वैवाहिक मामलों में ‘कानूनी भ्रम’ को लेकर हाईकोर्ट की फटकार के खिलाफ पारिवारिक न्यायाधीश की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा पारिवारिक न्यायाधीश को वैवाहिक कानूनों में प्रशिक्षण लेने का निर्देश देने पर उठे विवाद में न्यायिक अधिकारी की याचिका पर सुनवाई के लिए नोटिस जारी किया है। हाईकोर्ट ने न्यायिक निर्णयों में गंभीर कानूनी चूक की ओर इशारा करते हुए यह निर्देश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दिल्ली के एक पारिवारिक न्यायाधीश की उस याचिका पर सुनवाई करने का निर्णय लिया जिसमें उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा की गई तीखी टिप्पणियों और वैवाहिक कानूनों में “रिफ्रेशर ट्रेनिंग” लेने के निर्देश को चुनौती दी है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इस याचिका पर नोटिस जारी कर चार सप्ताह बाद सुनवाई निर्धारित की है।

जब याचिकाकर्ता के वकील ने हाईकोर्ट के आदेश पर तत्काल स्थगन की मांग की, तो सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इनकार करते हुए कहा, “हमने नोटिस जारी कर दिया है। इससे अधिक अभी क्या चाहिए?” हालांकि, पीठ ने यह भी कहा, “अगर हम संतुष्ट हुए तो हम टिप्पणियाँ हटाएंगे।”

सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की, “इसने ऐसी टिप्पणी क्यों आमंत्रित की? यह तो डिस्ट्रिक्ट जज होकर आर्टिकल 142 की शक्तियाँ इस्तेमाल कर रहा है।”
गौरतलब है कि संविधान का अनुच्छेद 142 केवल सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश दे सके।

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दिल्ली हाईकोर्ट ने नवंबर 2025 में पारित अपने निर्णय में संबंधित पारिवारिक न्यायाधीश द्वारा दिए गए फैसलों की विधिक दृष्टिकोण से तीखी आलोचना की थी।

हाईकोर्ट ने कहा था कि न्यायाधीश ने “अलग-अलग कानूनों की प्रक्रियाओं और उद्देश्यों को मिलाकर प्रस्तुत किया, जिससे वैवाहिक विवादों की विधिक संरचना विकृत हो गई।”
एक विशेष टिप्पणी में कोर्ट ने कहा था:

“हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि न्यायाधीश ने अपने निर्णय में स्पेशल मैरिज एक्ट की ऐसी धारा 28A का उल्लेख किया जो असल में कानून में मौजूद ही नहीं है, और उसी आधार पर तलाक की डिक्री दे दी।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट की उस चेतावनी से अवगत है, जिसमें कहा गया है कि अधीनस्थ न्यायपालिका के अधिकारियों के विरुद्ध व्यक्तिगत टिप्पणियों से बचा जाना चाहिए।
फिर भी, कोर्ट ने कहा:

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“जिस तरह से इस पारिवारिक न्यायालय के न्यायाधीश ने बार-बार कार्यवाही चलाई है, वह न्यायिक अंतरात्मा को विचलित करता है और न्यायिक प्रशासन की निष्पक्षता को संकट में डालता है।”

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि संबंधित न्यायिक अधिकारी को “दिल्ली न्यायिक अकादमी” के अंतर्गत वैवाहिक कानूनों में एक समुचित और व्यापक प्रशिक्षण प्राप्त करना होगा और तब तक वह आगे कोई वैवाहिक विवाद नहीं सुनेगा।

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सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायाधीश को सुने बिना ही कठोर टिप्पणियां कर दीं, जो न्यायसंगत नहीं है और सुप्रीम कोर्ट की पूर्ववर्ती व्यवस्था के विपरीत है।

अब सुप्रीम कोर्ट की ओर से जारी नोटिस के बाद यह तय होगा कि क्या हाईकोर्ट की टिप्पणियाँ न्यायोचित थीं या उन्हें हटाया जाना चाहिए।

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