किसी समुदाय को धर्म, भाषा, जाति या क्षेत्र के आधार पर निशाना बनाना असंवैधानिक; उच्च पदों पर आसीन सार्वजनिक व्यक्तियों पर अधिक दायित्व: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बंधुता (फ्रैटरनिटी) राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता के लिए संविधान का एक मूलभूत तत्व है तथा कोई भी व्यक्ति — चाहे वह राज्य का प्रतिनिधि हो या गैर-राज्य का — किसी समुदाय को धर्म, भाषा, जाति या क्षेत्र के आधार पर निशाना नहीं बना सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भाषण, मीम, कार्टून या दृश्य कला सहित किसी भी माध्यम से किसी समुदाय का अपमान या अवमानना करना संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है।

ये टिप्पणियां न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने उस याचिका पर अपने पृथक निर्णय में कीं जिसमें आगामी नेटफ्लिक्स फिल्म Ghooskhor Pandat की रिलीज पर रोक लगाने की मांग की गई थी। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने 19 फरवरी को फिल्म निर्माता नीरज पांडे के हलफनामे को रिकॉर्ड पर लेते हुए याचिका का निस्तारण किया और कहा कि विवाद के शांत होने की अपेक्षा है।

39 पृष्ठ के अपने निर्णय में न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि प्रस्तावना में उल्लिखित बंधुता संविधान के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है, जो व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करती है।

न्यायालय ने कहा:

“इस प्रकार बंधुता की भावना का विकास करना और जाति, धर्म या भाषा की परवाह किए बिना अपने सहनागरिकों का सम्मान करना हम सभी का संवैधानिक धर्म है।”

READ ALSO  क्या एक ही घर में रहते हुए पत्नी पति से भरण-पोषण पाने की हकदार है? जानिए यहाँ

न्यायालय ने कहा कि किसी भी माध्यम से किसी समुदाय को अपमानित या बदनाम करना “संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य” है।

न्यायमूर्ति भुइयां ने लिखा:

“किसी भी व्यक्ति के लिए, चाहे वह राज्य का प्रतिनिधि हो या गैर-राज्य का, भाषण, मीम, कार्टून, दृश्य कला आदि किसी भी माध्यम से किसी समुदाय का अपमान और अवमानना करना संवैधानिक रूप से अनुमेय नहीं है।”

न्यायालय ने आगे कहा कि धर्म, भाषा, जाति या क्षेत्र के आधार पर किसी समुदाय को निशाना बनाना संविधान का उल्लंघन होगा, और यह सिद्धांत विशेष रूप से उन सार्वजनिक व्यक्तियों पर लागू होता है जो उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन हैं और जिन्होंने संविधान की रक्षा की शपथ ली है।

न्यायालय ने अनुच्छेद 19 के दायरे पर भी चर्चा करते हुए कहा कि विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के मूल आदर्शों में से एक है और यह सभी नागरिकों को प्रदत्त मौलिक अधिकार है।

साथ ही न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 19 के अंतर्गत लगाए जाने वाले युक्तिसंगत प्रतिबंध वास्तव में युक्तिसंगत होने चाहिए और वे मनमाने या दमनकारी नहीं हो सकते।

READ ALSO  वकालत और डॉक्टरी एक साथ नहीं: केरल हाई कोर्ट ने कहा— कानून एक 'ईर्ष्यालु प्रेमिका' है, पहले मेडिकल रजिस्ट्रेशन रद्द कराएं

निर्णय में कहा गया:

“अनुच्छेद 19 के अंतर्गत युक्तिसंगत प्रतिबंध युक्तिसंगत ही रहने चाहिए, वे मनमाने और दमनकारी नहीं हो सकते। अनुच्छेद 19 को इस प्रकार नहीं पढ़ा जा सकता कि वह उसी अनुच्छेद के अंतर्गत प्रदत्त मौलिक अधिकारों, विशेषकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पर हावी हो जाए।”

पीठ ने फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका का निस्तारण करते हुए फिल्म निर्माता के हलफनामे को रिकॉर्ड पर लिया और कहा कि विवाद समाप्त होने की अपेक्षा है।

हालांकि, निर्णय में न्यायालय ने बंधुता, व्यक्ति की गरिमा और समुदायों को लक्षित करने वाली अभिव्यक्तियों की संवैधानिक सीमाओं पर व्यापक टिप्पणी की।

READ ALSO  पासपोर्ट में जेंडर परिवर्तन के लिए DM का प्रमाणपत्र अंतिम प्रमाण; दोबारा मेडिकल जांच नहीं मांग सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles