जालसाजी साबित करने के लिए साक्ष्यों का अभाव: बॉम्बे हाईकोर्ट ने भूमि रिकॉर्ड में हेराफेरी के आरोपी तलाठी को किया बरी

बॉम्बे हाईकोर्ट (औरंगाबाद बेंच) ने भूमि रिकॉर्ड में हेराफेरी कर जमीन को ‘क्लास-2’ से ‘क्लास-1’ में बदलने के आरोपी एक तलाठी (राजस्व अधिकारी) की सजा को रद्द कर दिया है। जस्टिस अभय एस. वाघवासे ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष कथित रूप से जाली दस्तावेजों की ‘चेन ऑफ कस्टडी’ (कब्जे का क्रम) स्थापित करने में विफल रहा और यह साबित नहीं कर सका कि आरोपी ने ही उन बदलावों या हस्ताक्षरों को अंजाम दिया था।

हाईकोर्ट ने माधव संग्राम राजकुंडल द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Application) को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट (JMFC, धर्माबाद) और प्रथम अपीलीय अदालत (अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, बिलोली) के आदेशों को खारिज कर दिया। निचली अदालतों ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 465 (जालसाजी) और 471 (जाली दस्तावेज को असली के रूप में उपयोग करना) के तहत दोषी ठहराया था।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष का मामला धर्माबाद के नायब तहसीलदार की एक रिपोर्ट पर आधारित था। आरोप था कि आवेदक ने मौजा चिंचोली में तलाठी के पद पर रहते हुए जमीन के गट नंबर 106 के 7/12 अर्क (extract) में ओवरराइटिंग और हेराफेरी की थी। पुलिस का दावा था कि आरोपी ने जमीन को क्लास-2 (किरायेदारी भूमि) से क्लास-1 में बदल दिया ताकि दूसरे आरोपी के पक्ष में बिक्री विलेख (sale deed) निष्पादित किया जा सके।

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) ने शुरुआत में आवेदक को धारा 420, 465, 468 और 471 के तहत दोषी पाया था। हालांकि, अपील पर सत्र न्यायालय ने उसे धारा 420 और 468 से बरी कर दिया था, लेकिन जालसाजी की धाराओं (465 और 471) के तहत सजा को बरकरार रखा था।

पक्षकारों की दलीलें

पुनरीक्षणकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि मुख्य गवाह और शिकायतकर्ता (PW 2) ने जिरह के दौरान स्वीकार किया था कि उसे नहीं पता कि ओवरराइटिंग किसने की थी। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि प्रथम अपीलीय अदालत पहले ही हस्तलेख विशेषज्ञ (handwriting expert) के सबूतों को खारिज कर चुकी थी, जिससे यह साबित करने के लिए कोई ठोस आधार नहीं बचा था कि लिखावट आवेदक की ही थी। इसके अलावा, विवादित दस्तावेज आवेदक के बजाय एक अन्य गवाह (PW 6) के पास से जब्त किया गया था।

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वहीं, अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) ने निचली अदालतों के निष्कर्षों का समर्थन करते हुए याचिका को खारिज करने का अनुरोध किया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

जस्टिस अभय एस. वाघवासे ने पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार की सीमाओं को रेखांकित करते हुए अमित कपूर बनाम रमेश चंद्र और अन्य (2012) मामले का हवाला दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक फैसला पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण या बिना सबूत के न हो, हस्तक्षेप नहीं किया जाता। हालांकि, वर्तमान मामले में कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में कई गंभीर खामियां पाईं:

  1. जालसाजी का उत्तरदायित्व: कोर्ट ने नोट किया कि मुखबिर (PW 2) ने “स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि वह नहीं जानता कि वास्तव में ओवरराइटिंग किसने की थी।”
  2. हस्तलेख साक्ष्य का अभाव: हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि विशेषज्ञ की गवाही न होने के कारण उनकी रिपोर्ट पहले ही खारिज हो चुकी थी। कोर्ट ने कहा, “विशेषज्ञ की राय के अभाव में, जालसाजी का पहलू ही संदेह के घेरे में आ गया है।”
  3. दस्तावेजों का कब्जा (Chain of Custody): कोर्ट ने इसे महत्वपूर्ण माना कि कथित जाली 7/12 अर्क आवेदक के पास से नहीं, बल्कि कंप्यूटर सेंटर चलाने वाले PW 6 से बरामद हुआ था। कोर्ट ने टिप्पणी की:
    “जब तक यह दिखाने के लिए सबूत न हो कि आरोपी ने ही 7/12 अर्क लिखा या उससे छेड़छाड़ की, जालसाजी के आरोप साबित नहीं किए जा सकते।”
  4. धोखाधड़ी का अभाव: कोर्ट ने पाया कि मूल जमीन मालिक (PW 5) ने स्वयं कहा था कि उसके साथ कोई धोखाधड़ी नहीं हुई है, जिससे अभियोजन की पूरी कहानी कमजोर पड़ गई।
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हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि “बिना किसी पर्याप्त प्रमाण के केवल किसी दस्तावेज पर गोला बनाना जालसाजी की पुष्टि नहीं करता।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि दोनों निचली अदालतें रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का सही परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन करने में विफल रहीं।

अदालत ने आदेश दिया, “परिणामस्वरूप… ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत साक्ष्यों को सही तरह से समझने में विफल रहे हैं, इसलिए हस्तक्षेप आवश्यक है।” हाईकोर्ट ने माधव संग्राम राजकुंडल को सभी आरोपों से बरी कर दिया और उनके द्वारा जमा की गई जुर्माना राशि वापस करने का निर्देश दिया।

मामले का विवरण:

  • केस शीर्षक: माधव बनाम महाराष्ट्र राज्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल रिवीजन एप्लीकेशन नंबर 163 ऑफ 2025
  • कोरम: जस्टिस अभय एस. वाघवासे

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