पुलिस और शिकायतकर्ता के विरोधाभासी हलफनामों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिया कड़ा संज्ञान; वन अधिकारियों की गिरफ्तारी पर लगाई रोक

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति रजनीश कुमार और न्यायमूर्ति ज़फीर अहमद की खंडपीठ ने कथित तौर पर फायरिंग करने और एक व्यक्ति के लापता होने के मामले में कई वन रेंजर अधिकारियों (Forest Range Officers) को दंडात्मक कार्रवाई (coercive action) से अंतरिम राहत दी है। इसके साथ ही, अदालत ने एक मुख्य गवाह का बयान दर्ज किए जाने को लेकर पुलिस और शिकायतकर्ता द्वारा दायर किए गए विरोधाभासी हलफनामों पर कड़ा रुख अपनाते हुए बहराइच के पुलिस अधीक्षक (SP) को मामले की जांच कर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है।

याचिकाकर्ता वन रेंजर अधिकारी हैं, जिन्होंने भारतीय न्याय संहिता (BNS) और एससी/एसटी एक्ट (SC/ST Act) के तहत दर्ज एक एफआईआर (FIR) को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर की थी। यह एफआईआर बहराइच के विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) के आदेश पर दर्ज की गई थी। सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में गहराई से विचार करने की आवश्यकता है। अदालत ने आगे की जांच लंबित रहने तक वन अधिकारियों को अंतरिम सुरक्षा प्रदान की है और परस्पर विरोधी हलफनामे दायर करने के मामले में उच्च स्तरीय पुलिस जांच के आदेश दिए हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद अगस्त 2025 की एक घटना से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं (वन अधिकारियों) के अनुसार, 14 अगस्त 2025 को पेड़ों की अवैध कटाई के आरोप में मुक्ति नारायण नामक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया था, जबकि छह अन्य लोग मौके से फरार हो गए थे। इसी के आधार पर वन विभाग ने एक रेंज केस दर्ज किया था।

इसके विपरीत, प्रतिवादी नंबर 4 (शिकायतकर्ता) का आरोप है कि 13 अगस्त 2025 को उसके पिता और मुक्ति नारायण नाव से अपने खेत देखने गए थे। वहां से लौटते समय घाघरा नदी के पास वन विभाग के कर्मचारियों ने उन्हें पकड़ लिया, पीटा और उन पर फायरिंग की। शिकायतकर्ता ने 18 अगस्त 2025 को पुलिस में शिकायत दी और बाद में विशेष न्यायाधीश के समक्ष बीएनएसएस (BNSS) की धारा 173(3) के तहत एक आवेदन प्रस्तुत किया।

अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट से जमानत पर रिहा होने के बाद, मुक्ति नारायण ने एक हलफनामा दायर किया। इसमें उसने दावा किया कि वन विभाग के कर्मचारियों ने उन पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिससे उसके साथी रामबली को गोली लग गई। उसने आरोप लगाया कि वन कर्मियों ने रामबली का शव गायब कर दिया और उसे धमकाया। बीएनएसएस की धारा 173(4) के तहत कार्यवाही के आधार पर, विशेष न्यायाधीश ने वर्तमान एफआईआर (क्राइम नंबर 0002/2026) दर्ज करने का आदेश दिया था।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं (वन अधिकारियों) की दलीलें: याचिकाकर्ताओं के वकील श्री शशांक तिल्हारी ने तर्क दिया कि दर्ज की गई एफआईआर पूरी तरह से “मनगढ़ंत और झूठी कहानी” पर आधारित है। उन्होंने अदालत का ध्यान इस ओर खींचा कि मुक्ति नारायण ने अलग-अलग अदालतों में अपनी गिरफ्तारी को लेकर अलग-अलग बयान दिए हैं। यह भी तर्क दिया गया कि चूंकि याचिकाकर्ता लोक सेवक (Public Servants) हैं, इसलिए विशेष न्यायाधीश बिना बीएनएसएस की धारा 218 के तहत पूर्व मंजूरी लिए एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकते थे। इसके समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘अनिल कुमार और अन्य बनाम एम.के. अयप्पा और अन्य; 2023 10 SCC 705’ का हवाला दिया गया। वकील ने एक गंभीर विरोधाभास की ओर भी इशारा किया: शिकायतकर्ता का दावा था कि जांच अधिकारी (सीओ) ने 13 फरवरी 2026 को मुक्ति नारायण का बयान दर्ज किया, जबकि खुद सीओ ने अपने हलफनामे में इस बात से इनकार किया है।

प्रतिवादी नंबर 4 (शिकायतकर्ता) की दलीलें: शिकायतकर्ता के वकील श्री आशीष रमन मिश्रा ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि 4 जनवरी 2026 को एफआईआर दर्ज होने के बावजूद शिकायतकर्ता के पिता अभी तक लापता हैं और पुलिस उन्हें ढूंढने में नाकाम रही है। उन्होंने बचाव पक्ष के भौगोलिक दावों को खारिज करते हुए कहा कि खेत जंगल से बिल्कुल सटा हुआ है। पूर्व मंजूरी के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि आरोपित कृत्य आधिकारिक ड्यूटी का हिस्सा नहीं थे, इसलिए एफआईआर के स्तर पर नहीं, बल्कि ट्रायल के स्तर पर मंजूरी की आवश्यकता होगी। उन्होंने ‘इंस्पेक्टर ऑफ पुलिस और अन्य बनाम बत्तेनापटला वेंकट रत्नम और अन्य; (2015) 13 SCC 87’ मामले का संदर्भ दिया।

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राज्य सरकार की दलीलें: अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA) ने एफआईआर का समर्थन किया। उन्होंने ‘रॉबर्ट लालचुंगनुंगा छंगथु बनाम बिहार राज्य; 2025 SCC 2511’ का हवाला देते हुए कहा कि मंजूरी की आवश्यकता मुकदमे (trial) के चरण में होती है। जांच अधिकारी द्वारा बयान दर्ज न किए जाने के सवाल पर एजीए ने स्पष्ट किया कि अधिकारी मुक्ति नारायण का बयान लेने गए थे, लेकिन वह मौजूद नहीं था, जिसके बाद उसके भाई को नोटिस थमाया गया था। एजीए ने यह भी बताया कि सीओ ने विरोधाभासी रिपोर्टों के कारण मामले में प्रारंभिक जांच की सिफारिश की है।

हाईकोर्ट की टिप्पणी और फैसला

खंडपीठ ने मामले को सुनते हुए टिप्पणी की कि, “इस मामले पर विचार करने की आवश्यकता है।” (“The matter requires consideration.”)

अदालत ने जांच प्रक्रिया को लेकर पेश किए गए विरोधाभासी हलफनामों पर बेहद गंभीर रुख अपनाया। अदालत ने शिकायतकर्ता और मुक्ति नारायण के उस दावे (कि 13 फरवरी 2026 को बयान दर्ज किया गया) और जांच अधिकारी (सीओ) द्वारा हलफनामा देकर इससे इनकार करने के बीच मौजूद भारी विरोधाभास को दर्ज किया।

फैसला: अदालत ने राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा (Counter Affidavit) और याचिकाकर्ताओं को प्रत्युत्तर (Rejoinder) दाखिल करने का समय दिया है।

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वन अधिकारियों को अंतरिम राहत देते हुए अदालत ने आदेश दिया: “अगली सुनवाई की तारीख तक या याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई ठोस सबूत मिलने तक (जो भी पहले हो), उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। हालांकि, याचिकाकर्ता जांच में सहयोग करेंगे और 23 फरवरी 2026 को जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होंगे।”

विरोधाभासी हलफनामों के मुद्दे पर अदालत ने सख्त निर्देश दिया: “यह भी निर्देश दिया जाता है कि शिकायतकर्ता, मुक्ति नारायण और क्षेत्राधिकारी/जांच अधिकारी द्वारा दायर हलफनामे में मुक्ति नारायण के बयान 13.02.2026 को दर्ज किए जाने के संबंध में मौजूद विरोधाभासों को देखते हुए, मामले की जांच बहराइच के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक / पुलिस अधीक्षक द्वारा की जाएगी और वे अगली तारीख तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे।”

अदालत ने जांच अधिकारी को इस मामले की निष्पक्ष और जल्द जांच करने का भी निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में तय की गई है।

केस का विवरण:

  • केस का नाम: अब्दुल सलाम और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (अपर मुख्य सचिव, लखनऊ के माध्यम से) और अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल मिसलेनियस रिट पिटीशन नंबर 989/2026
  • कोरम / पीठ: न्यायमूर्ति रजनीश कुमार और न्यायमूर्ति ज़फीर अहमद
  • याचिकाकर्ताओं के वकील: शशांक तिल्हारी
  • प्रतिवादियों के वकील: सरकारी वकील (जी.ए.), आशीष रमन मिश्रा

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