पत्नी की मानसिक बीमारी के आधार पर तलाक लेने के बाद पति भरण-पोषण देने से बचने के लिए उसकी शैक्षणिक योग्यता का हवाला नहीं दे सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई पति अपनी पत्नी की मानसिक अस्वस्थता (insanity) साबित करके तलाक हासिल करता है, तो बाद में वह भरण-पोषण (Maintenance) देने से बचने के लिए यह तर्क नहीं दे सकता कि पत्नी शिक्षित है और आजीविका कमाने में सक्षम है।

न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने कहा कि पति द्वारा अपनाए गए ऐसे विरोधाभासी रुख कानूनी रूप से अस्थिर हैं। हाईकोर्ट ने पति की इस दलील को खारिज करते हुए पत्नी की भरण-पोषण राशि में बढ़ोतरी करने का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी noted किया कि पति दुबई में चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) के रूप में कार्यरत है और उसकी आय अच्छी खासी है। हालांकि, कोर्ट ने एरियर (बकाया राशि) की गणना को लेकर पत्नी द्वारा दायर एक अलग याचिका को खारिज कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

हाईकोर्ट याचिकाकर्ता (पत्नी) द्वारा दायर दो पुनरीक्षण याचिकाओं (Revision Petitions) पर सुनवाई कर रहा था। इस जोड़े का विवाह 1999 में हुआ था। वैवाहिक विवादों के चलते वर्ष 2004 में पत्नी को 3,000 रुपये का भरण-पोषण दिया गया था, जिसे 2005 में आपसी सहमति से बढ़ाकर 6,000 रुपये कर दिया गया था।

वर्ष 2008 में, पति को “क्रूरता और पागलपन” (Cruelty and Insanity) के आधार पर तलाक की डिक्री मिल गई थी। कोर्ट में यह साबित किया गया था कि पत्नी सिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia) से पीड़ित है। तलाक के बाद पति ने 2008 में ही दूसरी शादी कर ली और उसकी एक बेटी भी है।

वर्ष 2011 में, पत्नी ने दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 127 के तहत भरण-पोषण बढ़ाने के लिए याचिका दायर की। फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने 12 जुलाई 2017 को अपने फैसले में भरण-पोषण की राशि आवेदन की तारीख (13.01.2011) से 9,000 रुपये प्रति माह और आदेश की तारीख से 15,000 रुपये प्रति माह कर दी थी।

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पत्नी ने इस राशि को और बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट में चुनौती दी (CRL.REV.P. 950/2017)। इसके साथ ही, उसने एक अन्य याचिका (CRL.REV.P. 295/2021) दायर कर 6 अप्रैल 2021 के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें फैमिली कोर्ट ने कहा था कि पति ने पूरा बकाया चुका दिया है। पत्नी का दावा था कि बढ़ी हुई राशि पिछले भरण-पोषण के “अतिरिक्त” (in addition) थी, न कि उसे बदलकर तय की गई थी।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता (पत्नी) की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि निर्धारित भरण-पोषण राशि बहुत कम है, क्योंकि प्रतिवादी (पति) दुबई में एक योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट है और 6 लाख रुपये प्रति माह से अधिक कमाता है। यह भी दलील दी गई कि सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित होने के कारण पत्नी बेरोजगार है और अपने माता-पिता पर निर्भर है। वकील ने कहा कि पति “परस्पर विनाशकारी रुख” (mutually destructive stands) अपना रहा है – एक तरफ उसने तलाक के लिए पत्नी को पागल बताया, और अब भरण-पोषण से बचने के लिए उसे कमाने में सक्षम बता रहा है।

इसके विपरीत, प्रतिवादी (पति) के वकील ने तर्क दिया कि पत्नी के पास ‘एडवांस्ड डिप्लोमा इन कंप्यूटर एप्लीकेशंस’ की डिग्री है और वह शादी से पहले नौकरी करती थी। पति ने अपनी देनदारियों का हवाला देते हुए कहा कि उस पर दूसरी पत्नी, स्कूल जाने वाली बेटी और बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी है, साथ ही यूएई (UAE) में रहने की लागत बहुत अधिक है।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

1. पत्नी की कमाने की क्षमता पर विरोधाभासी तर्क अस्वीकार्य: हाईकोर्ट ने पति के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि पत्नी अपनी शैक्षणिक योग्यता के कारण कमाने में सक्षम है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पति ने पत्नी की मानसिक स्वास्थ्य स्थिति (सिज़ोफ्रेनिया) के आधार पर ही तलाक लिया था।

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न्यायमूर्ति शर्मा ने टिप्पणी की:

“यदि अदालत ने विवाह को भंग करने के लिए याचिकाकर्ता की मानसिक स्वास्थ्य स्थिति को एक वैध आधार के रूप में स्वीकार किया था, तो यह उम्मीद करना न तो उचित है और न ही तार्किक कि वह केवल अपनी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर स्वतंत्र रूप से अपना भरण-पोषण कर सकेगी। मानसिक बीमारी किसी व्यक्ति की नियमित रोजगार पाने और उसे बनाए रखने की क्षमता को काफी हद तक बाधित कर सकती है… एक पति जिसने पत्नी की मानसिक स्थिति का हवाला देकर तलाक हासिल किया है, वह बाद में यह तर्क देकर अपने वैधानिक दायित्व से नहीं बच सकता कि पत्नी के पास योग्यता है और वह कमा सकती है। इस तरह की दलील स्पष्ट रूप से अस्थिर है और इसे खारिज किया जाता है।”

2. आय और स्वैच्छिक कटौतियां: कोर्ट ने पति की वित्तीय क्षमता का आकलन करते हुए कहा कि वह दुबई में कमाता है। बिंदु चौधरी बनाम दीपक सुगा मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि विदेश में रहने की लागत अधिक होती है, लेकिन ऋण अदायगी (loan repayments) जैसी स्वैच्छिक वित्तीय प्रतिबद्धताएं जीवनसाथी को भरण-पोषण देने के वैधानिक दायित्व को कम नहीं कर सकतीं।

सुभाष बनाम ममता @ रक्षा के फैसले का जिक्र करते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि भरण-पोषण का आकलन “फ्री इनकम” (free income) पर किया जाता है, न कि स्वैच्छिक कटौती के बाद बची आय पर। कोर्ट ने पाया कि उचित कटौती के बाद भी पति के पास पर्याप्त अधिशेष राशि बचती है।

3. माता-पिता का सहयोग अप्रासंगिक: इस तर्क को खारिज करते हुए कि पत्नी के माता-पिता आर्थिक रूप से सक्षम हैं, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मनीष जैन बनाम आकांक्षा जैन के फैसले पर भरोसा जताया और कहा:

“सीआरपीसी की धारा 125 और 127 के तहत पत्नी के भरण-पोषण का दायित्व पति का व्यक्तिगत दायित्व है और इसे पत्नी के माता-पिता की वित्तीय क्षमता के आधार पर कम नहीं किया जा सकता है।”

4. 2017 के आदेश की व्याख्या: दूसरी याचिका (CRL.REV.P. 295/2021) के संबंध में, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 2017 के आदेश का विश्लेषण किया। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की व्याख्या को सही ठहराया कि 9,000 रुपये प्रति माह का भुगतान पिछली राशि के “बदले” (substitution) में था, न कि उसमें “जोड़कर”। कोर्ट ने आदेश की मनमानी व्याख्या करने के लिए पत्नी के प्रयास को “तुच्छ” (frivolous) और “तय हो चुके मुद्दों को फिर से खोलने” वाला बताया।

फैसला

हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं का निपटारा निम्नलिखित निर्देशों के साथ किया:

  1. भरण-पोषण में वृद्धि: याचिका संख्या 950/2017 में, कोर्ट ने माना कि मौजूदा 15,000 रुपये की राशि अपर्याप्त है। कोर्ट ने भरण-पोषण को बढ़ाकर 20,000 रुपये प्रति माह कर दिया, जो 12 जुलाई 2017 से देय होगा।
  2. लागू होने की तिथि: कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस निर्णय को सही ठहराया जिसमें 2007 के खारिज किए गए आवेदन के बजाय 2011 के नए आवेदन की तारीख से वृद्धि दी गई थी।
  3. निष्पादन याचिका खारिज: याचिका संख्या 295/2021 को खारिज कर दिया गया। एक स्पष्ट न्यायिक आदेश की गलत व्याख्या करके तुच्छ याचिका दायर करने के लिए कोर्ट ने पत्नी पर 10,000 रुपये का जुर्माना (cost) लगाया।
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केस डिटेल्स

  • केस का नाम: प्रीति शर्मा बनाम अनुज शर्मा
  • केस संख्या: CRL.REV.P. 950/2017 और CRL.REV.P. 295/2021
  • कोरम: न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा

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