साक्ष्यों के अभाव और अभियुक्तों की पहचान न होने के कारण अभियोजन पक्ष विफल: दिल्ली हाईकोर्ट ने PWD इंजीनियरों की बरी होने के फैसले को रखा बरकरार

दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 2003 में CPWD के एक मुख्य अभियंता (Chief Engineer) के साथ मारपीट करने के आरोपी दो सहायक इंजीनियरों को बरी किए जाने के खिलाफ राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अभियुक्तों की पहचान और उनकी विशिष्ट भूमिका को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि मुख्य शिकायतकर्ता की गवाही को अन्य चश्मदीद गवाहों का समर्थन प्राप्त नहीं था।

न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि IPC की धारा 186 और 353 के तहत अपराध के आवश्यक तत्वों को साबित करने के लिए विश्वसनीय प्रत्यक्ष साक्ष्य (ocular evidence) मौजूद नहीं थे। ऐसे में निचली अपीलीय अदालत द्वारा अभियुक्तों को बरी करने का निर्णय बिल्कुल सही था।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह घटना 26 जून, 2003 को कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित कर्जन रोड बैरक कार्यालय में हुई थी। तत्कालीन मुख्य अभियंता (PW1) ने शिकायत दर्ज कराई थी कि दोपहर करीब 3:05 बजे लगभग 20 लोगों की भीड़ अचानक उनके कार्यालय में घुस आई। आरोप था कि भीड़ ने सुरक्षाकर्मियों पर काबू पा लिया और शिकायतकर्ता के सिर व गर्दन पर हमला किया।

शिकायत में कहा गया था कि इस हंगामे के दौरान शिकायतकर्ता का चश्मा टूट गया और टेलीफोन उपकरण फर्श पर फेंक दिए गए। घटना के बाद, शिकायतकर्ता ने PWD के दो सहायक इंजीनियरों, ओम प्रकाश (A1) और एक अन्य (A2) की पहचान भीड़ के सदस्यों के रूप में की थी। ट्रायल कोर्ट ने 2014 में दोनों को दोषी ठहराया था, लेकिन पटियाला हाउस कोर्ट स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने इस फैसले को पलटते हुए उन्हें बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ दिल्ली सरकार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

पक्षों के तर्क

राज्य सरकार की ओर से: अतिरिक्त लोक अभियोजक ने तर्क दिया कि अपीलीय अदालत ने केवल इस आधार पर मामला खारिज कर दिया कि शिकायतकर्ता की गवाही अकेली थी। उन्होंने दलील दी कि किसी तथ्य को साबित करने के लिए गवाहों की किसी निश्चित संख्या की आवश्यकता नहीं होती और यदि गवाही विश्वसनीय हो, तो एकमात्र गवाह के आधार पर भी दोषसिद्धि संभव है।

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अभियुक्तों की ओर से: प्रतिवादियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश टमटा ने दलील दी कि बरी करने का फैसला साक्ष्यों की सही सराहना पर आधारित है। उन्होंने कहा कि ट्रायल के दौरान हमलावरों की पहचान स्थापित करने में अभियोजन पूरी तरह विफल रहा और यह मामला केवल प्रतिशोध की भावना से दर्ज किया गया था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता (PW1) और अन्य गवाहों (PW3, PW5, और PW6) के बयानों का बारीकी से परीक्षण किया।

पहचान और गवाहों के विरोधाभास पर: कोर्ट ने पाया कि जहाँ शिकायतकर्ता ने अपने आरोपों को दोहराया, वहीं अन्य महत्वपूर्ण गवाहों ने उनके बयानों का समर्थन नहीं किया:

  • स्टेनोग्राफर (PW3): उन्होंने गवाही दी कि उन्होंने भीड़ को किसी के साथ दुर्व्यवहार करते नहीं देखा और न ही कार्यालय में कोई सामान टूटा हुआ पाया। उन्होंने अभियुक्तों को पहचानने से भी इनकार कर दिया।
  • इंजीनियर (PW5 और PW6): इन गवाहों ने बताया कि उन्होंने नारेबाजी जरूर सुनी थी, लेकिन जब वे कमरे में पहुंचे तो उन्होंने कोई मारपीट या तोड़फोड़ नहीं देखी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि ये गवाह कोर्ट में अभियुक्तों की पहचान करने में भी असमर्थ रहे।
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कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी: हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा:

“अभियुक्तों की पहचान और उनमें से प्रत्येक को दी गई विशिष्ट भूमिका स्थापित नहीं हो सकी है, क्योंकि उक्त गवाह अभियुक्तों की पहचान करने में विफल रहे हैं। PW1 की गवाही भी अभियुक्तों के खिलाफ आरोपित अपराधों के तत्वों को संदेह से परे साबित नहीं करती है।”

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि शिकायतकर्ता का कोई मेडिकल परीक्षण नहीं कराया गया था क्योंकि उनके शरीर पर चोट के कोई दृश्य निशान नहीं थे।

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अदालत का निर्णय

बरी किए जाने के फैसले की पुष्टि करते हुए, हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अपीलीय अदालत के निर्णय में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। न्यायमूर्ति सुधा ने फैसला सुनाते हुए कहा कि विश्वसनीय प्रत्यक्ष साक्ष्यों की अनुपस्थिति में अभियुक्तों को बरी करना उचित था। राज्य सरकार की अपील को “गुणहीन” (sans merit) बताते हुए खारिज कर दिया गया।

  • केस का शीर्षक: स्टेट (NCT दिल्ली सरकार) बनाम ओम प्रकाश और अन्य
  • केस संख्या: CRL.A. 742/2016

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