केरल हाईकोर्ट ने 2017 में सबरीमला मंदिर में नए ध्वजदंड (कोडिमरम) की स्थापना से जुड़ी सोने और धन की कथित हेराफेरी के मामले में सतर्कता और भ्रष्टाचार रोधी ब्यूरो (VACB) को प्रारंभिक जांच का निर्देश दिया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति राजा विजयराघवन वी और न्यायमूर्ति के वी जयकुमार की पीठ ने उस समय पारित किया, जब वह मंदिर के द्वारपालक प्लेट्स और श्रीकोविल (गर्भगृह) के दरवाजों से जुड़े सोने की कथित हानि की विशेष जांच दल (SIT) द्वारा की जा रही जांच की प्रगति की समीक्षा कर रही थी।
पीठ ने रिकॉर्ड के आधार पर बताया कि ध्वजदंड को बदलने का निर्णय पुराने खंभे के घिस जाने और खराब हो जाने के कारण लिया गया था। त्रावणकोर देवस्वं बोर्ड (TDB) ने अदालत को सूचित किया था कि हैदराबाद स्थित फीनिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड इस पूरे कार्य का वित्तपोषण करेगा।
3 अगस्त 2016 के आदेश में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने परियोजना को मंजूरी दी थी, जिसमें स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया था कि परियोजना की निगरानी तिरुवाभरणम आयुक्त, देवस्वं प्रमुख अभियंता और अधिवक्ता आयुक्त ए एस पी कुरुप द्वारा की जाएगी।
मुख्य सतर्कता अधिकारी द्वारा अदालत के समक्ष पेश किए गए रिकॉर्ड के अनुसार, 22 मार्च 2017 को कस्टम विभाग से 9.161 किलोग्राम सोना खरीदा गया था। इसके अतिरिक्त 412 ग्राम सोना भक्तों द्वारा दान किया गया था। इस प्रकार कुल सोना 9,573.010 ग्राम था। जबकि रिकॉर्ड में दर्शाया गया कि केवल 9,340.200 ग्राम सोना ध्वजदंड में उपयोग हुआ।
अदालत ने चिंता जताई कि भक्तों से मिले दान के संबंध में देवस्वं नियमावली के अनुसार फॉर्म 3ए में आवश्यक रसीदें नहीं दी गईं। इससे यह पता लगाना असंभव हो गया कि किस भक्त ने कितना दान दिया।
“यह देवस्वं नियमों और वित्तीय जवाबदेही मानदंडों का गंभीर उल्लंघन है,” अदालत ने टिप्पणी की।
चूंकि SIT पहले से ही अन्य गंभीर मामलों की जांच कर रही है, इसलिए अदालत ने इस मामले को VACB को सौंपने का निर्णय लिया। कोर्ट ने VACB निदेशक को निर्देश दिया कि वह योग्य और ईमानदार अधिकारियों की एक टीम गठित करें, जो इस मामले की प्रारंभिक जांच करे।
जांच में निम्नलिखित शामिल होंगे:
- सभी वित्तीय और भौतिक रिकॉर्ड की जांच
- दानदाताओं के बयान दर्ज करना
- यह निर्धारित करना कि क्या भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कोई संज्ञेय अपराध बनता है
अदालत ने VACB निदेशक से 30 दिनों के भीतर रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है।

