दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि तुर्कमान गेट में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान हुई पत्थरबाज़ी की घटना में किसी व्यक्ति को केवल भीड़ में मौजूद होने के आधार पर गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक अभियुक्त की अग्रिम ज़मानत याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
यह मामला 6 और 7 जनवरी की मध्य रात्रि को रामलीला मैदान क्षेत्र स्थित फैज़-ए-इलाही मस्जिद के पास हुई हिंसा से जुड़ा है। दिल्ली पुलिस के अनुसार, सोशल मीडिया पर यह अफवाह फैली कि तुर्कमान गेट के सामने स्थित मस्जिद को तोड़ा जा रहा है, जिससे करीब 150–200 लोग मौके पर एकत्र हो गए और पुलिस तथा नगर निगम कर्मियों पर पत्थर और बोतलें फेंकीं। इस घटना में क्षेत्र के एसएचओ सहित छह पुलिसकर्मी घायल हुए थे।
न्यायमूर्ति प्रतीक जलान, आरोपी साजिद इक़बाल की अग्रिम ज़मानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। पुलिस ने आरोप लगाया है कि इक़बाल ने बैरिकेड हटाया और भीड़ को भड़काया।
याचिकाकर्ता के वकील ने दावा किया कि साजिद किसी रिश्तेदार के घर से लौटते समय उस भीड़ में फंस गए थे और उन्होंने कोई हिंसात्मक कार्य नहीं किया।
दिल्ली पुलिस के वकील ने कहा कि यह मामला एक “गंभीर साजिश” की जांच से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि साजिद ने न केवल बैरिकेड हटाया बल्कि लोगों को उकसाया भी।
पुलिस ने एक वीडियो क्लिप भी कोर्ट को दिखाई। इस पर न्यायमूर्ति जलान ने निर्देश दिया कि वीडियो को उचित टाइमस्टैम्प के साथ रिकॉर्ड में शामिल किया जाए और साजिद की भूमिका स्पष्ट रूप से दर्शाते हुए स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की जाए।
न्यायमूर्ति जलान ने मौखिक रूप से कहा:
“अगर वीडियो में वह उकसाता दिख रहा है, तो आप सही हैं। लेकिन अगर वह सिर्फ रास्ते से गुजर रहा है, तो आप सही नहीं हैं… अगर आप वहां मौजूद हर व्यक्ति को पकड़ रहे हैं, तो ऐसा नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि केवल मौजूदगी के आधार पर गिरफ्तारी नहीं हो सकती; हर व्यक्ति की विशिष्ट भूमिका की जांच आवश्यक है।
ट्रायल कोर्ट ने 21 जनवरी को साजिद की अग्रिम ज़मानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि जांच प्रारंभिक चरण में है और वीडियो में वह भीड़ को इकट्ठा करते और बैरिकेड हटाते हुए दिख रहा है।
हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह तय की है। दिल्ली पुलिस को तब तक स्टेटस रिपोर्ट और वीडियो साक्ष्य प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।

