इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साल 2015 के एक सामूहिक दुष्कर्म मामले में दो आरोपियों, सूरजपाल और उदय पाल की दोषसिद्धि और 20 साल के कठोर कारावास की सजा को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता द्वारा घटना का जो विवरण दिया गया, वह मेडिकल रिपोर्ट और जांच के निष्कर्षों से मेल नहीं खाता है।
अपीलों पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मनोज बजाज ने टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष आरोपों को “संदेह से परे” साबित करने में विफल रहा। कोर्ट ने पीड़िता और उसके माता-पिता के बयानों में “महत्वपूर्ण विसंगतियों” (material discrepancies) को रेखांकित किया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 9 जून, 2015 को बरेली जिले के थाना आँवला में दर्ज एक एफआईआर से शुरू हुआ था। पीड़िता के पिता (P.W.-1) की शिकायत के अनुसार, 8 जून, 2015 की शाम करीब 5 बजे उनकी 14 वर्षीय बेटी चारा लेकर लौट रही थी। आरोप था कि गांव के ही सूरजपाल और उदय पाल ने उसे राकेश के खेत में खींच लिया और उसके साथ दुष्कर्म किया।
ट्रायल कोर्ट (अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, बरेली) ने 16 दिसंबर, 2020 को दोनों आरोपियों को आईपीसी की धारा 376-D (सामूहिक दुष्कर्म) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इसी फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं के वकील: अपीलकर्ताओं की ओर से वकील राहुल सक्सेना ने तर्क दिया कि पीड़िता (P.W.-2) और उसके माता-पिता के बयानों में भारी विरोधाभास है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पीड़िता के अनुसार उसकी छोटी बहन श्यामवती घटना की चश्मदीद थी और उसे भी आरोपियों ने बांध दिया था, लेकिन पुलिस ने उसे गवाह के रूप में पेश ही नहीं किया।
इसके अलावा, बचाव पक्ष ने इसे पुरानी रंजिश का मामला बताया। पीड़िता ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि उसके चचेरे भाई की पत्नी आरोपी सूरजपाल के साथ भाग गई थी। वकील ने यह भी कहा कि मेडिकल साक्ष्य और एफएसएल रिपोर्ट पीड़िता के दावों की पुष्टि नहीं करते हैं।
सरकारी वकील (राज्य): राज्य की ओर से दलील दी गई कि पीड़िता ने स्पष्ट रूप से आरोपियों की पहचान की है। उन्होंने डॉक्टरों की गवाही का हवाला देते हुए कहा कि मेडिकल जांच में हाइमन के फटने (torn hymen) की पुष्टि हुई थी और ट्रायल कोर्ट का फैसला पूरी तरह सही था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां
अभिलेखों का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने अभियोजन की कहानी में कई गंभीर खामियां पाईं:
- मुख्य गवाह की अनुपस्थिति: कोर्ट ने इसे “अजीब” माना कि पीड़िता की छोटी बहन, जो कथित तौर पर मौके पर मौजूद थी, उसे न तो जांच में शामिल किया गया और न ही गवाही के लिए बुलाया गया।
- मौखिक और मेडिकल साक्ष्य में टकराव: पीड़िता ने दावा किया कि उसके सीने और पीठ पर चोटें आईं और खून निकला। हालांकि, मेडिकल रिपोर्ट (Exb. Ka-3) में चोट का कोई निशान नहीं मिला। कोर्ट ने कहा, “पीड़िता के मौखिक बयान और मेडिकल साक्ष्य के बीच का यह विरोधाभास अभियोजन के मामले पर संदेह पैदा करता है।”
- भौतिक साक्ष्यों का अभाव: पीड़िता ने दावा किया कि उसके कपड़े फाड़ दिए गए थे और वह निर्वस्त्र होकर घर पहुंची, लेकिन जांच अधिकारी ने उन कपड़ों को बरामद नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि घटनास्थल से घर की दूरी मात्र 125 मीटर थी और यह मुमकिन नहीं लगता कि सरेआम रास्ते के पास हुई ऐसी घटना पर किसी का ध्यान न गया हो।
- झूठी संलिप्तता की संभावना: हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष के उस तर्क को “संभावित” माना कि शिकायतकर्ता ने पुरानी रंजिश के चलते आरोपियों को फंसाया होगा, क्योंकि पीड़िता ने खुद आरोपी के साथ एक महिला के भागने की बात स्वीकार की थी।
ट्रायल कोर्ट की आलोचना करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“ट्रायल कोर्ट अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों का उचित तरीके से मूल्यांकन करने में विफल रहा और मामले की महत्वपूर्ण विसंगतियों को नजरअंदाज कर दिया। ऐसी स्थिति में अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि को बरकरार रखना असुरक्षित होगा।”
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों ने मामले पर गहरा संदेह पैदा किया है और आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए हैं।
हाईकोर्ट ने दोनों अपीलों को मंजूर कर लिया और 16 दिसंबर, 2020 के दोषसिद्धि के आदेश को रद्द करते हुए सूरजपाल और उदय पाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने उन्हें तत्काल जेल से रिहा करने का आदेश दिया है।
- केस का नाम: सूरजपाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (क्रिमिनल अपील संख्या 1550/2021) और उदय पाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (क्रिमिनल अपील संख्या 640/2021)

