इलाहाबाद हाईकोर्ट ने झांसी जिला अदालत के एक पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) के खिलाफ “लापरवाह और आधारहीन” आरोप लगाने के लिए दो आरोपियों पर 1 लाख रुपये का भारी जुर्माना लगाया है। इसी के साथ अदालत ने उनकी केस ट्रांसफर अर्जी को खारिज कर दिया।
न्यायमूर्ति समित गोपाल की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए निचली अदालत द्वारा पारित एक हस्तलिखित आदेश (handwritten order) पर भी कड़ी नाराजगी जाहिर की। कोर्ट ने पाया कि उस आदेश में तारीख और ‘N.B.W.’ (गैर-जमानती वारंट) शब्द के अलावा कुछ भी पढ़ा नहीं जा सकता था।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता श्याम सुंदर और ओम प्रकाश ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 447 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। वे झांसी के अतिरिक्त सिविल जज (सीनियर डिवीजन) / एसीजेएम कोर्ट नंबर 1 में लंबित शिकायत संख्या 15951/2024 (हरि शंकर बनाम श्याम सुंदर और अन्य) को किसी अन्य अदालत में स्थानांतरित करने की मांग कर रहे थे। यह मामला आईपीसी की धारा 387, 323, 504 और 506 के तहत दर्ज है।
इससे पहले, आवेदकों ने 6 अगस्त 2025 के समनिंग आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ ने 15 नवंबर 2025 को कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया था, लेकिन उन्हें उचित चरण पर डिस्चार्ज (उन्मोचन) अर्जी दाखिल करने की छूट दी थी।
क्या थे आरोप?
याचिकाकर्ताओं के वकील नीरज तिवारी ने तर्क दिया कि निचली अदालत जल्दबाजी में काम कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि पीठासीन अधिकारी शिकायतकर्ता (विपक्षी नंबर 2) के भाई, जो एक वकील हैं, के दबाव में हैं।
ट्रांसफर अर्जी के पैरा 14 में एक गंभीर आरोप लगाया गया कि शिकायतकर्ता के भाई ने जज से उनके चैंबर में मुलाकात की और केवल उनके कहने पर अदालत ने 5 नवंबर 2025 को उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी कर दिया। इस आरोप के समर्थन में दिए गए हलफनामे में कहा गया कि यह जानकारी “रिकॉर्ड के अवलोकन” (perusal of records) पर आधारित है।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य की ओर से पेश वकील बड़े लाल बिंद ने याचिका का विरोध करते हुए इसे ट्रायल को लटकाने की चाल बताया। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट के निर्देश और अंतरिम सुरक्षा के बावजूद, आवेदकों ने दो महीने से अधिक समय तक डिस्चार्ज अर्जी दाखिल नहीं की।
पक्षपात के आरोपों पर राज्य ने कहा कि ये अवमाननापूर्ण हैं। उन्होंने बताया कि जिस आदेश (5 नवंबर 2025) का हवाला दिया जा रहा है, उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह साबित हो कि पीठासीन अधिकारी किसी से चैंबर में मिले थे।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
आधारहीन आरोपों पर कार्यवाही न्यायमूर्ति समित गोपाल ने रिकॉर्ड की जांच की और पाया कि पीठासीन अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह से निराधार हैं। कोर्ट ने कहा कि हलफनामे में दावा किया गया है कि आरोप “रिकॉर्ड के अवलोकन” पर आधारित हैं, लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी मौजूद नहीं है जो यह दर्शाता हो कि जज ने चैंबर में किसी से मुलाकात के बाद आदेश दिया।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“पैरा 14 में लगाए गए आरोप बिना किसी आधार और तथ्य के हैं… इस प्रकार ये आरोप पूरी तरह से लापरवाह (reckless) और आधारहीन हैं।”
अपठनीय आदेश पर नाराजगी सुनवाई के दौरान, हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 5 नवंबर 2025 के उस आदेश की प्रमाणित प्रति देखी, जिसके जरिए एनबीडब्ल्यू (NBW) जारी किया गया था। लिखावट को देखकर कोर्ट ने गहरा असंतोष व्यक्त किया।
न्यायमूर्ति समित गोपाल ने कहा:
“उस आदेश में तारीख, महीने और ‘N.B.W.’ शब्द के अलावा क्या लिखा है, कुछ भी पढ़ा नहीं जा सकता। यहां तक कि जिस साल में यह आदेश दिया गया, वह भी अपठनीय है।”
कोर्ट ने कहा कि न्यायिक और प्रशासनिक स्तर पर बार-बार निर्देश जारी किए जाने के बावजूद कि आदेश सुपाठ्य (legible) होने चाहिए, निचली अदालत इस बारे में “पूरी तरह अनजान” प्रतीत होती है और बिना देखे ही आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए।
फैसला
हाईकोर्ट ने ट्रांसफर अर्जी को खारिज करते हुए आवेदकों पर 1,00,000 रुपये (एक लाख रुपये) का जुर्माना लगाया।
- जुर्माना जमा करने की समय सीमा: 10 दिनों के भीतर निचली अदालत में।
- उपयोग: यह राशि जिला विधिक सेवा समिति (District Legal Services Committee) को भेजी जाएगी।
- अवज्ञा पर: यदि भुगतान नहीं किया जाता है, तो झांसी के जिलाधिकारी को भू-राजस्व (land revenue) की तरह राशि वसूलने का निर्देश दिया गया है।
लिखावट सुधारने के निर्देश कोर्ट ने झांसी के जिला एवं सत्र न्यायाधीश को निर्देश दिया कि वे संबंधित न्यायिक अधिकारी के ध्यान में यह बात लाएं और भविष्य में सुपाठ्य आदेश सुनिश्चित करें। रजिस्ट्रार (कम्प्लायंस) को एक सप्ताह के भीतर अनुपालन के लिए आदेश भेजने और जिला जज से दो सप्ताह में रिपोर्ट तलब करने को कहा गया है।
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: श्याम सुंदर और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: ट्रांसफर एप्लीकेशन (क्रिमिनल) नंबर – 50 ऑफ 2026
- कोरम: न्यायमूर्ति समित गोपाल

