सीनियरिटी के लिए ट्रेनिंग पीरियड ‘ड्यूटी’ माना जाएगा: सुप्रीम कोर्ट ने TNEB सीधी भर्ती मामले में हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सीधी भर्ती के माध्यम से नियुक्त उम्मीदवारों द्वारा पूरे किए गए ट्रेनिंग पीरियड को सीनियरिटी (वरिष्ठता) निर्धारित करने के लिए गिना जाना चाहिए। कोर्ट के अनुसार, संबंधित सेवा नियमों के तहत ट्रेनिंग की अवधि “ड्यूटी” पर होना माना जाता है।

जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि सीनियरिटी केवल उस तारीख से शुरू होनी चाहिए जब उम्मीदवार की प्रोबेशन अवधि शुरू होती है। हाईकोर्ट के इस आदेश ने प्रभावी रूप से ट्रेनिंग पीरियड को वरिष्ठता गणना से बाहर कर दिया था।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह विवाद तमिलनाडु इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (TNEB) में असिस्टेंट इंजीनियरों (AE) की आपसी सीनियरिटी को लेकर था। इस मामले में दो पक्ष शामिल थे: पहला, वे जो दिसंबर 2000 और मार्च 2001 के बीच सीधी भर्ती के जरिए नियुक्त हुए थे, और दूसरा, वे जो मई 2002 में बोर्ड के भीतर से आंतरिक चयन (प्रमोशन) के माध्यम से नियुक्त हुए थे।

दिसंबर 2000 में, बोर्ड ने ‘बोर्ड प्रोसीडिंग’ (BP) नंबर 35 जारी किया था, जिसमें सीधी भर्ती वालों के लिए ₹7,500 के समेकित वेतन पर दो साल की ट्रेनिंग और उसके बाद दो साल की प्रोबेशन अवधि अनिवार्य की गई थी। हालांकि, 23 अप्रैल 2002 को बोर्ड ने BP नंबर 9 जारी कर इस ट्रेनिंग पीरियड को दो साल से घटाकर तीन महीने कर दिया। आंतरिक उम्मीदवारों ने इसका विरोध करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया, जहां हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने पूरी सीनियरिटी लिस्ट को नए सिरे से बनाने का निर्देश दिया था।

पक्षों की दलीलें

बोर्ड और सीधी भर्ती वाले उम्मीदवारों ने तर्क दिया कि तमिलनाडु इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (सेवा नियमावली), 1967 के तहत ‘ड्यूटी’ शब्द में स्पष्ट रूप से ट्रेनिंग शामिल है। उनका कहना था कि सीनियरिटी मेरिट लिस्ट में रैंक द्वारा तय की जाती है और नियुक्ति की तारीख वही होती है जब कोई व्यक्ति ट्रेनिंग शुरू करता है।

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वहीं, आंतरिक उम्मीदवारों का तर्क था कि सीधी भर्ती वाले केवल “ट्रेनी” थे और प्रोबेशन शुरू होने तक वे सेवा के नियमित सदस्य नहीं थे। उन्होंने दावा किया कि ट्रेनिंग की अवधि घटाना नियम 97 को दरकिनार करने का एक प्रशासनिक तरीका था।

कोर्ट का विश्लेषण और नियमों की व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस विवाद का “पूर्ण उत्तर” सेवा नियमावली की स्पष्ट भाषा में निहित है, न कि बोर्ड के उन विभिन्न आदेशों में जिन्होंने भ्रम पैदा किया।

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कोर्ट ने नियम 10(9) का उल्लेख किया, जो ‘ड्यूटी’ को परिभाषित करता है:

“एक व्यक्ति को तब ड्यूटी पर कहा जाता है जब (a) वह किसी पद के कर्तव्यों का पालन कर रहा हो या किसी सेवा वर्ग में पद के लिए निर्धारित प्रोबेशन, निर्देश या ट्रेनिंग से गुजर रहा हो।”

इसके अलावा, नियम 87(1) स्पष्ट करता है कि एक व्यक्ति को “सेवा वर्ग में नियुक्त” तब माना जाता है जब वह पहली बार पद के कर्तव्यों का निर्वहन करता है या “प्रोबेशन, निर्देश या ट्रेनिंग” शुरू करता है।

वरिष्ठता से संबंधित नियम 97 पर पीठ ने टिप्पणी की:

“सीनियरिटी की गणना उस मेरिट लिस्ट में उम्मीदवार के स्थान से की जानी चाहिए जो भर्ती के समय तैयार की गई थी… मेरिट, प्रोबेशन के पूरा होने को प्रभावित नहीं करेगी।”

ट्रेनिंग और BP नंबर 9 पर कोर्ट की टिप्पणियां

पीठ ने हाईकोर्ट द्वारा BP नंबर 9 पर अधिक ध्यान देने की आलोचना की और इसे सीनियरिटी तय करने के लिए अप्रासंगिक बताया। कोर्ट ने कहा:

“यह नियोक्ता का विवेक है कि किसी पद के लिए चुने गए उम्मीदवार को कितनी अवधि की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए… उक्त आदेश में सीनियरिटी के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया था। यह केवल आंतरिक उम्मीदवारों की कल्पना मात्र थी।”

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया:

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“नियुक्ति पत्र या किसी आदेश में कही गई ऐसी कोई भी बात जो नियम 10(9) और 87 की स्पष्ट भाषा के विपरीत है, इस राय में बाधा नहीं बनेगी कि सीधी भर्ती वाले की वरिष्ठता उनके ज्वाइन करने की पहली तारीख से ही गिनी जाएगी। वह अवधि कितनी थी, यह अप्रासंगिक है।”

फैसला

अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को दरकिनार कर दिया। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट की यह राय कि “सीनियरिटी केवल प्रोबेशन शुरू होने पर शुरू होती है”, पूरी तरह से गलत थी और सेवा नियमों का समर्थन इसे प्राप्त नहीं था। कोर्ट ने सीधी भर्ती वाले उम्मीदवारों की पुरानी सीनियरिटी को बहाल कर दिया।

केस विवरण

  • केस का नाम: एम. थनिगीवेलु और अन्य बनाम तमिलनाडु इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील नंबर 862/2026 (संबंधित मामलों के साथ)
  • पीठ: जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई
  • फैसले की तारीख: 11 मार्च, 2026

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