मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर पीठ ने दहेज उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में पति के माता-पिता के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया है। अदालत ने कहा कि एफआईआर और चार्जशीट में उनके विरुद्ध केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोप लगाए गए हैं और कोई ऐसा ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सके। हालांकि पति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रहेगी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मिस. क्रिमिनल केस नंबर 12666/2025 (लोकेंद्र सिंह राठौर व अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य) से संबंधित है, जिस पर 11 मार्च 2026 को न्यायमूर्ति विनय सराफ ने सुनवाई की।
याचिका भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 सहपठित धारा 482 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत दायर की गई थी, जिसमें थाना नौगांव, जिला छतरपुर में दर्ज अपराध क्रमांक 08/2025 से उत्पन्न आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने की मांग की गई थी।
एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराएं 85, 115(2), 296, 351(2), 3(5) तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत अपराध दर्ज किए गए थे।
याचिकाकर्ताओं में लोकेंद्र सिंह राठौर (पति), ओम प्रकाश राठौर (ससुर) और गीता देवी राठौर (सास) शामिल थे। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने पति की ओर से याचिका को आगे न बढ़ाने की बात कही, जिसके बाद अदालत ने पति के संबंध में याचिका खारिज कर दी और शेष याचिकाकर्ताओं के मामले पर सुनवाई जारी रखी।
शिकायतकर्ता के आरोप
शिकायतकर्ता शालिनी राठौर के अनुसार उसकी शादी 13 फरवरी 2024 को लोकेंद्र राठौर से हुई थी। विवाह के तुरंत बाद उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा।
शिकायत में कहा गया कि विवाह के समय उसके माता-पिता ने दहेज में कई वस्तुएं दी थीं, लेकिन आरोपी संतुष्ट नहीं थे और अतिरिक्त दहेज की मांग कर रहे थे। कथित मांगों में चार पहिया वाहन, एसी, दो तोला सोने की चेन, अंगूठी और पांच लाख रुपये नकद शामिल थे।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि इन मांगों को लेकर उसे गालियां दी गईं और मारपीट की गई। अंततः 22 फरवरी 2024 को वह ससुराल छोड़कर अपने माता-पिता के घर रहने लगी।
शिकायतकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि सास और ससुर ने भी दहेज मांगने और प्रताड़ना में सक्रिय भूमिका निभाई।
याचिकाकर्ताओं के तर्क
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि सास और ससुर को केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर मामले में शामिल किया गया है। उनके खिलाफ एफआईआर में कोई विशिष्ट घटना या भूमिका नहीं बताई गई है और चार्जशीट में भी कोई ठोस साक्ष्य नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले कहकशां कौसर बनाम बिहार राज्य (2022) 6 SCC 599 सहित कई निर्णयों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि केवल सामान्य आरोपों के आधार पर पति के रिश्तेदारों को मुकदमे में शामिल करना उचित नहीं है।
अदालत का विश्लेषण
मामले के रिकॉर्ड और चार्जशीट का परीक्षण करने के बाद हाई कोर्ट ने पाया कि सास और ससुर के खिलाफ लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट प्रकृति के हैं।
अदालत ने कहा:
“एफआईआर में याचिकाकर्ता क्रमांक 2 और 3 के खिलाफ केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोप लगाए गए हैं और चार्जशीट से भी यह स्पष्ट है कि जांच अधिकारी ने पति के निकट संबंधियों के खिलाफ अभियोजन चलाने के लिए कोई विश्वसनीय साक्ष्य एकत्र नहीं किया है।”
अदालत ने यह भी कहा कि जांच के दौरान दर्ज किए गए बयान भी केवल एफआईआर की सामग्री की पुनरावृत्ति प्रतीत होते हैं और उनमें कोई विशिष्ट आरोप नहीं है।
न्यायालय ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का उल्लेख किया, जिनमें Preeti Gupta v. State of Jharkhand (2010) 7 SCC 667, Geeta Mehrotra v. State of U.P. (2012) 10 SCC 741 तथा Achin Gupta v. State of Haryana (2024 SCC OnLine SC 759 शामिल हैं। इन निर्णयों में कहा गया है कि वैवाहिक विवादों में पति के सभी रिश्तेदारों को बिना ठोस आरोपों के अभियोजन का सामना कराने से न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हो सकता है।
अदालत का निर्णय
हाई कोर्ट ने माना कि सास और ससुर को केवल सामान्य आरोपों के आधार पर आपराधिक मुकदमे का सामना कराने के लिए बाध्य करना न्यायसंगत नहीं होगा।
अदालत ने आदेश दिया:
“थाना नौगांव, जिला छतरपुर में दर्ज अपराध क्रमांक 08/2025 को याचिकाकर्ता क्रमांक 2 ओम प्रकाश राठौर और याचिकाकर्ता क्रमांक 3 श्रीमती गीता देवी राठौर के संबंध में तथा उससे उत्पन्न आपराधिक कार्यवाही को निरस्त किया जाता है।”
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि पति लोकेंद्र सिंह राठौर के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रहेगी।
इस प्रकार, याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया गया।

