क्या एक परिवीक्षाधीन (Probationer) जज को बिना किसी औपचारिक जांच के सेवा से हटाया जा सकता है? दिल्ली हाईकोर्ट ने इस सवाल का जवाब देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी परिवीक्षाधीन न्यायिक अधिकारी को उसकी ‘समग्र अनुपयुक्तता’ (Overall Unsuitability) के आधार पर हटाया जाता है, तो इसे ‘दंडात्मक’ (Punitive) कार्रवाई नहीं माना जाएगा।
न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति अमित महाजन की खंडपीठ ने पूर्व अतिरिक्त जिला न्यायाधीश (ADJ) अमन प्रताप सिंह की याचिका को खारिज करते हुए उनकी बर्खास्तगी को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि सेवा समाप्ति का आदेश “सिम्पलिसिटर” (Simpliciter) प्रकृति का था, जो किसी विशिष्ट कदाचार पर नहीं, बल्कि अधिकारी के प्रदर्शन के मूल्यांकन पर आधारित था।
क्या था पूरा मामला?
अमन प्रताप सिंह को 28 अप्रैल, 2023 को दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा (DHJS) में दो साल की परिवीक्षा अवधि पर नियुक्त किया गया था। उन्होंने 1 सितंबर, 2023 को द्वारका कोर्ट में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाला।
मामले ने तूल तब पकड़ा जब 6 सितंबर, 2024 को कोर्ट रूम की एक घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। वीडियो में जज और एक वादी के बीच बहस होती दिख रही थी। सोशल मीडिया पर इस वीडियो को लेकर कई तरह के दावे किए गए, जिसमें जज के कथित रूप से नशे में होने की बात भी कही गई थी।
याचिकाकर्ता (पूर्व जज) का आरोप था कि इस वायरल वीडियो के बाद ही मुख्य न्यायाधीश ने स्वतः संज्ञान लिया और बिना उनका पक्ष सुने, 13 सितंबर 2024 को हुई ‘फुल कोर्ट’ मीटिंग में उन्हें सेवा से हटाने का फैसला ले लिया गया। उन्होंने तर्क दिया कि यह कार्रवाई वास्तव में उस वीडियो और कथित कदाचार के कारण की गई है, जो कि दंडात्मक है और इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत पूरी विभागीय जांच होनी चाहिए थी।
हाईकोर्ट का चौंकाने वाला खुलासा: वीडियो से पहले ही खराब थी रिपोर्ट
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट (प्रशासन पक्ष) ने एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखा जिसने याचिकाकर्ता के दावों को कमजोर कर दिया। हाईकोर्ट के वकील ने बताया कि सेवा समाप्ति का कारण वायरल वीडियो नहीं था।
कोर्ट के रिकॉर्ड से पता चला कि वीडियो वायरल होने की घटना (6 सितंबर 2024) से पहले ही, 29 अगस्त 2024 को ‘निरीक्षण न्यायाधीशों की समिति’ (Inspecting Judges’ Committee) ने याचिकाकर्ता की वर्ष 2023 की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) तैयार कर ली थी।
इस रिपोर्ट में याचिकाकर्ता के काम को लेकर गंभीर टिप्पणियां की गई थीं:
- उनके निर्णयों और आदेशों को “औसत से कम” (Below Average) श्रेणी में रखा गया था।
- उनके व्यवहार के बारे में नोट किया गया था कि वे अधिवक्ताओं के प्रति “बेहद कठोर” (Extremely rude) थे और उन्हें अपने कोर्ट संचालन के तरीके में सुधार की आवश्यकता थी।
कोर्ट का विश्लेषण: ‘मकसद’ और ‘आधार’ में अंतर
खंडपीठ ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि एक परिवीक्षाधीन अधिकारी को पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि किसी आदेश के पीछे का ‘मकसद’ (Motive) और उसका ‘आधार’ (Foundation) दो अलग चीजें हैं।
कोर्ट ने पाया कि भले ही वीडियो की घटना के बाद कुछ पूछताछ की गई हो, लेकिन सेवा समाप्ति का असली आधार वह ACR और सेवा रिकॉर्ड था, जिसमें उन्हें न्यायिक सेवा के लिए अनुपयुक्त पाया गया था।
खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा:
“सेवा समाप्ति आदेश में कोई कलंकपूर्ण भाषा नहीं है और न ही किसी दोष का उल्लेख है; इसे स्पष्ट रूप से परिवीक्षा के दौरान समाप्ति के रूप में जारी किया गया है। समकालीन रिकॉर्ड से पता चलता है कि कार्य और व्यवहार पर प्रतिकूल टिप्पणियों वाली ACR और फुल कोर्ट के समक्ष रखी गई शिकायतों ने उनकी अनुपयुक्तता के बारे में संस्थागत राय का आधार बनाया।”
फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की सेवा समाप्ति दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा नियम, 1970 के नियम 14 के तहत एक वैध कार्रवाई थी। यह नियम परिवीक्षाधीन अधिकारी को बिना कारण बताए हटाने की शक्ति देता है। चूंकि यह आदेश किसी विशिष्ट कदाचार की जांच का परिणाम नहीं था, बल्कि समग्र प्रदर्शन का मूल्यांकन था, इसलिए इसे दंडात्मक नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा:
“सेवा समाप्ति, प्रकृति में सिम्पलिसिटर (Simpliciter) होने के कारण, न तो दंडात्मक है और न ही कलंकपूर्ण। इसलिए, यह संविधान के अनुच्छेद 311(2) के सुरक्षा उपायों या अनुशासनात्मक कार्यवाही पर लागू होने वाले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को आकर्षित नहीं करती है।”
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: अमन प्रताप सिंह बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार और अन्य
- केस नंबर: W.P. (C) 15486/2024
- कोरम: न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति अमित महाजन

