इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 155(2) के तहत मजिस्ट्रेट, शिकायतकर्ता या किसी भी पीड़ित व्यक्ति द्वारा दिए गए आवेदन पर असंज्ञेय अपराध (Non-Cognizable Case) की विवेचना (इन्वेस्टिगेशन) का आदेश देने के लिए सशक्त हैं। कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें यह तर्क दिया गया था कि ऐसी अनुमति केवल पुलिस अधिकारी द्वारा ही मांगी जा सकती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला शिव प्रताप उर्फ जोखू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य से संबंधित है। 26 मार्च 2014 को थाना सम्मनपुर, जिला अंबेडकर नगर में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 352, 504 और 427 के तहत एक एनसीआर (NCR) दर्ज की गई थी।
एनसीआर दर्ज होने के बाद, शिकायतकर्ता ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के समक्ष एक आवेदन प्रस्तुत कर धारा 155(2) CrPC के तहत मामले की विवेचना की अनुमति मांगी। विद्वान मजिस्ट्रेट ने 28 मार्च 2014 को आवेदन स्वीकार कर लिया। इसके बाद पुलिस ने विवेचना की और 10 जून 2015 को आरोप पत्र (Charge Sheet) दाखिल किया, जिस पर कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए 21 नवंबर 2015 को याची (आरोपी) को तलब किया। इसी आदेश और कार्यवाही को चुनौती देने के लिए याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
पक्षों की दलीलें
याची के अधिवक्ता श्री रणविजय सिंह ने तर्क दिया कि धारा 155(2) CrPC के तहत विवेचना की अनुमति केवल पुलिस अधिकारी द्वारा मांगी जा सकती है। उन्होंने कहा कि चूंकि इस मामले में आवेदन शिकायतकर्ता द्वारा दिया गया था, इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा दी गई अनुमति अवैध है और इसके आधार पर की गई पूरी विवेचना दूषित है।
अपने तर्क के समर्थन में याची ने नवीन चंद्र पांडेय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1995) और कर्नाटक हाईकोर्ट के विजेश पिल्लई बनाम कर्नाटक राज्य (2023) के फैसलों का हवाला दिया।
इसके विपरीत, सरकारी वकील (AGA) और विपक्षी पक्ष के अधिवक्ता ने बृज लाल भर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006) के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि धारा 155(2) CrPC में मजिस्ट्रेट के ‘आदेश’ की आवश्यकता होती है, लेकिन इसमें ऐसा कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है कि प्रथम सूचना देने वाला (First Informant) ऐसा आवेदन नहीं दे सकता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
जस्टिस राजीव भारती की पीठ ने वैधानिक प्रावधानों और नजीरों का विश्लेषण किया। कोर्ट ने कहा कि धारा 155(2) CrPC यह प्रावधान करती है कि “कोई भी पुलिस अधिकारी मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना किसी असंज्ञेय मामले की विवेचना नहीं करेगा।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान विवेचना की शक्ति को प्रतिबंधित करता है, लेकिन “यह उस व्यक्ति को निर्दिष्ट नहीं करता है जो मजिस्ट्रेट से संपर्क कर सकता है।”
अदालत ने बृज लाल भर मामले में दी गई नजीर का पालन किया, जिसमें यह माना गया था कि मजिस्ट्रेट पुलिस या शिकायतकर्ता के आवेदन पर आदेश पारित कर सकते हैं। जस्टिस भारती ने कहा:
“धारा 155(2) CrPC के प्रावधान का उद्देश्य विवेचना पर न्यायिक पर्यवेक्षण (Judicial Supervision) सुनिश्चित करना है, न कि न्याय तक पहुंच को प्रतिबंधित करना। एक बार जब मजिस्ट्रेट ने अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग किया और अनुमति दे दी, तो उसके अनुसरण में की गई विवेचना को केवल इसलिए अवैध नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि आवेदन शिकायतकर्ता द्वारा दिया गया था।”
कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले (विजेश पिल्लई) पर याची की निर्भरता के संबंध में, हाईकोर्ट ने कहा कि वह निर्णय ‘कर्नाटक क्रिमिनल रूल्स ऑफ प्रैक्टिस, 1968’ पर आधारित था, जो उत्तर प्रदेश राज्य में लागू नहीं होता है। यूपी में ऐसी कोई विशिष्ट नियमावली नहीं है जो इस प्रक्रिया को रोकती हो।
निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने धारा 482 CrPC के तहत दायर याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि कार्यवाही में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। कोर्ट ने यह निर्धारित किया कि धारा 155(2) CrPC के तहत अनुमति मजिस्ट्रेट द्वारा शिकायतकर्ता या किसी भी पीड़ित व्यक्ति के आवेदन पर दी जा सकती है और इस प्रकार की गई विवेचना कानूनन मान्य है।
केस विवरण:
- केस टाइटल: शिव प्रताप उर्फ जोखू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: एप्लीकेशन यू/एस 482 नंबर 5062 ऑफ 2016
- जज: जस्टिस राजीव भारती

