सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को उस याचिका पर नई तीन-न्यायाधीशों की पीठ गठित करने का अनुरोध किया गया, जिसमें पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रोजेक्ट्स को पिछली तारीख से मंजूरी देने की वैधता को चुनौती दी गई है। इससे पहले नवंबर 2025 में बहुमत के फैसले ने ऐसे प्रोजेक्ट्स को भारी जुर्माने के साथ वैध बनाने का मार्ग प्रशस्त किया था।
सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को पर्यावरण नियमों के उल्लंघन करने वाले प्रोजेक्ट्स को पश्चातवर्ती (retrospective) पर्यावरणीय मंजूरी दिए जाने के मुद्दे पर पुनः सुनवाई के लिए नई तीन-न्यायाधीशों की पीठ गठित करने का आग्रह किया गया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष एक वकील ने इस मुद्दे को दोबारा तीन-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष लाने का अनुरोध किया। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने संक्षेप में कहा, “देखेंगे।”
यह मांग 18 नवंबर 2025 के उस फैसले के संदर्भ में आई है जिसमें तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने 2:1 के बहुमत से पर्यावरण नियमों का उल्लंघन कर चुके प्रोजेक्ट्स को भारी जुर्माना भरने की शर्त पर पिछली तारीख से पर्यावरण मंजूरी देने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने कहा था कि अन्यथा “हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हो जाएगा।”
इससे पहले, 16 मई 2025 को न्यायमूर्ति ए. एस. ओका (अब सेवानिवृत्त) और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ ने पर्यावरण मंत्रालय और संबंधित अधिकारियों को ऐसे प्रोजेक्ट्स को पिछली तारीख से मंजूरी देने से स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित कर दिया था।
हालांकि, गवई पीठ में न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान ने इस बहुमत से असहमति जताई और एक मजबूत असहमति (dissent) लिखते हुए कहा कि:
“पश्चातवर्ती पर्यावरणीय मंजूरी का सिद्धांत पर्यावरण कानून में अज्ञात और अस्वीकार्य (anathema) है। यह सतर्कता के सिद्धांत (precautionary principle) और सतत विकास (sustainable development) की आवश्यकता के भी विपरीत है।”
गवई पीठ के बहुमत ने 2017 की अधिसूचना और 2021 के कार्यालय ज्ञापन को प्रभावी रूप से पुनर्जीवित कर दिया, जिनमें उन प्रोजेक्ट्स को वैधता प्रदान करने की प्रक्रिया थी, जिन्होंने बिना अनिवार्य पूर्व पर्यावरण मंजूरी के निर्माण शुरू कर दिया था, बशर्ते वे जुर्माना भरें।
गवई पीठ ने यह भी निर्देश दिया था कि NGO ‘वनशक्ति’ सहित दायर याचिकाओं को पुनः सुनवाई के लिए उपयुक्त पीठ के समक्ष लाने हेतु रजिस्ट्री इस विषय को प्रशासनिक पक्ष पर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करे।
अब यह देखना अहम होगा कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस विवादास्पद नीति पर पुनर्विचार के लिए नई पीठ का गठन करता है, जो पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के बावजूद प्रोजेक्ट्स को वैधता देने का मार्ग प्रशस्त करती है।

