटाने की अनुमति दी गई थी, लेकिन इसके साथ कड़ी शर्तें लगाई गई थीं।

अदालत ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया था कि:

  1. प्रतिवादी इन दस्तावेजों के आधार पर विवादित संपत्ति पर किसी तीसरे पक्ष का अधिकार (Third-party rights) सृजित नहीं करेगा।
  2. इन मूल दस्तावेजों को किसी भी उद्देश्य के लिए कहीं भी गिरवी या बंधक (Pledge/Mortgage) नहीं रखा जाएगा।
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इसके बाद, प्रतिवादी ने वित्तीय जरूरतों का हवाला देते हुए इन शर्तों में ढील मांगी थी, जिसे हाईकोर्ट ने 4 अगस्त 2022 को खारिज कर दिया था।

अवमानना का कृत्य

शर्तों में बदलाव की अर्जी खारिज होने के बावजूद, प्रतिवादी मुकुंदा रेड्डी ने 7 अगस्त 2023 को तिरुपति को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड के पास संपत्ति को बंधक रख दिया। इसके बाद, 10 दिसंबर 2024 को अपील लंबित रहने के दौरान ही उसने विवादित संपत्ति के एक हिस्से को पंजीकृत सेल डीड के माध्यम से तीसरे पक्ष को बेच दिया।

मूल वाद के वादियों (याचिकाकर्ताओं) ने इस पर अवमानना याचिका दायर करते हुए कहा कि ये लेनदेन हाईकोर्ट के आदेश का घोर उल्लंघन हैं।

पक्षों की दलीलें

प्रतिवादी ने दस्तावेजों के निष्पादन की बात स्वीकार की, लेकिन तर्क दिया कि ये लेनदेन “नाममात्र” (Nominal) थे और “व्यक्तिगत एवं वित्तीय मजबूरियों” के कारण किए गए थे। उनके वकील ने दलील दी कि प्रतिवादी का इरादा कोर्ट के आदेश का अपमान करना नहीं था और खरीदारों के साथ एक ‘करारनामा’ किया गया है कि ऋण चुकाने के बाद संपत्ति वापस मिल जाएगी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के बिंदु कपूरिया बनाम शुभाशीष पांडा और सी. एलुमलाई बनाम ए.जी.एल. इरुदयाराज जैसे मामलों का हवाला दिया।

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दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि ‘करारनामा’ केवल सजा से बचने के लिए बाद में बुना गया एक बहाना है। उन्होंने तर्क दिया कि उल्लंघन पूरी तरह जानबूझकर किया गया था क्योंकि अदालत पहले ही वित्तीय आधार पर राहत देने से इनकार कर चुकी थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने प्रतिवादी के बचाव को खारिज करते हुए कहा कि डीड का निष्पादन एक “सचेत कृत्य” था। खंडपीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

“जानबूझकर की गई अवज्ञा (Willful Disobedience) का अर्थ ऐसा कार्य या चूक है जो स्वेच्छा से कानून की अवज्ञा करने या उसकी अवहेलना करने के लिए किया गया हो। यहाँ तक कि लापरवाही और असावधानी भी अवमानना के दायरे में आ सकती है।”

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एल.डी. जैकवाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का संदर्भ देते हुए “थप्पड़ मारकर माफी मांग लेने” (Slap-say sorry) वाली प्रवृत्ति की निंदा की। अदालत ने कहा कि माफी “सच्चे पश्चाताप” से आनी चाहिए, न कि सजा से बचने की “रणनीति” के रूप में।

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अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने अवमानना के आरोपों को साबित पाया और प्रतिवादी की बिना शर्त माफी को “दुर्भावनापूर्ण” (Not bona fide) करार देते हुए अस्वीकार कर दिया।

अदालत का आदेश:

  1. सजा: प्रतिवादी मुकुंदा रेड्डी को एक महीने का साधारण कारावास और 2,000 रुपये का जुर्माना
  2. हिरासत: सजा की अवधि के दौरान उन्हें सिविल जेल में रखा जाएगा।
  3. लागत (Cost): प्रतिवादी पर 10,000 रुपये का खर्च लगाया गया, जिसे आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति में जमा किया जाएगा।
  4. निर्वाह भत्ता: हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को प्रतिवादी की हिरासत के दौरान 500 रुपये प्रतिदिन की दर से निर्वाह भत्ता (Subsistence Allowance) अदालत में जमा करने का निर्देश दिया।

केस विवरण (Case Details):

  • केस का शीर्षक (Case Title): नागाथम सुनीता और अन्य बनाम नागाथम मुनि राजम्मा (मृत) और 3 अन्य
  • केस संख्या (Case Number): कंटेम्प्ट केस नंबर 1636/2025
  • पीठ (Bench): जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचेम

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