धारा 528 बीएनएसएस के तहत साक्ष्यों और विवादित तथ्यों का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता: आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इलाहाबाद हाईकोर्ट का इनकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 528 के तहत दायर एक याचिका को खारिज कर दिया है। इस याचिका में घर में घुसकर मारपीट करने और महिला की लज्जा भंग करने के मामले में दाखिल चार्जशीट और ट्रायल कोर्ट के समन आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साक्ष्यों का मूल्यांकन, गवाहों के बयानों में विरोधाभास और क्या कोई एफआईआर क्रॉस-केस के जवाब में दुर्भावनापूर्ण ‘काउंटरब्लास्ट’ है, यह तय करना पूरी तरह से ट्रायल कोर्ट का काम है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 9 अगस्त 2023 को 73 वर्षीय शिकायतकर्ता प्रेम कुमार जोएल द्वारा दर्ज कराई गई एक एफआईआर से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मुख्य आरोपी मो. जीशान सिद्दीकी शिकायतकर्ता का ड्राइवर था, जिसे उसकी पत्नी ने घर के एक खाली कमरे में कुछ समय रुकने की अनुमति दी थी। आरोप है कि बाद में सिद्दीकी ने कमरा खाली करने से मना कर दिया और उसका गलत तरीके से इस्तेमाल करने लगा।

एफआईआर के अनुसार, 24 जुलाई 2023 की दोपहर को सिद्दीकी और उसके साथियों ने कथित तौर पर शिकायतकर्ता के घर में घुसकर उसके साथ अभद्रता की। जब शिकायतकर्ता की बहू बीच-बचाव करने आई, तो आरोपियों ने उसके साथ भी बदसलूकी की, उसकी लज्जा भंग की और कपड़े फाड़ दिए। पड़ोसियों ने सिद्दीकी और उसके एक साथी को पकड़कर एक कमरे में बंद कर दिया और बाद में पुलिस को सौंप दिया।

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जांच के बाद पुलिस ने सिद्दीकी और दो अन्य के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (आईपीसी) की धारा 354ख, 452, 352, 323, 504, 506 और 448 के तहत चार्जशीट दाखिल की। 21 मार्च 2024 को सिविल जज (जूनियर डिवीजन), कोर्ट नंबर 21, इलाहाबाद ने चार्जशीट पर संज्ञान लेते हुए समन आदेश जारी किया, जिसे आवेदकों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

पक्षों की दलीलें

आवेदकों के वकील ने तर्क दिया कि पुलिस जांच ठीक से नहीं हुई है और गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं। उनका दावा था कि यह विवाद मूल रूप से दीवानी प्रकृति (सिविल नेचर) का है, जो शिकायतकर्ता और सिद्दीकी की कंपनी ‘जुलेक्स इन्फ्रा एस्टेट प्रा. लिमिटेड’ के बीच एक बिल्डर एग्रीमेंट से उपजा है। आवेदकों के अनुसार, शिकायतकर्ता भूतल (ग्राउंड फ्लोर) पर रहता था जबकि सिद्दीकी प्रथम तल पर अपना ऑफिस चलाता था, लेकिन दुर्भावना के चलते शिकायतकर्ता ने उनका बिजली कनेक्शन काट दिया।

आवेदकों ने आगे आरोप लगाया कि 24 जुलाई 2023 को वास्तव में शिकायतकर्ता ने सिद्दीकी के साथ मारपीट की थी, 50,000 रुपये लूट लिए थे और सीसीटीवी कैमरे तोड़ दिए थे। इस घटना की एफआईआर आवेदकों ने 4 अगस्त 2023 को दर्ज कराई थी। उनका तर्क था कि उनके खिलाफ दर्ज मौजूदा आपराधिक मामला उनकी एफआईआर के जवाब में एक ‘काउंटरब्लास्ट’ (बदले की कार्रवाई) मात्र है।

दूसरी ओर, विपक्षी के वकील और राज्य के ए.जी.ए. (A.G.A) ने दलील दी कि एफआईआर सही तथ्यों पर आधारित है और प्रथम दृष्टया एक संज्ञेय अपराध स्पष्ट रूप से बनता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि धारा 528 बीएनएसएस के तहत साक्ष्यों की जांच करना एक मिनी-ट्रायल करने जैसा होगा, जिसकी इस स्तर पर अनुमति नहीं दी जा सकती।

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कोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस संजीव कुमार ने धारा 528 बीएनएसएस (जो सीआरपीसी की धारा 482 के समतुल्य है) के दायरे का परीक्षण किया। कोर्ट ने कहा कि न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने या न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए बहुत ही दुर्लभ मामलों (rarest of rare cases) में किया जाना चाहिए।

कानूनी रूपरेखा स्पष्ट करने के लिए, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मधु लिमये बनाम महाराष्ट्र राज्य (AIR 1978 SC 47) और हरियाणा राज्य बनाम चौधरी भजन लाल (1992 Supp. (1) SCC 335) मामलों के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया, जो आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के सिद्धांत तय करते हैं।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, हाईकोर्ट ने पाया कि एफआईआर में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध बनाते हैं। क्रॉस-एफआईआर और लंबित दीवानी विवाद के बचाव पर कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

“वर्तमान मामला आवेदक नंबर 1 द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर का ‘काउंटरब्लास्ट’ है या नहीं, यह ट्रायल कोर्ट को तय करना है जिसके लिए साक्ष्यों के मूल्यांकन की आवश्यकता है और यह न्यायालय, इस कार्यवाही में, इन सब बातों की जांच करके इस संबंध में कोई राय नहीं बना सकता है।”

धारा 528 बीएनएसएस के तहत अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाएं स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने आगे कहा:

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“यह न्यायालय धारा 528 बीएनएसएस के तहत कार्यवाही में साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं कर सकता, और आवेदक की ओर से उठाए गए विवादित तथ्यों पर राय नहीं बना सकता जो कि ट्रायल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में है। जांच अधिकारी द्वारा दर्ज किए गए गवाहों के बयानों में विरोधाभास, यदि कोई हो, का प्रभाव भी ट्रायल कोर्ट को ही तय करना है। प्रथम दृष्टया सिविल केस के लंबित होने का भी इस मामले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।”

फैसला

कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि आवेदकों के खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध के गठन को दर्शाते हैं। चूंकि विवादित तथ्यों का मूल्यांकन मौजूदा कार्यवाही में नहीं किया जा सकता, इसलिए हाईकोर्ट ने अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करने का कोई ठोस कारण नहीं पाया। परिणामस्वरूप, धारा 528 बीएनएसएस के तहत दायर आवेदन को गुण-दोष के अभाव में खारिज कर दिया गया।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: मो. जीशान सिद्दीकी और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस नंबर: धारा 528 बीएनएसएस के तहत आवेदन नंबर 28695 वर्ष 2025
  • बेंच: जस्टिस संजीव कुमार
  • आदेश की तिथि: 16 मार्च 2026
  • आवेदकों के वकील: एस.एम.ए. अब्दी, अर्शी अब्दी, सैयद मोहम्मद अब्बास अब्दी, शाद खान
  • विपक्षी के वकील: आजाद सिंह, शैलेश कुमार पांडेय, जी.ए.

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