रेप केस में डिस्चार्ज के खिलाफ अपील विचारणीय नहीं; पीड़िता के पास रिवीजन ही एकमात्र कानूनी विकल्प: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए बलात्कार (रेप) के मामले में आरोपी को दोषमुक्त (डिस्चार्ज) किए जाने के खिलाफ दायर की गई पीड़िता की अपील को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी को डिस्चार्ज करने का आदेश कोई ‘अंतरवर्ती आदेश’ (Interlocutory Order) नहीं है, इसलिए इसके खिलाफ धारा 372 के तहत अपील करने के बजाय दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 397(1) के तहत ‘रिवीजन’ (पुनरीक्षण याचिका) दायर की जानी चाहिए।

यह निर्णय न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा द्वारा XYZ बनाम राज्य (NCT दिल्ली) व अन्य (CRL.A. 1090/2024) के मामले में सुनाया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला ग्रेटर कैलाश-1 थाने में दर्ज एक शिकायत से जुड़ा है। अपीलकर्ता (पीड़िता) का आरोप था कि उसने आरोपी (प्रतिवादी संख्या 2) को अपने सोने के आभूषण दिए थे। जब उसने आभूषण वापस मांगे, तो आरोपी ने कथित तौर पर शारीरिक संबंध बनाने की शर्त रखी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने पीड़िता की इच्छा के विरुद्ध उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।

पुलिस ने जांच पूरी कर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया था। हालांकि, 2 अगस्त 2024 को साकेत स्थित स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट (अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश) ने आरोपी को डिस्चार्ज कर दिया। ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष था कि आरोपी के खिलाफ अपराध का कोई प्रथम दृष्टया मामला या “मजबूत संदेह” नहीं बनता है।

पक्षकारों की दलीलें

पीड़िता ने ट्रायल कोर्ट के डिस्चार्ज आदेश को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 413 और Cr.P.C. की धारा 372 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।

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सुनवाई के दौरान यह देखा गया कि अपीलकर्ता नियमित रूप से अदालत में पेश नहीं हो रही थी। राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) ने अपील की विचारणीयता (Maintainability) पर प्रारंभिक आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि डिस्चार्ज के आदेश के खिलाफ अपील कानूनी रूप से मान्य नहीं है और पीड़िता को इसके लिए रिवीजन पिटीशन दायर करनी चाहिए थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

अपीलकर्ता की अनुपस्थिति के बावजूद, हाईकोर्ट ने बनी सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1996) 4 SCC 720 के सिद्धांतों का पालन करते हुए मामले पर गुणा-गुण (Merits) के आधार पर विचार किया।

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न्यायमूर्ति सुधा ने डिस्चार्ज आदेश की कानूनी प्रकृति पर गौर किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि डिस्चार्ज एक अंतिम आदेश की तरह होता है जो उस विशिष्ट कार्यवाही को समाप्त करता है, अतः यह इंटरलोकेटरी ऑर्डर नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा:

“किसी आरोपी का डिस्चार्ज स्पष्ट रूप से Cr.PC की धारा 397(2) के तहत परिकल्पित अंतरवर्ती आदेश (Interlocutory Order) नहीं है। इसलिए, अपीलकर्ता के पास उपलब्ध कानूनी उपाय Cr.PC की धारा 397(1) के तहत रिवीजन फाइल करना है।”

अदालत ने अपने निष्कर्ष की पुष्टि के लिए हरियाणा एलआरबी कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम हरियाणा राज्य (1990) 3 SCC 588 के मामले का संदर्भ लिया।

न्यायालय का निर्णय

दिल्ली हाईकोर्ट ने कानूनी प्रावधानों और पूर्व नजीरों के आधार पर माना कि पीड़िता द्वारा दायर अपील विचारणीय नहीं है। अदालत ने अपने फैसले में कहा:

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“परिणामस्वरूप, अपील को विचारणीय न होने के कारण खारिज किया जाता है।”

इसके साथ ही, मामले में लंबित सभी आवेदनों को भी समाप्त कर दिया गया।

  • केस का शीर्षक: XYZ बनाम राज्य (NCT दिल्ली), SHO, थाना- GK-1, नई दिल्ली एवं अन्य के माध्यम से
  • केस संख्या: CRL.A. 1090/2024

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