मौखिक सुनवाई का अवसर अनिवार्य, कर्मचारी द्वारा मांग न करने पर भी जांच अधिकारी का कर्तव्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक लेखपाल की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि विभागीय जांच के दौरान मौखिक सुनवाई का अवसर न देना पूरी कार्यवाही को दूषित करता है। कोर्ट ने महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला कि भले ही आरोपी कर्मचारी ने व्यक्तिगत सुनवाई की मांग न की हो, उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 के तहत यह जांच अधिकारी का अंतर्निहित कर्तव्य है कि वह इसके लिए तिथि और समय निर्धारित करे।

यह आदेश न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकल पीठ ने राम स्वरूप शुक्ला द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने 17 दिसंबर 2009 के बर्खास्तगी आदेश और 30 अप्रैल 2010 के अपीलीय आदेश को चुनौती दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

वर्ष 1980 में नियुक्त लेखपाल राम स्वरूप शुक्ला वर्ष 2008 में झांसी के डोमागोर क्षेत्र में तैनात थे। उनके खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गई थीं। पहली एफआईआर में आरोप था कि उन्होंने एक जीवित व्यक्ति (बृज किशोर) को मृत घोषित कर गलत तरीके से नामान्तरण (mutation) किया। हालांकि, पुलिस जांच में पाया गया कि बृज किशोर ने 1988 में संन्यास ले लिया था और उनके परिजनों ने उन्हें मृत मानकर अंतिम संस्कार कर दिया था, जिसके बाद ही नामान्तरण की प्रक्रिया शुरू हुई थी।

दूसरी एफआईआर में आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता ने राजस्व रिकॉर्ड (प.के.-11-क) से संबंधित पन्ने फाड़ दिए। इसके आधार पर उन्हें 11 नवंबर 2008 को निलंबित कर दिया गया और 21 मार्च 2009 को आरोप-पत्र जारी किया गया। उन पर राजस्व रिकॉर्ड नष्ट करने, आय से अधिक संपत्ति रखने और गलत रिपोर्ट के आधार पर बंजर भूमि को रास्ता दिखाने जैसे तीन गंभीर आरोप लगाए गए थे।

याचिकाकर्ता ने 23 जून 2009 को अपना जवाब दाखिल किया। इसके बावजूद, जांच अधिकारी ने मौखिक साक्ष्य या सुनवाई के लिए कोई तिथि तय किए बिना ही अपनी रिपोर्ट दे दी, जिसमें आरोपों को सिद्ध पाया गया। इसी रिपोर्ट के आधार पर अनुशासनिक प्राधिकारी ने उनकी सेवाएं समाप्त कर दी थीं।

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पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि जांच अधिकारी ने 1999 की नियमावली का पालन नहीं किया। उन्होंने दलील दी कि न तो गवाहों के बयान दर्ज किए गए और न ही याचिकाकर्ता को आरोपों पर स्पष्टीकरण देने के लिए मौखिक सुनवाई का मौका दिया गया। यह भी कहा गया कि अनुशासनिक और अपीलीय प्राधिकारियों ने स्वतंत्र रूप से विचार करने के बजाय केवल जांच अधिकारी की रिपोर्ट पर भरोसा किया।

वहीं, राज्य सरकार के अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने दलील दी कि चूंकि किसी भी पक्ष ने गवाहों के नाम प्रस्तावित नहीं किए थे, इसलिए जांच अधिकारी के लिए गवाहों की जांच या सुनवाई की तिथि तय करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। राज्य का मानना था कि नियमावली में गवाहों के अभाव में मौखिक सुनवाई की कोई स्पष्ट अनिवार्यता नहीं है।

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कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी नजीरें

कोर्ट ने 1999 की नियमावली के नियम 7 का सूक्ष्म परीक्षण किया। न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा कि भले ही गवाहों के नाम न होने पर नियम मौन दिखते हों, लेकिन न्यायिक व्याख्याओं ने इस कमी को दूर किया है। कोर्ट ने कप्तान सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2014) के खंडपीठ के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था:

“भले ही आरोपी कर्मचारी व्यक्तिगत सुनवाई की मांग न करे… जांच अधिकारी जांच की तिथि तय करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं होता… ऐसी मौखिक जांच आवश्यक है क्योंकि यह आरोपी को अपना पक्ष समझाने का अवसर देती है और जांच अधिकारी को विवाद का बेहतर परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है।”

इसके अलावा, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रूप सिंह नेगी बनाम पंजाब नेशनल बैंक (2009) और सत्येंद्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2024) के फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें यह स्थापित किया गया है कि बिना मौखिक साक्ष्य और सुनवाई के बड़ी सजा देना कानून की नजर में शून्य है।

न्यायालय का निर्णय

कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता के जवाब के बाद जांच अधिकारी का यह कर्तव्य था कि वह सुनवाई सुनिश्चित करे। कोर्ट ने कहा:

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“चूंकि इस मामले में याचिकाकर्ता को सुनवाई का ऐसा अवसर कभी प्रदान नहीं किया गया, इसलिए जांच रिपोर्ट को सेवा समाप्ति का आधार नहीं बनाया जा सकता… इस प्रकार याचिकाकर्ता के विरुद्ध पूरी कार्यवाही दूषित है।”

कोर्ट ने बर्खास्तगी और अपील के आदेशों को रद्द कर दिया। हालांकि, नियमानुसार मामले को दोबारा जांच के लिए भेजा जाना चाहिए था, लेकिन चूंकि याचिकाकर्ता 9 जनवरी 2018 को ही सेवानिवृत्त (superannuation) हो चुके हैं, इसलिए कोर्ट ने मामले को वापस भेजने से इनकार कर दिया।

केस विवरण:

  • केस का नाम: राम स्वरूप शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • रिट याचिका संख्या: रिट ए संख्या 27948/2010
  • कोर्ट: हाईकोर्ट ऑफ जुडिकेचर एट इलाहाबाद
  • न्यायाधीश: न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता
  • फैसले की तिथि: 27 फरवरी, 2026

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