“शादी का झूठा वादा” बताकर सहमति से बनाए गए संबंधों को बलात्कार नहीं माना जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट ने कांस्टेबल को आरोप मुक्त करने के फैसले को सही ठहराया

दिल्ली हाईकोर्ट ने बलात्कार के आरोपी दिल्ली पुलिस के एक कांस्टेबल को आरोप मुक्त (Discharge) करने के निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दोनों पक्षों के बीच शारीरिक संबंध सहमति से बने थे और वे लंबे समय से एक-दूसरे के साथ रिश्ते में थे। पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले के तथ्यों को देखते हुए “शादी का झूठा आश्वासन” देने का आरोप टिकता नहीं है और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 90 के तहत सहमति को दूषित नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने पीड़िता और राज्य सरकार द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिकाओं (Revision Petitions) को खारिज कर दिया, जिसमें तीस हजारी कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत आरोपी को आरोप मुक्त किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल है और पीड़िता का दूर का रिश्तेदार है। दोनों के बीच दो साल से संबंध थे। कथित घटना 8 अक्टूबर 2015 की है, जब पीड़िता आरोपी से मिलने के लिए गाजियाबाद से दिल्ली के नेहरू विहार स्थित उसके किराए के मकान पर गई थी।

पीड़िता का आरोप था कि आरोपी ने शादी का वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। जब उसने विरोध किया, तो आरोपी ने उसे शादी करने का भरोसा दिलाया। उसी रात आरोपी ने उसे गाजियाबाद छोड़ दिया, जहां उसके पिता उसे लेने आए थे।

इस मामले में 2 नवंबर 2015 को शिकायत दर्ज की गई और बाद में 1 दिसंबर 2015 को थाना तिमारपुर में IPC की धारा 376 के तहत FIR दर्ज की गई। 31 मई 2017 को ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आरोप मुक्त (Discharge) कर दिया था, जिसके खिलाफ यह याचिकाएं दायर की गई थीं।

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पक्षों की दलीलें

पीड़िता के वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर सबूतों की बारीकी से जांच की, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्टेट ऑफ बिहार बनाम रमेश सिंह (1977) में निर्धारित सिद्धांतों के खिलाफ है। यह भी दलील दी गई कि शारीरिक संबंध बनाने के बाद आरोपी ने शादी से इनकार कर दिया, इसलिए IPC की धारा 90 लागू होनी चाहिए। येदला श्रीनिवासन राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2006) का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि तथ्यों की गलतफहमी पर आधारित सहमति कानूनन मान्य नहीं है।

राज्य सरकार ने भी पीड़िता का समर्थन किया और तर्क दिया कि ट्रायल चलाने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है, खासकर इसलिए क्योंकि घटना के बाद भी आरोपी ने शादी से इनकार किया था।

दूसरी ओर, प्रतिवादी (आरोपी) के वकील ने तर्क दिया कि Cr.P.C. की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज पीड़िता के बयानों में विरोधाभास है। यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रफुल्ल कुमार सामल (1979) और अमित कपूर बनाम रमेश कुमार चंद्रा (2012) का हवाला देते हुए बचाव पक्ष ने कहा कि जहां दो संभावित दृष्टिकोण हों और सबूत केवल “संदेह” पैदा करते हों न कि “गंभीर संदेह”, वहां अदालत को आरोपी को आरोप मुक्त करने का अधिकार है।

कोर्ट की टिप्पणियां और विश्लेषण

न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने घटनाक्रम और रिश्तों की प्रकृति की जांच की। कोर्ट ने नोट किया कि पीड़िता एक शिक्षित और समझदार महिला है और आरोपी के साथ दो साल से रिश्ते में थी, लेकिन इससे पहले कोई आरोप नहीं लगाया गया था।

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कोर्ट ने कहा: “यह भी ध्यान देने योग्य है कि कथित घटना एकमात्र उदाहरण है, और इससे यह सुरक्षित रूप से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इससे पहले इस तरह की कोई आवधिक/दोहराई गई घटना नहीं हुई थी।”

पीठ ने पीड़िता के कार्यों की स्वैच्छिक प्रकृति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वह उससे मिलने के लिए यात्रा करके आई, उसके साथ रही और उसे वापस उसके पैतृक शहर छोड़ दिया गया, जहां उसके पिता ने उसे रिसीव किया। कोर्ट ने कहा: “यह वास्तव में दर्शाता है कि वह पूरे समय अपनी मर्जी और सहमति से कार्य कर रही थी। इसलिए, आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 376 के तहत आरोप तय करने के लिए कोई गंभीर संदेह (Grave Suspicion) नहीं है।”

IPC की धारा 90 के लागू होने पर कोर्ट ने कहा: “विद्वान ट्रायल कोर्ट ने सही देखा है कि पक्षकार एक-दूसरे से अच्छी तरह परिचित थे और कोई भी सामग्री यह सुझाव नहीं देती है कि शादी के झूठे आश्वासन पर शारीरिक संबंध बनाने के लिए कोई मजबूरी या प्रलोभन था, और न ही उसकी सहमति को IPC की धारा 90 के अर्थ में दूषित कहा जा सकता है।”

फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रफुल्ल कुमार सामल का हवाला देते हुए आरोप मुक्त करने के सिद्धांतों की पुष्टि की और दोहराया कि यदि सबूत केवल “संदेह पैदा करते हैं लेकिन गंभीर संदेह नहीं”, तो न्यायाधीश आरोपी को आरोप मुक्त करने के हकदार हैं।

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न्यायमूर्ति बनर्जी ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई अवैधता या विकृति नहीं है। नतीजतन, पीड़िता और राज्य की याचिकाएं खारिज कर दी गईं।

केस डिटेल्स:

  • केस टाइटल: प्रॉसिक्यूट्रिक्स (X) बनाम स्टेट एवं अन्य और स्टेट जीएनसीटी ऑफ दिल्ली बनाम सुमित
  • केस नंबर: CRL.REV.P. 630/2017 और CRL.REV.P. 648/2017
  • कोरम: न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री अनुपम एस. शर्मा और सुश्री अनिशा पी. दास
  • प्रतिवादी के वकील: श्री अक्षय चंद्रा, श्री भरत शर्मा, श्री दुर्गा दास वशिष्ठ और सुश्री विपासना बुबना

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