हाईमन का सुरक्षित होना रेप न होने का सबूत नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने डॉक्टर और उसकी सहयोगी की 10 साल की सजा बरकरार रखी

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2001 के एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल मेडिकल रिपोर्ट में हाईमन (Hymen) का सुरक्षित पाया जाना इस बात का प्रमाण नहीं है कि रेप नहीं हुआ। अदालत ने एक डॉक्टर और उसकी महिला सहयोगी द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए उनकी सजा को बरकरार रखा है।

जस्टिस विमल कुमार यादव की पीठ ने 6 फरवरी, 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में ट्रायल कोर्ट के उस निर्णय की पुष्टि की, जिसमें मुख्य आरोपी (डॉक्टर) को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 के तहत और सह-आरोपी महिला को धारा 376 सहपठित धारा 109 और धारा 342 के तहत दोषी ठहराया गया था। दोनों को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह घटना 19 दिसंबर, 2001 की है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 15 वर्षीय पीड़िता पेट दर्द की शिकायत लेकर अपीलकर्ता डॉक्टर के क्लिनिक पर गई थी। डॉक्टर ने उसे एक गोली दी, जिससे उसे बेचैनी होने लगी। इसके बाद डॉक्टर उसे पड़ोस के एक कमरे में ले गया, जहां सह-आरोपी महिला मौजूद थी।

आरोप है कि सह-आरोपी महिला कमरे से बाहर चली गई और पीड़िता के विरोध के बावजूद दरवाजा बाहर से बंद कर दिया। डॉक्टर ने पीड़िता को यह कहते हुए दिलासा दिया कि “चिंता मत करो, आराम करो” और फिर उसके साथ यौन उत्पीड़न किया। पीड़िता द्वारा शोर मचाने पर पड़ोसी वहां पहुंचे और ताला तोड़कर उसे बाहर निकाला। पुलिस के आने से पहले भीड़ ने आरोपी डॉक्टर की पिटाई भी की।

बचाव पक्ष की दलीलें

अपीलकर्ता डॉक्टर के वकील ने तर्क दिया कि धारा 376 (रेप) के तहत अपराध साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है। उन्होंने दावा किया कि यह मामला ज्यादा से ज्यादा धारा 374 (छेड़छाड़) के दायरे में आ सकता है। बचाव पक्ष ने “कमजोर मेडिकल साक्ष्यों” का हवाला देते हुए कहा कि पीड़िता की एमएलसी (MLC) रिपोर्ट में हाईमन सुरक्षित (Intact) पाया गया था, जो यह दर्शाता है कि रेप नहीं हुआ।

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इसके अलावा, जांच में खामियों का मुद्दा भी उठाया गया, जैसे कि टूटा हुआ ताला बरामद नहीं किया गया और कमरे के स्वामित्व को स्थापित नहीं किया गया। सह-आरोपी महिला की ओर से दलील दी गई कि घटना के वक्त वह काम पर थी (Alibi), इसलिए उसे झूठा फंसाया गया है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी

मेडिकल साक्ष्य और धारा 375 आईपीसी

हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि हाईमन के सुरक्षित होने से रेप का आरोप खारिज हो जाता है। जस्टिस यादव ने आईपीसी की धारा 375 के स्पष्टीकरण का हवाला देते हुए कहा कि रेप के अपराध के लिए पूर्ण यौन संबंध (complete sexual intercourse) होना अनिवार्य नहीं है; केवल पेनेट्रेशन (penetration) ही अपराध गठित करने के लिए पर्याप्त है।

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अदालत ने कहा:

“भले ही वजाइनल स्मीयर से पूर्ण संभोग की संभावना कम दिखती हो, लेकिन यौन हमले या पेनेट्रेशन के प्रयास की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि पीड़िता के कपड़ों पर मानव वीर्य (Semen) के निशान पाए गए थे, जो अभियोजन पक्ष के मामले की पुष्टि करते हैं।

जांच में खामियां

टूटे हुए ताले की बरामदगी न होने जैसी जांच की कमियों पर अदालत ने व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया। पीठ ने कहा कि जब पुलिस मौके पर पहुंची, तो वहां सैकड़ों लोगों की भीड़ थी और पुलिस की प्राथमिकता आरोपी को भीड़ के गुस्से से बचाना था। दयाल सिंह बनाम उत्तरांचल राज्य के मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि केवल दोषपूर्ण जांच के आधार पर आरोपी को बरी करना उचित नहीं होगा।

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पीड़िता की गवाही

हाईकोर्ट ने भरवाड़ा भोगीभाई हीराजीभाई बनाम गुजरात राज्य के फैसले का उल्लेख करते हुए दोहराया कि यौन उत्पीड़न की पीड़िता की गवाही को बहुत महत्व दिया जाना चाहिए, भले ही उसका कोई अन्य स्वतंत्र गवाह न हो। अदालत ने कहा कि भारतीय सामाजिक परिवेश में, पीड़िता की गवाही पर अविश्वास करना “जले पर नमक छिड़कने” जैसा होगा।

“एलिबाई” (Alibi) का बचाव खारिज

सह-आरोपी महिला द्वारा घटना के समय काम पर होने के दावे को अदालत ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने पाया कि उसने अपनी उपस्थिति साबित करने के लिए कोई उपस्थिति रजिस्टर या रोजगार का विवरण पेश नहीं किया। अदालत ने इसे केवल एक “कोरा दावा” (bald assertion) माना।

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि सह-आरोपी महिला ने कमरे को बाहर से बंद करके डॉक्टर को अपराध करने का अवसर प्रदान किया और उसे उकसाया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपना मामला साबित करने में सफल रहा है।

फलस्वरूप, अदालत ने दोनों अपीलकर्ताओं की सजा बरकरार रखते हुए उन्हें तुरंत आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।

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