सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को देहरादून में प्रस्तावित ‘सैन्य धाम’ युद्ध स्मारक के निर्माण को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता को कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि देश के लिए बलिदान देने वाले सैनिकों के प्रति सम्मान होना चाहिए। अदालत ने याचिका को लागत के साथ खारिज करने का संकेत दिया, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांग ली।
यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ के समक्ष आया। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा, “आपको युद्ध स्मारक के निर्माण से क्या समस्या है?”
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “जिन लोगों ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है, कम से कम उनके प्रति सम्मान तो होना चाहिए।”
पीठ ने यह भी कहा कि इस प्रकार की याचिका को उच्च न्यायालय को उदाहरणात्मक लागत के साथ खारिज करना चाहिए था। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि वह याचिकाकर्ता को नोटिस जारी कर यह जानने के लिए जांच कर सकती है कि यह याचिका किसके कहने पर दाखिल की गई है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम उसे कारण बताओ नोटिस जारी करेंगे। उसे आकर बताना होगा कि वह यह याचिका किसके कहने पर दाखिल कर रहा है।”
जब याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि युद्ध स्मारक का निर्माण भी सही तरीके से नहीं हो रहा है, तो अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि यह “शरारतन दायर की गई रिट याचिका” प्रतीत होती है।
पीठ ने संकेत दिया कि याचिका को एक लाख रुपये की लागत के साथ खारिज किया जाएगा। इसके बाद याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
यह विवाद उत्तराखंड हाईकोर्ट के जनवरी में दिए गए उस आदेश से जुड़ा था जिसमें देहरादून जिले में प्रस्तावित ‘सैन्य धाम’ युद्ध स्मारक के लिए भूमि आवंटन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी गई थी।
याचिकाकर्ता का दावा था कि जिस भूमि पर युद्ध स्मारक बनाया जा रहा है वह वन भूमि है, इसलिए वहां निर्माण कार्य नहीं होना चाहिए।
हालांकि, राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि राजस्व और वन विभाग के अधिकारियों द्वारा संयुक्त सर्वेक्षण किया गया था। संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया कि संबंधित भूमि वन क्षेत्र का हिस्सा नहीं है।
राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि वन विभाग ने भूमि आवंटन पर कोई आपत्ति नहीं जताई है और स्मारक का निर्माण कार्य वर्ष 2021 में शुरू हुआ था, जो अब लगभग पूरा हो चुका है।
इन तथ्यों के आधार पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा था, “जब वन विभाग द्वारा भूमि का निरीक्षण कर यह प्रमाणित कर दिया गया है कि यह वन भूमि का हिस्सा नहीं है, तो युद्ध स्मारक के निर्माण को चुनौती देने का आधार विधिक रूप से टिकाऊ नहीं है।”

