बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में व्यक्तिगत अधिवक्ता (Individual Advocate) के खिलाफ जारी सर्विस टैक्स (Service Tax) की मांग और उसके बाद जारी वसूली नोटिस को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक अधिवक्ता द्वारा वकीलों की पार्टनरशिप फर्म को दी जाने वाली कानूनी सेवाएं सर्विस टैक्स के दायरे से बाहर (Exempt) हैं।
जस्टिस जी. एस. कुलकर्णी और जस्टिस आरती साठे की खंडपीठ ने मनीषा राजीव श्रॉफ बनाम भारत संघ एवं अन्य के मामले में यह फैसला सुनाया। पीठ ने कहा कि नामित अधिकारी (Designated Officer) ने अधिकार क्षेत्र के बिना और वित्त मंत्रालय द्वारा जारी बाध्यकारी अधिसूचनाओं के विपरीत जाकर कार्य किया है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता, मनीषा राजीव श्रॉफ, 5 फरवरी 2007 से बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र और गोवा में पंजीकृत एक अधिवक्ता हैं। विवाद की शुरुआत 27 अक्टूबर 2021 को जारी एक कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) से हुई। विभाग ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता के वर्ष 2016-17 के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR)/टीडीएस (TDS) डेटा और सर्विस टैक्स-3 रिटर्न में अंतर (Mismatch) था। विभाग का दावा था कि याचिकाकर्ता ने अपनी सर्विस टैक्स देनदारी का सही तरीके से निर्वहन नहीं किया, जिससे कथित तौर पर कर की चोरी हुई।
याचिकाकर्ता के अनुसार, कारण बताओ नोटिस और व्यक्तिगत सुनवाई (Personal Hearing) के लिए भेजे गए तीन नोटिस उनके पुराने पते पर भेजे गए थे, जो उन्हें कभी प्राप्त नहीं हुए। नतीजतन, 15 मार्च 2023 को एक मूल आदेश (Order-in-Original) पारित कर दिया गया, जिसमें ब्याज और जुर्माने के साथ 26,81,250 रुपये की सर्विस टैक्स देनदारी की पुष्टि की गई।
इस आदेश के बाद, विभाग ने 31 अक्टूबर 2025 को वसूली नोटिस जारी किया। 3 नवंबर 2025 को याचिकाकर्ता के आईसीआईसीआई बैंक खाते पर बिना किसी पूर्व सूचना के ग्रहणाधिकार (Lien) बना दिया गया। इसके अलावा, 21 दिसंबर 2025 को याचिकाकर्ता को पता चला कि उनका एक्सिस बैंक खाता भी फ्रीज कर दिया गया है। इसके बाद याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मिहिर गुप्ता, मयंक जैन और पल्लवी सिंह ने तर्क दिया कि एक अधिवक्ता द्वारा वकीलों की पार्टनरशिप फर्म को प्रदान की जाने वाली सेवाओं पर सर्विस टैक्स नहीं लगाया जा सकता। उन्होंने निम्नलिखित अधिसूचनाओं का हवाला दिया:
- नोटिफिकेशन नंबर 25/2012-ST (दिनांक 20 जून 2012)
- नोटिफिकेशन नंबर 30/2012-ST (दिनांक 20 जून 2012)
याचिकाकर्ता ने मुख्य रूप से तीन तर्क प्रस्तुत किए:
- छूट (Exemption): एक व्यक्तिगत अधिवक्ता या वकीलों की फर्म द्वारा किसी अन्य अधिवक्ता या वकीलों की फर्म को दी जाने वाली कानूनी सेवाएं सर्विस टैक्स लेवी से मुक्त हैं।
- रिवर्स चार्ज (Reverse Charge): वैकल्पिक रूप से, यदि सेवा किसी व्यावसायिक इकाई (Business Entity) को दी जाती है, तो रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म के तहत टैक्स चुकाने की जिम्मेदारी सेवा प्राप्त करने वाले की होती है, न कि अधिवक्ता की।
- प्राकृतिक न्याय (Natural Justice): नोटिस पुराने पते पर भेजे जाने के कारण याचिकाकर्ता अपना पक्ष नहीं रख सकीं, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ और एकतरफा आदेश पारित किया गया।
प्रतिवादी (भारत संघ) की ओर से अधिवक्ता जितेंद्र बी. मिश्रा उपस्थित हुए।
कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन
पीठ ने पाया कि इस कार्यवाही का आधार आयकर विभाग द्वारा प्राप्त तीसरे पक्ष के डेटा का सत्यापन था। हालांकि, कोर्ट ने नोट किया कि मुख्य मुद्दा स्पष्ट रूप से छूट अधिसूचनाओं (Exemption Notifications) के अंतर्गत आता है।
हाईकोर्ट ने माना कि यह कार्यवाही बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व निर्णय एडवोकेट पूजा पाटिल बनाम डिप्टी कमिश्नर, CGST और CX डिवीजन VI [2024(15) Centax 124(Bom.)] द्वारा कवर होती है।
पूजा पाटिल मामले में, कोर्ट ने नोटिफिकेशन नंबर 25/2012-ST की प्रविष्टि 6(b) का विश्लेषण किया था, जो स्पष्ट रूप से एक व्यक्ति द्वारा अधिवक्ता के रूप में या वकीलों की फर्म द्वारा किसी अन्य अधिवक्ता या फर्म को दी गई कानूनी सेवाओं को छूट प्रदान करती है। कोर्ट ने नोटिफिकेशन नंबर 30/2012-ST का भी उल्लेख किया, जिसमें निर्दिष्ट है कि व्यक्तिगत अधिवक्ता द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के लिए सेवा प्रदाता द्वारा देय सर्विस टैक्स का प्रतिशत “शून्य” है।
पूजा पाटिल फैसले का हवाला देते हुए, पीठ ने टिप्पणी की:
“हमारी राय में, जो बात अधिक मौलिक है वह यह है कि नामित अधिकारी को यह बताया गया था कि उनके पास कार्यवाही को आगे बढ़ाने का अधिकार क्षेत्र नहीं होगा, क्योंकि उपर्युक्त अधिसूचनाओं के प्रावधानों के अनुसार व्यक्तिगत अधिवक्ता पर सर्विस टैक्स नहीं लगाया जा सकता था, फिर भी विवादित आदेश पारित करते समय नामित अधिकारी द्वारा इस तर्क पर विचार नहीं किया गया।”
कोर्ट ने कहा कि नामित अधिकारी ने “अधिकार क्षेत्र के बिना कार्य किया” और ऐसा आदेश पारित किया जो “स्पष्ट रूप से 20 जून 2012 की अधिसूचनाओं के विपरीत” था।
निर्णय
हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि वर्तमान कार्यवाही उक्त अधिसूचनाओं और एडवोकेट पूजा पाटिल मामले में स्थापित कानून के अंतर्गत आती है।
परिणामस्वरूप, कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:
- आदेश रद्द: 15 मार्च 2023 का ‘ऑर्डर-इन-ओरिजिनल’ (संख्या SG-83/DC/MSH/DIV-V/2023) रद्द और निरस्त किया जाता है।
- वसूली नोटिस रद्द: प्रतिवादियों को 31 अक्टूबर 2025 के वसूली नोटिस (Recovery Notice) को वापस लेने और रद्द करने का निर्देश दिया गया।
- कारण बताओ नोटिस रद्द: 27 अक्टूबर 2021 का कारण बताओ नोटिस भी रद्द कर दिया गया।
कोर्ट ने लागत (Costs) के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: मनीषा राजीव श्रॉफ बनाम भारत संघ एवं अन्य
- केस नंबर: रिट याचिका (L) नंबर 1684 ऑफ 2026
- कोरम: जस्टिस जी. एस. कुलकर्णी और जस्टिस आरती साठे
- याचिकाकर्ता के वकील: श्री मिहिर गुप्ता, श्री मयंक जैन और सुश्री पल्लवी सिंह
- प्रतिवादियों के वकील: श्री जितेंद्र बी. मिश्रा के साथ संगीता यादव, श्री रूपेश दुबे (भारत संघ); सुश्री श्रुति व्यास के साथ नियति मनकड (राज्य)

