सुप्रीम कोर्ट ने म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ ग्रेटर मुंबई (MCGM) द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए कहा है कि यदि कोई पक्ष मध्यस्थता की कार्यवाही में भाग लेता है और बार-बार मध्यस्थों की नियुक्ति पर मौन सहमति (Acquiescence) जताता है, तो वह बाद में ट्रिब्यूनल के गठन को चुनौती नहीं दे सकता।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि की। पीठ ने कहा कि MCGM का आचरण स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उसने मध्यस्थता क्लॉज को एक सक्षम (Enabling) प्रावधान के रूप में स्वीकार किया था, न कि किसी प्रतिबंधात्मक नियम के रूप में।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 1995 के एक समझौते से जुड़ा है, जो MCGM और कनाडा की एक इंजीनियरिंग फर्म, मेसर्स आर.वी. एंडरसन एसोसिएट्स लिमिटेड के बीच सीवरेज ऑपरेशंस के अपग्रेडेशन के लिए हुआ था। 2001 में काम पूरा होने के बाद बकाया भुगतान को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ।
अगस्त 2005 में, प्रतिवादी (कनाडाई फर्म) ने मध्यस्थता क्लॉज का उपयोग किया। दोनों पक्षों ने अपने-अपने नामित मध्यस्थों—प्रतिवादी की ओर से जस्टिस एस.एम. झुनझुनवाला (रिटायर्ड) और MCGM की ओर से श्री शरद उपासनी को नियुक्त किया। 2007 से 2008 के बीच, इन दोनों मध्यस्थों ने तीन अलग-अलग पीठासीन मध्यस्थों (Presiding Arbitrators) की नियुक्ति की कोशिश की: जस्टिस डी.आर. धानुका (रिटायर्ड), श्री जॉन सैवेज, और अंत में सिंगापुर के श्री अनवरुल हक।
MCGM ने मध्यस्थता की कार्यवाही में भाग लिया, लेकिन 9 जनवरी, 2009 को श्री हक के साथ एक प्रारंभिक बैठक में शामिल होने के बाद, ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) को चुनौती दी। उनका तर्क था कि समझौते के क्लॉज 8.3(b) के तहत, यदि नामित मध्यस्थ 30 दिनों के भीतर तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति नहीं करते, तो उनका अधिकार समाप्त हो जाता है और केवल वाशिंगटन डी.सी. स्थित ICSID ही यह नियुक्ति कर सकता था।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता (MCGM) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सिद्धार्थ भटनागर ने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल का गठन अवैध (Coram Non Judice) था। उन्होंने क्लॉज 8.3(b) में “shall” शब्द के उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि 30 दिन बीत जाने के बाद तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति केवल ICSID के महानिदेशक द्वारा ही की जानी अनिवार्य थी। उन्होंने इसे एक “बुनियादी क्षेत्राधिकार संबंधी दोष” बताया।
प्रतिवादी (मेसर्स आर.वी. एंडरसन एसोसिएट्स) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री श्याम दीवान ने दलील दी कि क्लॉज 8.3(b) केवल गतिरोध को सुलझाने का एक अतिरिक्त रास्ता था, न कि नामित मध्यस्थों के अधिकार छीनने का जरिया। उन्होंने कहा कि चूंकि MCGM वर्षों तक बिना किसी आपत्ति के कार्यवाही में शामिल रहा, इसलिए उसने आर्बिट्रेशन एक्ट, 1996 की धारा 4 के तहत आपत्ति करने का अपना अधिकार खो दिया है।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से दो पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया: क्लॉज 8.3(b) की व्याख्या और पक्षों का आचरण।
1. मध्यस्थता क्लॉज की व्याख्या: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह क्लॉज “स्वभाव से सक्षम (Enabling)” है। पीठ ने नोट किया कि अनुबंध में यह कहीं नहीं लिखा था कि 30 दिन बाद नामित मध्यस्थ अपना अधिकार खो देंगे। पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“क्लॉज का उद्देश्य यह प्रतीत होता है कि यदि दोनों मध्यस्थ तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति में देरी करते हैं, तो पक्षों के पास उस देरी को दूर करने का अधिकार सुरक्षित रहता है… [किसी भी पक्ष के अनुरोध पर] ICSID तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति करेगा।”
कोर्ट ने कहा कि “shall” शब्द ICSID के महानिदेशक के लिए तब अनिवार्य होता है जब कोई पक्ष अनुरोध करे, लेकिन यह नामित मध्यस्थों की मूल शक्ति को खत्म नहीं करता।
2. आचरण और मौन सहमति (Acquiescence): पीठ ने 2005 से 2009 के बीच MCGM के व्यवहार की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने पाया कि MCGM समय सीमा से पूरी तरह अवगत था, लेकिन तीन अलग-अलग पीठासीन मध्यस्थों की नियुक्ति के दौरान “चुपचाप बैठा रहा”। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“कोई भी पक्ष अपनी आस्तीन में ‘ज्यूरिस्डिक्शनल इक्का’ (Jurisdictional Ace) छिपाकर नहीं रख सकता और बाद में यह दावा नहीं कर सकता कि धारा 16 के तहत दी गई चुनौती पुराने आचरण और मौन सहमति को मिटा देगी… यदि इसकी अनुमति दी गई, तो यह मध्यस्थता के बुनियादी सिद्धांतों और वैकल्पिक विवाद समाधान की भावना को नष्ट कर देगा।”
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मध्यस्थ ट्रिब्यूनल द्वारा अनुबंध की व्याख्या “निश्चित रूप से एक उचित दृष्टिकोण” थी। कंसोलिडेटेड कंस्ट्रक्शन कंसोर्टियम लिमिटेड बनाम सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स ऑफ इंडिया (2025) जैसे पिछले फैसलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने मध्यस्थता के फैसलों में न्यूनतम न्यायिक हस्तक्षेप के सिद्धांत को दोहराया।
अपीलें खारिज कर दी गईं और MCGM को कनाडाई फर्म को अमेरिकी डॉलर और भारतीय रुपये में बकाया राशि, साथ ही 16 जून 2004 से भुगतान तक 14% वार्षिक ब्याज देने का आदेश बरकरार रखा गया।
केस विवरण:
- केस टाइटल: म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ ग्रेटर मुंबई बनाम मेसर्स आर.वी. एंडरसन एसोसिएट्स लिमिटेड
- साइटेशन: 2026 INSC 228
- पीठ: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
- फैसले की तारीख: 11 मार्च, 2026

