‘यह नया युग है’: सुप्रीम कोर्ट में प्रेस की आज़ादी बनाम ‘भूल जाने के अधिकार’ पर सुनवाई को मंज़ूरी

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका पर सुनवाई के लिए हामी भर दी जिसमें एक मीडिया संस्थान ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ खबरों के प्रकाशन पर रोक लगाई थी जिसे आपराधिक मामले में आरोपमुक्त किया जा चुका है। कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) और व्यक्ति की गरिमा, निजता और ‘भूल जाने के अधिकार’ (अनुच्छेद 21) के बीच संतुलन ज़रूरी है। कोर्ट ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए 16 मार्च को अगली सुनवाई तय की है।

न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने एक मीडिया हाउस की विशेष अनुमति याचिका पर विचार करने का निर्णय लिया है। यह याचिका 18 दिसंबर 2025 को पारित दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी जिसमें ट्रायल कोर्ट के एक निषेधाज्ञा (injunction) आदेश को बरकरार रखा गया था। आदेश के तहत, एक व्यक्ति के खिलाफ खबरें प्रकाशित करने या प्रसारित करने पर रोक लगाई गई थी, जिसे एक आपराधिक मामले में आरोपमुक्त कर दिया गया था। साथ ही, ऑनलाइन प्रकाशित रिपोर्टों को हटाने का निर्देश भी दिया गया था।

मीडिया हाउस ने कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए खबरें हटा दीं, लेकिन इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर आघात बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार, जो याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए, ने तर्क दिया कि “भूल जाने का अधिकार” (Right to be Forgotten) प्रेस की स्वतंत्रता को खत्म नहीं कर सकता।

“जानने का अधिकार प्रधान होगा। समाचार को मिटाया नहीं जा सकता।”

READ ALSO  वक्फ कानून विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के केएस पुट्टस्वामी निर्णय (2017) का हवाला देते हुए कहा कि निजता का अधिकार इतिहास मिटाने का अधिकार नहीं देता। उन्होंने कहा कि कई हाईकोर्ट दिल्ली हाईकोर्ट के इसी आदेश को मिसाल मानते हुए पुराने समाचार हटाने का आदेश दे रहे हैं।

दातार ने सवाल उठाया:

“अगर कोर्ट कोई प्रतिकूल टिप्पणी करता है, तो वह समाचार बनता है। क्या सिर्फ इसलिए उसे हटाया जा सकता है क्योंकि वह टिप्पणी बाद में हट गई?”

उन्होंने यह भी कहा कि एक बार जब किसी व्यक्ति को आरोपमुक्त कर दिया जाता है, और उस आदेश को ऊपरी अदालत में चुनौती दी जाती है, तब मामला अब भी ‘सक्रिय’ (alive) होता है।

READ ALSO  इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि छात्रों को ऐसी गतिविधियों में शामिल नहीं होना चाहिए जिससे महान संस्थानों का नाम खराब हो

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मानहानि कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया लेकिन स्पष्ट किया कि दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश ‘प्रेसिडेंट’ के रूप में नहीं माना जाएगा।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा:

“यह नया युग है। अब लोग सोशल मीडिया के युग में खुद को भुलवाना चाहेंगे।”

उन्होंने पूछा कि “जब खबरें सार्वजनिक रिकॉर्ड में हैं, तो कैसे ‘भूल जाने के अधिकार’ को लागू किया जाए?”

न्यायमूर्ति भुइयां ने टिप्पणी की:

“आजकल निजता की दीवार खड़ी कर दी जा रही है जिससे नागरिकों को जानकारी से वंचित किया जा रहा है। यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।”

इस याचिका में देश के कई प्रमुख मीडिया संस्थानों को पक्षकार बनाया गया है। इंडियन कानून जैसी ऑनलाइन कानूनी वेबसाइट ने भी हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी है। उनके वकील ने कोर्ट आदेशों को हटाने के गंभीर परिणामों की ओर ध्यान दिलाया।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले 24 जुलाई 2024 को भी कहा था कि आपराधिक मामलों में बरी होने के बाद ‘भूल जाने के अधिकार’ के तहत कोर्ट के फैसलों को सार्वजनिक मंचों से हटाने के आदेश के “गंभीर परिणाम” हो सकते हैं।

READ ALSO  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने त्योहारों और शादियों के दौरान ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ जनहित याचिका पर जवाब मांगा

यह संवैधानिक सवाल पहले से ही सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है।

  • क्या किसी व्यक्ति को आपराधिक मामले में आरोपमुक्त होने के बाद “भूल जाने के अधिकार” के तहत समाचार व अदालती आदेशों को डिजिटल माध्यमों से हटवाने का अधिकार है?
  • जब अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रेस की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा और निजता का अधिकार टकराते हैं, तो कौन-सा अधिकार प्रधान होगा?

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles