सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार द्वारा नियुक्त लाइब्रेरियनों की सेवा समाप्ति के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ निजी क्षेत्र विश्वविद्यालय अधिनियम, 2002 को असंवैधानिक घोषित किए जाने से पहले, उक्त अधिनियम के तहत स्थापित विश्वविद्यालय से प्राप्त डिग्रियां रोजगार के उद्देश्यों के लिए मान्य रहेंगी।
जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने कहा कि अधिनियम को रद्द किए जाने से पहले पास हुए छात्रों को दंडित नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनकी पढ़ाई के समय विश्वविद्यालय एक मान्यता प्राप्त संस्थान था।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रियंका कुमारी और अन्य द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए पटना हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसने उनकी सेवा समाप्ति को सही ठहराया था। अपीलकर्ताओं को इस आधार पर नौकरी से निकाल दिया गया था कि उनकी बैचलर ऑफ लाइब्रेरी साइंस (B.Lib) की डिग्रियां अमान्य हैं, क्योंकि जिस विश्वविद्यालय से उन्होंने पढ़ाई की थी, उसे स्थापित करने वाले कानून को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था। शीर्ष अदालत ने अपीलकर्ताओं को सेवा की निरंतरता (continuity of service) के साथ बहाल करने का निर्देश दिया, लेकिन पिछले वेतन (back wages) का लाभ देने से इनकार कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ताओं ने 2004 में रायपुर स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस से बैचलर ऑफ लाइब्रेरी साइंस (B.Lib) की डिग्री प्राप्त की थी। यह विश्वविद्यालय छत्तीसगढ़ निजी क्षेत्र विश्वविद्यालय अधिनियम, 2002 के तहत स्थापित किया गया था और इसे छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त थी।
वर्ष 2005 में, सुप्रीम कोर्ट ने प्रो. यशपाल और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य के मामले में 2002 के अधिनियम की धारा 5 और 6 को अधिकारतित (ultra vires) घोषित कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप इस अधिनियम के तहत स्थापित विश्वविद्यालय अस्तित्वहीन हो गए।
बिहार राज्य ने मई 2010 में अपीलकर्ताओं को लाइब्रेरियन के पद पर नियुक्त किया था। हालांकि, एक जनहित याचिका (PIL) और बाद की प्रशासनिक कार्रवाई के बाद, 22 अगस्त 2015 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। आधार यह दिया गया कि उनकी डिग्रियां अमान्य थीं। अपीलकर्ताओं ने इस बर्खास्तगी को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां एकल न्यायाधीश ने 2018 में उनकी याचिका खारिज कर दी। बाद में, 2019 में खंडपीठ ने भी उनकी लेटर्स पेटेंट अपील (LPA) खारिज कर दी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नवनीति प्रसाद सिंह ने तर्क दिया कि जब अपीलकर्ताओं ने अपनी पढ़ाई पूरी की, तब विश्वविद्यालय विधिवत मान्यता प्राप्त था। उन्होंने कहा कि प्रो. यशपाल के मामले में सुप्रीम कोर्ट छात्रों के हितों की रक्षा के प्रति सचेत था और मौजूदा छात्रों को अन्य विश्वविद्यालयों में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था। उन्होंने तर्क दिया कि इसी आधार पर उन छात्रों की डिग्रियां भी सुरक्षित रहनी चाहिए जो पहले ही पास हो चुके थे। उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले अनिल भीमराज पुराने बनाम भारत संघ का भी हवाला दिया।
दूसरी ओर, बिहार राज्य के वकील ने दलील दी कि एक बार 2002 का अधिनियम रद्द हो जाने के बाद, इसके तहत स्थापित विश्वविद्यालयों द्वारा दी गई डिग्रियां अमान्य हो गईं। राज्य का तर्क था कि प्रो. यशपाल के मामले में सुरक्षा केवल उन छात्रों तक सीमित थी जो उस समय पढ़ाई कर रहे थे, न कि उनके लिए जो पास हो चुके थे। यह भी कहा गया कि 2010 में आवेदन करते समय अपीलकर्ताओं को अपनी डिग्रियों की अमान्यता के बारे में पता था।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने प्रो. यशपाल के फैसले का बारीकी से परीक्षण किया और नोट किया कि अधिनियम को रद्द करते समय कोर्ट ने छात्रों के हितों की रक्षा के लिए निर्देश जारी किए थे।
पीठ ने देखा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह सुझाव दे कि जब अपीलकर्ताओं ने पढ़ाई की थी तो विश्वविद्यालय अस्तित्वहीन या “फर्जी” था। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं ने 2005 के फैसले से पहले ही 2004 में अपनी पढ़ाई पूरी कर ली थी।
डिग्रियों की वैधता पर जस्टिस बिंदल ने पीठ के लिए निर्णय लिखते हुए कहा:
“उपर्युक्त तथ्यों और वर्तमान तथ्यात्मक स्थिति को देखते हुए, अपीलकर्ताओं को दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उन्होंने उस विश्वविद्यालय में अध्ययन किया था जिसे राज्य विधानमंडल द्वारा अधिनियमित 2002 के अधिनियम के तहत स्थापित किया गया था। इसलिए, विश्वविद्यालय में अध्ययन करते समय प्राप्त डिग्री के लाभों से उन्हें वंचित नहीं किया जाना चाहिए। यह राज्य का मामला नहीं है कि जिस विश्वविद्यालय में अपीलकर्ताओं ने पढ़ाई की, वह फर्जी था या वहां कोई पढ़ाई नहीं हुई थी।”
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि बिहार राज्य ने 2010 में अपीलकर्ताओं को नियुक्त किया था, जो 2002 के अधिनियम के रद्द होने के वर्षों बाद हुआ था। इसका अर्थ है कि यह मुद्दा सार्वजनिक डोमेन में था, फिर भी उस समय उनकी उम्मीदवारी को खारिज नहीं किया गया था।
पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के अनिल भीमराज पुराने के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें समान परिस्थितियों में एक छात्र को राहत दी गई थी, यह देखते हुए कि प्रवेश के समय सब कुछ वैध था।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर सेवा समाप्त करना कि संस्थान को बाद में अमान्य घोषित कर दिया गया, अवैध है।
कोर्ट ने आदेश दिया:
“हाईकोर्ट द्वारा पारित आक्षेपित आदेश को रद्द किया जाता है। हाईकोर्ट के समक्ष अपीलकर्ताओं द्वारा दायर रिट याचिका स्वीकार की जाती है। उन्हें सेवा की निरंतरता के साथ सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया जाता है।”
हालांकि, जिस अवधि के दौरान अपीलकर्ता सेवा से बाहर थे, उसके वित्तीय लाभों के संबंध में कोर्ट ने कहा:
“इस तथ्य को देखते हुए कि उन्होंने मध्यवर्ती अवधि के दौरान अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया है, और यह ऐसा मामला नहीं कहा जा सकता जहां केवल प्रतिवादी-राज्य ही दोषी है, हमारे विचार में, वे किसी भी पिछले वेतन (back wages) के हकदार नहीं होने चाहिए।”
तदनुसार अपीलें स्वीकार की गईं।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: प्रियंका कुमारी और अन्य बनाम बिहार राज्य और अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या 797, 2026 (एस.एल.पी. (सी) संख्या 5431, 2026 से उत्पन्न)

