बिना क्लाइंट के निर्देश के वकील का बयान ‘अंडरटेकिंग’ नहीं; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की अवमानना याचिका

इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ पीठ) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी वकील ने अपने मुवक्किल (Client) के स्पष्ट निर्देशों के बिना कोर्ट के समक्ष कोई बयान दिया है, तो उसे संपत्ति की बिक्री रोकने के लिए बाध्यकारी वचन (Undertaking) नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति मनीष कुमार की पीठ ने अवमानना याचिका को खारिज करते हुए कहा कि वकीलों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने मुवक्किल के निर्देशों का पालन करें, न कि अपनी ओर से निर्णय लें। कोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के हिमालयन को-ऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी बनाम बलवान सिंह और अन्य (2015) के फैसले पर भरोसा जताया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अवमानना याचिका राम शंकर शुक्ल और अन्य द्वारा दायर की गई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि विपक्षी पक्ष ने स्पेशल अपील संख्या 579/2009 में पारित 2 सितंबर 2009 के आदेश का जानबूझकर उल्लंघन किया है।

वर्ष 2009 के उक्त आदेश में, खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश (Single Judge) के आदेश को रद्द कर दिया था और मामले को नए सिरे से निर्णय के लिए वापस भेज दिया था। उस कार्यवाही के दौरान अपीलकर्ता (वर्तमान मामले में विपक्षी संख्या 1) के वकील ने कोर्ट में कहा था:

“इस मोड़ पर अपीलकर्ता के वकील का कहना है कि अपीलकर्ता किसी भी संपत्ति को बेचने का इरादा नहीं रखता है और न ही उसे बेचने जा रहा है।”

याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि अपीलीय न्यायालय के समक्ष दिए गए इस “वचन” के बावजूद, विपक्षी ने 23 और 24 दिसंबर 2009 को बैनामा (Sale Deeds) निष्पादित कर दिया। उनका तर्क था कि 27 जुलाई 2009 के अंतरिम आदेश, जिसमें संपत्ति की प्रकृति बदलने पर रोक थी, और वकील के बयान के आलोक में विपक्षी को संपत्ति नहीं बेचनी चाहिए थी।

कोर्ट के समक्ष तर्क

याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि बैनामा निष्पादित करना कोर्ट को दिए गए वचन का जानबूझकर उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि अपीलीय न्यायालय में दिए गए बयान को 27 जुलाई 2009 के अंतरिम आदेश के साथ पढ़ा जाना चाहिए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि तीसरे पक्ष के अधिकार सृजित करने पर रोक थी।

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इसके विपरीत, विपक्षी संख्या 1 के वकील ने तर्क दिया कि प्रतिवादी ने व्यक्तिगत रूप से कभी ऐसा कोई वचन नहीं दिया था, और न ही उसने अपने वकील को ऐसा कोई बयान देने का निर्देश दिया था।

विपक्षी ने अपने शपथ पत्र में स्पष्ट किया कि वकील द्वारा दिया गया बयान उनकी जानकारी में नहीं था, अन्यथा वह संपत्ति नहीं बेचते। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के हिमालयन को-ऑपरेटिव मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि एक वकील के पास बिना विशिष्ट प्राधिकरण (Authorization) के अपने मुवक्किल को किसी समझौते या रियायत के लिए बाध्य करने का निहित अधिकार नहीं होता है।

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यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता ने 11 जनवरी 2010 को अपनी रिट याचिका वापस ले ली थी।

कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद, न्यायमूर्ति मनीष कुमार ने पाया कि अपीलीय न्यायालय के आदेश में केवल यह दर्ज था कि वकील ने “कहा है” (Says that) कि अपीलकर्ता संपत्ति बेचने का इरादा नहीं रखता।

कोर्ट ने कहा, “रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह साबित हो कि विपक्षी संख्या 1 ने अपने वकील को अपीलीय न्यायालय के समक्ष कोई वचन देने का निर्देश दिया था। ऐसा प्रतीत होता है कि वकील ने अपनी मर्जी से यह बयान दिया था।”

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का उल्लेख करते हुए, हाईकोर्ट ने दोहराया कि वकीलों का कर्तव्य है कि वे अपने मुवक्किल की स्वायत्तता का सम्मान करें। कोर्ट ने कहा:

“अधिवक्ता का यह पवित्र कर्तव्य है कि वह मुवक्किल द्वारा प्रदत्त अधिकारों का अतिक्रमण न करे। मुवक्किल या उसके अधिकृत एजेंट से उचित निर्देश लेना हमेशा बेहतर होता है, इससे पहले कि कोई ऐसी रियायत दी जाए जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मुवक्किल के विधिक अधिकारों को प्रभावित कर सकती है।”

कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि वकील के बयान को 27 जुलाई 2009 के अंतरिम आदेश के साथ पढ़ा जाना चाहिए। न्यायमूर्ति कुमार ने बताया कि अपीलीय न्यायालय ने 2 सितंबर 2009 को मामले को रिमांड करते समय एकल न्यायाधीश के आदेश (जिसमें अंतरिम राहत शामिल थी) को रद्द कर दिया था। इसलिए, उस अंतरिम आदेश का अस्तित्व समाप्त हो चुका था।

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कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह मामला पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दायरे में आता है। इसके अलावा, रिट याचिका भी वापस ले ली गई थी और विवादित अवधि के दौरान कोई अंतरिम आदेश प्रभावी नहीं था।

तदनुसार, कोर्ट ने माना कि विपक्षी के खिलाफ अवमानना का कोई मामला नहीं बनता है और याचिका खारिज कर दी।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: राम शंकर शुक्ल और अन्य बनाम मधुकर शुक्ल और 7 अन्य
  • केस नंबर: अवमानना याचिका (सिविल) संख्या 99 वर्ष 2010
  • कोरम: न्यायमूर्ति मनीष कुमार
  • याचिकाकर्ताओं के लिए वकील: अनुराग श्रीवास्तव, अभिषेक सिंह, आनंद दुबे, अनुराग कुमार दीक्षित
  • विपक्षी पक्ष के लिए वकील: भूपेंद्र प्रताप सिंह, प्रीतिश कुमार, इंद्रपाल सिंह, एन.एल. पांडेय, पं. एस. चंद्र, आर.एस. त्रिपाठी, एस.एन. तिलहरी, विवेक सारस्वत

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