शब्बीर शाह जमानत सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने NIA से पूछा: 1990 के भाषणों पर कैसे टिके आरोप; मामला 12 मार्च को सूचीबद्ध

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कश्मीरी अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) से पूछा कि वह जमानत का विरोध करने के लिए 1990 के दशक के कथित भड़काऊ भाषणों पर क्यों निर्भर कर रही है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने यह सवाल तब उठाया जब NIA की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने कुछ वीडियो ट्रांसक्रिप्ट का हवाला दिया।

पीठ ने कहा, “ये भाषण कोई नई चीज नहीं हैं। ये 30 या 35 साल पहले के हैं। अब आप 2019 में इन्हें बरामद करके कह रहे हैं कि ये भड़काऊ भाषण हैं।”

लूथरा ने कहा कि शाह के खिलाफ एजेंसी के पास भड़काऊ वीडियो, आपत्तिजनक ई-मेल और गवाहों के बयान जैसे साक्ष्य हैं। उन्होंने बताया कि कुछ वीडियो शाह के परिसर की तलाशी के दौरान बरामद हुए और कई की तिथियां उपलब्ध हैं।

ट्रायल की स्थिति पर उन्होंने कहा कि अब तक 34 गवाहों का परीक्षण हो चुका है और आगे संरक्षित गवाहों के बयान दर्ज किए जाने हैं।

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पीठ ने NIA की दलीलें सुनने के बाद मामले को 12 मार्च के लिए सूचीबद्ध कर दिया, जब शाह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस प्रत्युत्तर तर्क रखेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने 13 जनवरी को NIA को फटकार लगाते हुए शाह की छह साल से अधिक की हिरासत को उचित ठहराने को कहा था और संबंधित भाषणों व अन्य सामग्री प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।

इससे पहले, 4 सितंबर को शीर्ष अदालत ने अंतरिम जमानत देने से इनकार करते हुए शाह की उस याचिका पर NIA से जवाब मांगा था जिसमें उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के 12 जून 2025 के आदेश को चुनौती दी थी।

दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा था कि शाह के समान अवैध गतिविधियों में संलिप्त होने और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। गंभीर आरोपों को देखते हुए उनकी हाउस अरेस्ट की वैकल्पिक मांग भी अस्वीकार कर दी गई थी।

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हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया था कि शाह प्रतिबंधित संगठन जम्मू-कश्मीर डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी के अध्यक्ष रहे हैं और उनके खिलाफ समान प्रकृति के 24 लंबित मामले हैं, जो जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करने की साजिश से जुड़े बताए गए हैं।

NIA ने 2017 में कई व्यक्तियों के खिलाफ पत्थरबाजी, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश के लिए धन जुटाने के आरोप में मामला दर्ज किया था।

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एजेंसी के अनुसार शाह ने:

  • अलगाववाद के समर्थन में नारे लगवाने के लिए लोगों को उकसाया,
  • मारे गए आतंकियों को “शहीद” बताकर महिमामंडित किया,
  • हवाला के जरिए धन प्राप्त किया, और
  • नियंत्रण रेखा पार व्यापार के माध्यम से धन जुटाया, जिसे कथित तौर पर विध्वंसक और उग्र गतिविधियों में इस्तेमाल किया गया।

शाह को 4 जून 2019 को गिरफ्तार किया गया था। ट्रायल कोर्ट के 7 जुलाई 2023 के जमानत से इनकार करने के आदेश के खिलाफ उनकी अपील भी हाईकोर्ट ने खारिज कर दी थी।

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