चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और पूरे राज्य में पुनः चुनाव कराने की मांग की है। यह याचिका मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष शुक्रवार को सुनवाई के लिए आने की संभावना है।
याचिका में पार्टी ने आरोप लगाया है कि बिहार सरकार ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं के खातों में ₹10,000 की राशि चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद ट्रांसफर की, जो स्पष्ट रूप से आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है। पार्टी का कहना है कि इस तरह की डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) से मतदाताओं को प्रभावित किया गया और चुनाव की निष्पक्षता पर आंच आई।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि वह चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 के तहत कार्रवाई करने का निर्देश दे:
- अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को चुनाव प्रक्रिया का पर्यवेक्षण और नियंत्रण करने का अधिकार है।
- धारा 123 के तहत “भ्रष्ट आचरण” की परिभाषा दी गई है, जिसमें रिश्वत देना या प्रलोभन देना शामिल है।
बिहार में हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने 243 में से 202 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी। विपक्षी INDIA गठबंधन को मात्र 35 सीटें मिलीं, जिनमें कांग्रेस की 6 सीटें शामिल हैं। जन सुराज पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी और अधिकांश उम्मीदवारों की ज़मानत जब्त हो गई।
मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना बिहार सरकार की एक योजना है, जिसके तहत महिलाओं को स्वरोजगार के लिए ₹10,000 की शुरुआती सहायता दी जाती है। सरकार का दावा है कि यह योजना महिला सशक्तिकरण और छोटे व्यवसायों को बढ़ावा देने के लिए है, लेकिन जन सुराज पार्टी ने आरोप लगाया है कि इसका उपयोग मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए किया गया।
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्या निर्णय देता है, इसका असर न सिर्फ बिहार के चुनाव पर पड़ेगा, बल्कि देशभर में चुनावों के दौरान सरकारी योजनाओं के उपयोग को लेकर भी एक मिसाल बन सकता है।

