कलकत्ता हाईकोर्ट ने POCSO मामले में गवाहों की दोबारा जिरह की अनुमति दी, कहा– हर मामला अपने तथ्यों के आधार पर तय होना चाहिए

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक POCSO मामले में सात अभियोजन गवाहों की दोबारा जिरह की अनुमति देते हुए कहा कि हालांकि यौन उत्पीड़न मामलों में पीड़ितों और कमजोर गवाहों को बार-बार अदालत बुलाना उचित नहीं है, लेकिन अभियुक्त को प्रभावी बचाव का अधिकार भी कायम रहना चाहिए। अदालत ने कहा कि हर मामला अपने तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाना चाहिए।

कलकत्ता हाईकोर्ट की पोर्ट ब्लेयर सर्किट बेंच ने एक अहम निर्णय में बाल यौन उत्पीड़न (POCSO) के एक मामले में अभियोजन पक्ष के सात गवाहों की दोबारा जिरह (recross-examination) की अनुमति दे दी है। यह आदेश स्पेशल POCSO कोर्ट के उस फैसले को पलटते हुए दिया गया जिसमें इस आवेदन को खारिज कर दिया गया था।

न्यायमूर्ति अपूर्व सिन्हा रॉय ने अपने आदेश में कहा:

“इस बात में दो राय नहीं कि POCSO मामलों में पीड़ितों/गवाहों को बार-बार बुलाने से बचना चाहिए जब तक कि यह बिल्कुल जरूरी न हो। लेकिन हर मामला अपने तथ्यों पर तय किया जाना चाहिए।”

आरोपी को 2022 में अंडमान की विशेष POCSO अदालत ने एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म के आरोप में भारतीय दंड संहिता, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और POCSO अधिनियम की धाराओं (धारा 6 और 12) के तहत दोषी ठहराते हुए 10 वर्षों के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

READ ALSO  धारा 482 सीआरपीसी: हाईकोर्ट को जांच करनी चाहिए कि क्या आरोप आरोपी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए अपराध का गठन करेंगे: सुप्रीम कोर्ट

बाद में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 9 अप्रैल 2024 को उस सजा को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट को आरोपी की पुनः जिरह कर नया निर्णय देने का निर्देश दिया।

पुनः जिरह के बाद आरोपी ने ट्रायल कोर्ट में सात अभियोजन गवाहों की दोबारा जिरह की अनुमति मांगी। उसका कहना था कि पहले के वकील द्वारा इन गवाहों की जिरह प्रभावी ढंग से नहीं की गई थी, जिससे उसके बचाव का अधिकार प्रभावित हो सकता है।

हालांकि, विशेष अदालत ने यह कहते हुए आग्रह खारिज कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में गवाहों को बार-बार बुलाना उचित नहीं है।

हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से कहा गया कि पूर्व वकील की कमी के कारण उसे समुचित बचाव का अवसर नहीं मिल पाया, और यदि दोबारा जिरह की अनुमति नहीं दी गई, तो वह गंभीर रूप से प्रभावित होगा।

राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यह याचिका केवल मुकदमे में देरी के लिए दाखिल की गई है, क्योंकि आरोपी पहले से ही ज़मानत पर है।

परंतु न्यायालय ने माना कि भले ही पीड़ितों और कमजोर गवाहों की सुरक्षा की अहमियत है, लेकिन आरोपी को सक्षम कानूनी सहायता से अपना पक्ष रखने का अधिकार भी बराबरी से मौजूद है।

READ ALSO  दिल्ली हाई कोर्ट ने फिल्म आदिपुरुष पर सुनवाई टाली

“अभियोजन गवाहों की जो जिरह पहले की गई, वह अधूरी और सतही प्रतीत होती है। यदि इसे वैसा ही रिकॉर्ड में रहने दिया गया, तो आरोपी अपना सही बचाव नहीं कर सकेगा,” न्यायमूर्ति रॉय ने कहा।

कोर्ट ने कहा कि:

“मैं मानता हूं कि रिविज़नल आवेदन में उल्लिखित बिंदुओं पर अभियोजन गवाहों की दोबारा जिरह की अनुमति दी जानी चाहिए क्योंकि यह आरोपी के न्यायपूर्ण बचाव के लिए आवश्यक है।”

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें पुनः जिरह की याचिका को अस्वीकार कर दिया गया था, और निर्देश दिया कि अभियोजन गवाहों की दोबारा जिरह कराई जाए।

READ ALSO  केरल हाईकोर्ट ने जीवन के अधिकार के तहत स्तनपान को संवैधानिक अधिकार के रूप में बरकरार रखा

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि जहां एक ओर POCSO कानून पीड़ितों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान देता है, वहीं न्याय प्रक्रिया में अभियुक्त को प्रभावी बचाव का अधिकार भी सुरक्षित रखा जाना जरूरी है।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles