सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिकाओं में आपराधिक पृष्ठभूमि का अनिवार्य खुलासा करने के लिए जारी किए दिशा-निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी कानूनी डिग्री और सर्टिफिकेट बनाने वाले एक बड़े रैकेट के मास्टरमाइंड माने जाने वाले आरोपी की जमानत रद्द कर दी है। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने 11 फरवरी, 2026 को दिए अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जमानत आदेश को “कानूनी रूप से अस्थिर” करार दिया। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने आरोपी द्वारा तथ्यों को छिपाने और डिग्री के फर्जी होने के पुख्ता सबूतों की अनदेखी की है।

अदालतों से राहत पाने के लिए तथ्यों को छिपाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए, शीर्ष अदालत ने जमानत याचिकाओं के लिए एक “डिस्क्लोजर फ्रेमवर्क” (प्रकटीकरण ढांचा) जारी किया है। कोर्ट ने रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) को निर्देश दिया है कि इस फैसले की प्रति सभी हाईकोर्ट्स के रजिस्ट्रार जनरल्स को भेजी जाए, ताकि जमानत आवेदनों में आपराधिक इतिहास का खुलासा अनिवार्य करने के लिए नियम बनाए जा सकें।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील जेबा खान (अपीलकर्ता) द्वारा दायर की गई थी, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के 30 जुलाई, 2025 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत आरोपी मजहर खान (प्रतिवादी संख्या 2) को जमानत दी गई थी। मजहर खान के खिलाफ जौनपुर के सराय ख्वाजा पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 419, 420, 467 और 468 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।

आरोप है कि मजहर खान शैक्षणिक प्रमाण पत्रों को फर्जी तरीके से बनाने और प्रसारित करने वाले एक संगठित गिरोह का संचालन कर रहा था। विशेष रूप से, उस पर आरोप है कि उसने “सर्वोदय ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस” से एलएलबी (LL.B.) की फर्जी डिग्री और मार्कशीट प्राप्त की, जिसे वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर से संबद्ध बताया गया था। इन फर्जी दस्तावेजों के आधार पर, उसने खुद को एक वकील के रूप में पंजीकृत कराया और सुप्रीम कोर्ट व अन्य हाईकोर्ट्स में पेश भी हुआ।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद महत्वपूर्ण सबूतों को नजरअंदाज करते हुए जमानत दी। कोर्ट को बताया गया कि वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय ने 10 अगस्त, 2024 को एक पत्र के माध्यम से स्पष्ट किया था कि सर्वोदय ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस उससे संबद्ध नहीं है और आरोपी द्वारा पेश की गई मार्कशीट विश्वविद्यालय द्वारा जारी नहीं की गई थी। इसके अलावा, सर्वोदय विद्यापीठ महाविद्यालय ने भी पुष्टि की कि वह कोई कानून (Law) का कोर्स संचालित नहीं करता है।

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अपीलकर्ता के वकील ने इस बात पर जोर दिया कि मजहर खान ने अपने खिलाफ दर्ज नौ एफआईआर की जानकारी छिपाई, जिनमें धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक धमकी जैसे गंभीर मामले शामिल हैं। यह भी आरोप लगाया गया कि एफआईआर दर्ज होने के बावजूद, आरोपी ने खुद को वकील के रूप में पेश करना जारी रखा और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की सदस्यता भी हासिल कर ली।

उत्तर प्रदेश राज्य के वकील ने अपील का समर्थन करते हुए पुष्टि की कि आरोपी एक “हिस्ट्रीशीटर” है और जांच में विश्वविद्यालय के आधिकारिक पत्रों से आरोपों की पुष्टि हुई है।

दूसरी ओर, आरोपी के वकील ने दलील दी कि यह एफआईआर एक लंबे समय से चले आ रहे पारिवारिक संपत्ति विवाद का परिणाम है, जिसमें शिकायतकर्ता उसकी भाभी हैं। उन्होंने तर्क दिया कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’, और आरोपी ने अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं किया है।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने आरोपी द्वारा प्रस्तुत “झूठे, भ्रामक और छिपाए गए तथ्यों” पर भरोसा किया। पीठ ने कहा कि विश्वविद्यालय और संस्थान के आधिकारिक पत्र अभियोजन पक्ष के मामले की जड़ हैं और उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता।

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कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:

“प्रतिवादी संख्या 2 के खिलाफ आरोप केवल जालसाजी की एक घटना तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रथम दृष्टया यह फर्जी शैक्षिक योग्यता, विशेष रूप से कानून की डिग्री, के निर्माण, खरीद और उपयोग के एक व्यवस्थित और संगठित अपराध को उजागर करते हैं, जिसका कानूनी पेशे और न्याय प्रशासन की अखंडता पर सीधा प्रभाव पड़ता है।”

आपराधिक इतिहास छिपाने पर: सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि आरोपी ने हाईकोर्ट के समक्ष कहा था कि उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, जबकि रिकॉर्ड में नौ एफआईआर दर्ज थीं। कुश दुरुका बनाम ओडिशा राज्य (2024) और नीरू यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2016) जैसे मामलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि गलत और अधूरी जानकारी ने न्यायिक विवेक के प्रयोग को भौतिक रूप से प्रभावित किया है।

कोर्ट ने कहा:

“महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और यह आपराधिक न्याय प्रशासन की जड़ों पर प्रहार करता है… इस आचरण को एक अलग चूक के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह आरोपियों द्वारा तथ्यों को छिपाकर राहत प्राप्त करने की एक बढ़ती और परेशान करने वाली प्रवृत्ति को दर्शाता है।”

फैसला और निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया।

  • जमानत रद्द: मजहर खान की जमानत रद्द कर दी गई है और उसे दो सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया गया है।
  • जांच का स्थानांतरण नहीं: कोर्ट ने जांच को किसी विशेष एजेंसी को सौंपने की प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया, यह देखते हुए कि चार्जशीट पहले ही दाखिल की जा चुकी है और पुलिस जांच में पक्षपात का कोई सबूत नहीं है।
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अनिवार्य प्रकटीकरण दिशानिर्देश (Mandatory Disclosure Guidelines)

तथ्यों को छिपाने की प्रथा पर लगाम लगाने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने जमानत आवेदनों के लिए एक “डिस्क्लोजर फ्रेमवर्क” प्रदान किया है। कोर्ट ने कहा कि जमानत मांगने वाले प्रत्येक आवेदक को निम्नलिखित जानकारी देनी होगी:

  1. आपराधिक इतिहास: सभी एफआईआर का विवरण और उनकी स्थिति (लंबित/बरी/दोषसिद्ध)।
  2. पिछली जमानत याचिकाएं: पहले की गई याचिकाओं का विवरण और उनका परिणाम।
  3. दंडात्मक प्रक्रियाएं: क्या कोई गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किया गया है या उसे भगोड़ा घोषित किया गया है।
  4. मामले का विवरण: एफआईआर संख्या, धाराएं और अधिकतम सजा।
  5. हिरासत और ट्रायल की स्थिति: हिरासत की अवधि और कार्यवाही का चरण।

कोर्ट ने निर्देश दिया:

“इस न्यायालय के रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) को निर्देश दिया जाता है कि वे इस फैसले की एक प्रति सभी हाईकोर्ट्स के रजिस्ट्रार जनरल्स को परिचालित करें। हाईकोर्ट्स अपने नियमों में उपयुक्त प्रावधानों को शामिल करने या प्रशासनिक निर्देश जारी करने की व्यवहार्यता की जांच कर सकते हैं… मार्गदर्शन के लिए इस फैसले की एक प्रति जिला न्यायपालिका को भी भेजी जाए।”

केस विवरण:

  • केस टाइटल: जेबा खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 825 ऑफ 2026 [SLP (Crl.) No. 12669 of 2025 से उद्भूत]
  • कोरम: जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन

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