सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को रद कर दिया है, जिसमें आरोपियों के खिलाफ ‘दुष्कर्म के प्रयास’ (Attempt to Rape) के आरोप को घटाकर ‘कपड़े उतारने के इरादे से हमला’ (Assault with intent to disrobe) कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़िता को जबरदस्ती ले जाना और उसके कपड़े उतारने की कोशिश करना, केवल अपराध की ‘तैयारी’ नहीं बल्कि ‘दुष्कर्म का प्रयास’ है।
इसके साथ ही, यौन अपराधों से जुड़े मामलों में जजों और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील बनाने के लिए, जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति (Expert Committee) का गठन किया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक स्वयंभू (Suo Motu) रिट याचिका से जुड़ा है, जो संगठन ‘वी द वूमेन ऑफ इंडिया’ की संस्थापक और वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश को लिखे गए पत्र पर आधारित थी। पत्र में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 मार्च, 2025 के फैसले पर चिंता जताई गई थी।
मूल मामले (शिकायत संख्या 23/2022) में, कासगंज के विशेष न्यायाधीश (POCSO) ने दो आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 (दुष्कर्म) और पॉक्सो एक्ट की धारा 18 के तहत समन जारी किया था। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इस आदेश को संशोधित कर दिया था। हाईकोर्ट ने आरोपों को धारा 376 से हटाकर धारा 354B (कपड़े उतारने के इरादे से हमला) और पॉक्सो एक्ट की धारा 9 व 10 में बदल दिया था।
हाईकोर्ट का तर्क था कि तथ्यों की प्रथम दृष्टया जांच से यह मामला ‘दुष्कर्म के प्रयास’ का नहीं, बल्कि केवल उसकी ‘तैयारी’ (Preparation) का लगता है।
दलीलें और चिंताएं
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता और एच.एस. फूलका ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट का यह दृष्टिकोण कानूनन गलत और असंवेदनशील है। उन्होंने कहा कि इस तरह के फैसले यौन अपराधों के खिलाफ महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के प्रयासों को कमजोर करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि नोटिस तामील होने के बावजूद आरोपी पक्ष की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ। उत्तर प्रदेश राज्य का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता शरण देव सिंह ठाकुर ने किया।
कोर्ट का विश्लेषण: तैयारी बनाम प्रयास (Preparation vs. Attempt)
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या आरोपियों का कृत्य सिर्फ ‘तैयारी’ था या यह ‘प्रयास’ की श्रेणी में आता है।
फैसला लिखते हुए जस्टिस सूर्य कांत ने मध्य प्रदेश राज्य बनाम महेंद्र उर्फ गोलू (2022) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि ‘तैयारी’ का अर्थ है साधन जुटाना, जबकि ‘प्रयास’ वहां से शुरू होता है जहां तैयारी खत्म होती है और आपराधिक मंशा (Mens Rea) का निष्पादन शुरू होता है।
कोर्ट ने तथ्यों पर गौर किया कि आरोपी नाबालिग पीड़िता को मोटरसाइकिल पर ले गए, उसे एक पुलिया के पास रोका, खींचा और उसके साथ यौन कृत्य (कपड़े उतारने की कोशिश) किया। यह कृत्य केवल इसलिए पूरा नहीं हो सका क्योंकि पीड़िता की चीख सुनकर गवाह वहां पहुंच गए।
हाईकोर्ट के तर्क को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“आरोपों को देखने से इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि आरोपियों ने पूर्व-निर्धारित इरादे के साथ धारा 376 का अपराध करने की कोशिश की… यह स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता की कहानी के अनुसार, आपराधिक मंशा का निष्पादन (Execution) शुरू हो चुका था।”
पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष कि यह मामला केवल तैयारी का है, आपराधिक न्यायशास्त्र के सिद्धांतों का “स्पष्ट रूप से गलत अनुप्रयोग” है।
निर्णय और निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने डायरी संख्या 15692 और 21813/2025 से उत्पन्न अपीलों को स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 मार्च, 2025 के फैसले को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कासगंज के विशेष न्यायाधीश (POCSO) द्वारा जारी 23 जून, 2023 के मूल समन आदेश को बहाल कर दिया है। अब ट्रायल आईपीसी की धारा 376 (धारा 511 के साथ पठित) और पॉक्सो एक्ट की धारा 18 के तहत चलेगा।
न्यायिक संवेदनशीलता के लिए समिति का गठन
अदालत ने यौन अपराधों के मामलों में जजों द्वारा अपनाए जाने वाले असंवेदनशील रवैये पर गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा:
“कोई भी जज या किसी भी अदालत का फैसला तब तक पूर्ण न्याय नहीं कर सकता जब तक वह वादी की वास्तविक स्थितियों के प्रति संवेदनशील न हो… हमारे निर्णयों में करुणा, मानवता और समझ की भावना झलकनी चाहिए।”
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने ‘यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों के संदर्भ में जजों और न्यायिक प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता और करुणा पैदा करने के लिए दिशानिर्देश विकसित करने’ हेतु एक समिति का गठन किया है।
समिति के लिए प्रमुख निर्देश:
- संरचना: समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस करेंगे। वे चार अन्य विषय विशेषज्ञों को सदस्य के रूप में नियुक्त करेंगे।
- उद्देश्य: समिति पिछले प्रयासों की समीक्षा करेगी और जजों व न्यायिक प्रणाली के दृष्टिकोण के लिए व्यापक ‘ड्राफ्ट गाइडलाइंस’ तैयार करेगी।
- भाषाई संवेदनशीलता: समिति को स्थानीय बोलियों में यौन अपराधों के लिए इस्तेमाल होने वाले अपमानजनक शब्दों की पहचान और संकलन करने का अनुरोध किया गया है, ताकि वे न्यायिक प्रक्रिया में अनदेखे न रह जाएं।
- सरलता: दिशानिर्देश आम आदमी की समझ में आने वाली सरल भाषा में होने चाहिए, न कि भारी-भरकम विदेशी कानूनी शब्दों में।
- समय सीमा: समिति को अपनी रिपोर्ट अधिमानतः तीन महीने के भीतर सौंपने का अनुरोध किया गया है।
रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया है कि रिपोर्ट प्राप्त होने पर उसे प्रशासनिक पक्ष पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष रखा जाए।
केस टाइटल: इन री: ऑर्डर डेटेड 17.03.2025 पासड बाय द हाईकोर्ट ऑफ ज्यूडिकेचर एट इलाहाबाद इन क्रिमिनल रिवीजन नंबर 1449/2024 एंड एंसिलरी इश्यूज (स्वतः संज्ञान रिट याचिका (आपराधिक) संख्या 1/2025 व अन्य)

