इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में बरेली के जिलाधिकारी अविनाश सिंह और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) अनुराग आर्य को अवमानना का नोटिस जारी किया है। यह मामला मोहम्मदगंज गांव में एक निजी आवास के भीतर मुस्लिम समुदाय के लोगों को नमाज अदा करने से कथित तौर पर रोकने से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निजी संपत्ति पर धार्मिक प्रार्थना करने का अधिकार सभी समुदायों के लिए समान है।
मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या प्रशासन किसी निजी निवास के भीतर होने वाली ऐसी धार्मिक सभाओं पर रोक लगा सकता है, जो सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा नहीं डालतीं। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने तारिक खान की याचिका पर सुनवाई करते हुए 12 फरवरी को अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत कार्यवाही शुरू की। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाते हुए दोनों अधिकारियों से अगली सुनवाई तक जवाब तलब किया है।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद की शुरुआत 16 जनवरी को हुई थी, जब मोहम्मदगंज गांव में रेशमा खान के खाली घर में नमाज पढ़ रहे कुछ लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया और बाद में छोड़ दिया। घर की मालकिन रेशमा खान का कहना था कि उन्होंने अपनी मर्जी से प्रार्थना की अनुमति दी थी और यह आयोजन पूरी तरह से उनके निजी परिसर की चारदीवारी के भीतर था। प्रशासन के इस हस्तक्षेप के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, इसे निजी संपत्ति पर पूजा करने के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन बताया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता तारिक खान ने हाईकोर्ट के एक पुराने फैसले ‘मरानाथ फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ का प्रमुखता से हवाला दिया। यह मामला ईसाई संगठनों द्वारा निजी स्थानों पर प्रार्थना सभा आयोजित करने से संबंधित था। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उस फैसले में दी गई सुरक्षा—कि निजी संपत्ति पर प्रार्थना के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है—अल्पसंख्यक वर्ग के सभी सदस्यों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।
तारिक खान ने कहा, “27 जनवरी का आदेश ईसाइयों से संबंधित था, जिसमें स्पष्ट था कि निजी संपत्ति में प्रार्थना की जा सकती है। हम भी अल्पसंख्यक हैं, इसलिए वही नियम हम पर भी लागू होना चाहिए।”
वरिष्ठ अधिवक्ता एस.एफ.ए. नकवी ने दलील दी कि प्रशासन का हस्तक्षेप कानूनी रूप से गलत था। उन्होंने कहा कि जब राज्य ने खुद स्वीकार किया है कि इस संबंध में कोई निषेधाज्ञा लागू नहीं थी, तो सार्वजनिक विरोध को आधार बनाकर किसी के संवैधानिक अधिकारों को नहीं रोका जा सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन का काम है, न कि निजी नागरिकों का।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन
हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया यह माना कि मरानाथ केस का पिछला फैसला इस वर्तमान स्थिति पर भी लागू होता है। उस उदाहरण में कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि:
- व्यक्ति बिना किसी पूर्व अनुमति के अपनी निजी संपत्ति के भीतर प्रार्थना कर सकते हैं।
- अनुमति केवल तब अनिवार्य है जब सभा सार्वजनिक सड़कों या सरकारी भूमि पर हो।
- आयोजकों को पुलिस को केवल तभी सूचित करना चाहिए जब आयोजन के सार्वजनिक स्थान तक फैलने की संभावना हो।
अवमानना नोटिस जारी करके हाईकोर्ट ने यह संकेत दिया है कि बरेली प्रशासन के कदम इन स्थापित न्यायिक दिशानिर्देशों की अनदेखी करते प्रतीत होते हैं।
धरातलीय स्थिति और प्रशासनिक रुख
कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद गांव में तनाव की स्थिति बनी हुई है। नमाज दोबारा शुरू होने पर कुछ स्थानीय निवासियों ने विरोध जताया है। विरोध स्वरूप पांच परिवारों ने अपने घरों पर “मकान बिकाऊ है” लिख दिया है। उनका दावा है कि रिहायशी संपत्तियों को स्थायी प्रार्थना स्थलों में बदला जा रहा है। इस संबंध में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी एक प्रतिवेदन भेजा गया है।
बरेली के एसएसपी अनुराग आर्य ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल तैनात है। उन्होंने प्रशासन का पक्ष रखते हुए कहा, “हमारी चिंता केवल यह सुनिश्चित करना है कि किसी रिहायशी संपत्ति को उचित कानूनी प्रक्रिया के बिना गुप्त रूप से सार्वजनिक पूजा स्थल में न बदला जाए।”
हाईकोर्ट ने अब 11 मार्च की तिथि निर्धारित की है, जब डीएम और एसएसपी के जवाबों की समीक्षा की जाएगी।

