पूर्णमतगणना के बाद जारी ‘निर्वाचन प्रमाण पत्र’ को चुनौती देने वाली याचिका पोषणीय नहीं, यदि मूल आदेश के खिलाफ अपील लंबित हो: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कायस्थ पाठशाला, प्रयागराज के अध्यक्ष पद के चुनाव से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि चुनाव में पुनर्मतगणना (recount) का आदेश देने वाले मूल निर्णय के खिलाफ कोई वैधानिक अपील लंबित है, तो केवल उसके परिणामस्वरुप जारी किए गए ‘निर्वाचन प्रमाण पत्र’ को रिट याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी जा सकती।

मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने डॉ. सुशील कुमार सिन्हा द्वारा दायर विशेष अपील को खारिज करते हुए कहा कि सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत निर्वाचन प्रमाण पत्र का अपने आप में कोई स्वतंत्र विधिक दर्जा नहीं है, और पदाधिकारी की शक्ति धारा 4(1) के तहत पंजीकृत सूची से प्राप्त होती है, जिसे अपीलकर्ता ने चुनौती नहीं दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद कायस्थ पाठशाला, प्रयागराज (एक पंजीकृत सोसाइटी) के अध्यक्ष पद के चुनाव से संबंधित है। 25 दिसंबर 2023 को हुए चुनाव में अपीलकर्ता डॉ. सुशील कुमार सिन्हा को 26 दिसंबर 2023 को निर्वाचित घोषित किया गया था।

प्रतिवादी संख्या 4, चौधरी राघवेंद्र नाथ सिंह ने इस चुनाव को सहायक रजिस्ट्रार के समक्ष चुनौती दी, जिन्होंने मामला विहित प्राधिकारी (एसडीएम, सदर, प्रयागराज) को भेज दिया। विहित प्राधिकारी ने 22 मार्च 2025 को सहायक रजिस्ट्रार को मतों की पुनर्मतगणना करने और परिणाम घोषित करने का निर्देश दिया।

इस आदेश के अनुपालन में, सहायक रजिस्ट्रार ने पुनर्मतगणना कराई और 28 मार्च 2025 को एक नया निर्वाचन प्रमाण पत्र जारी किया, जिसमें चौधरी राघवेंद्र नाथ सिंह को निर्वाचित अध्यक्ष घोषित किया गया और अपीलकर्ता का पूर्व निर्वाचन प्रमाण पत्र रद्द कर दिया गया।

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अपीलकर्ता ने इस प्रमाण पत्र को रिट याचिका (Writ-C No. 9752 of 2025) में चुनौती दी, जिसे एकल न्यायाधीश (Single Judge) ने 15 नवंबर 2025 को खारिज कर दिया। इसके साथ ही, अपीलकर्ता ने विहित प्राधिकारी के 22 मार्च 2025 के मूल आदेश के खिलाफ कमिश्नर, प्रयागराज के समक्ष धारा 25(1) के तहत एक वैधानिक अपील भी दायर की है, जो अभी विचाराधीन है।

अपीलकर्ता के तर्क

अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल तिवारी ने तर्क दिया कि एकल न्यायाधीश ने अधिनियम की धारा 25(2) के प्रावधानों पर विचार नहीं किया। उनका कहना था कि पुनर्मतगणना के बाद नए चुनाव कराए बिना सीधे एक प्रत्याशी को दूसरे से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता।

यह भी दलील दी गई कि सहायक रजिस्ट्रार के पास चुनाव रद्द करने या प्रतिवादी को निर्वाचित घोषित करने का अधिकार क्षेत्र नहीं था। केवल विहित प्राधिकारी ही चुनाव विवादों का निस्तारण कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि विहित प्राधिकारी और सहायक रजिस्ट्रार ने वह शक्तियां ग्रहण कर लीं जो केवल लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत हाईकोर्ट के पास होती हैं, जो सोसाइटी के मामलों में लागू नहीं होतीं।

प्रतिवादियों का पक्ष

प्रतिवादी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर.के. ओझा ने तर्क दिया कि शुरुआती चुनाव में 148 वैध मतों की गिनती नहीं की गई थी, जिसके कारण पुनर्मतगणना आवश्यक थी। पुनर्मतगणना में अपीलकर्ता 77 मतों से हार गए थे।

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प्रतिवादियों ने जोर देकर कहा कि सहायक रजिस्ट्रार ने पुनर्मतगणना के परिणाम के आधार पर 2 अप्रैल 2025 को अधिनियम की धारा 4(1) के तहत पदाधिकारियों की सूची पंजीकृत कर दी थी और प्रतिवादी के हस्ताक्षरों को सत्यापित कर दिया था। चूंकि अपीलकर्ता ने धारा 4(1) के तहत हुए पंजीकरण को चुनौती नहीं दी और न ही पुनर्मतगणना के परिणाम को, इसलिए उन्हें कोई राहत नहीं दी जा सकती।

कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि विहित प्राधिकारी ने स्पष्ट रूप से सहायक रजिस्ट्रार को पुनर्मतगणना करने और परिणाम घोषित करने का निर्देश दिया था, जिसका पालन करने के लिए सहायक रजिस्ट्रार बाध्य थे।

कोर्ट ने इस बात पर विशेष बल दिया कि विहित प्राधिकारी का 22 मार्च 2025 का आदेश रिट याचिका का विषय नहीं था और उसके खिलाफ वैधानिक अपील कमिश्नर के समक्ष लंबित है। इसलिए, हाईकोर्ट उस मूल आदेश की वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता।

न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा:

“यह स्वीकार्य तथ्य है कि विहित प्राधिकारी द्वारा पारित 22.03.2025 का आदेश रिट याचिका का विषय नहीं है और उक्त आदेश के विरुद्ध एक वैधानिक अपील अभी भी कमिश्नर के समक्ष लंबित है। इसलिए, न तो रिट कोर्ट और न ही यह अपीलीय कोर्ट ऐसा कोई निष्कर्ष निकाल सकता है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से विहित प्राधिकारी द्वारा पारित आदेश को रद्द करने या बनाए रखने का परिणाम दे।”

कोर्ट ने ‘निर्वाचन प्रमाण पत्र’ की कानूनी स्थिति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:

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“ऐसा कुछ भी नहीं दिखाया गया है कि अधिनियम/नियमों में ऐसे किसी निर्वाचन प्रमाण पत्र को जारी करने की आवश्यकता है, इसलिए, हमारी राय में, इसका अपने आप में कोई विधिक दर्जा नहीं है… प्रमाण पत्र जारी करना, चाहे उसका जो भी मूल्य हो, निर्वाचित अध्यक्ष को किसी भी तरह से सशक्त नहीं करता है; शक्ति अधिनियम की धारा 4(1) के तहत पदाधिकारियों के पंजीकरण पर आधारित होती है।”

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि अपीलकर्ता ने पदाधिकारियों की सूची के पंजीकरण (जो धारा 4(1-ए) के तहत अपील योग्य है) को चुनौती नहीं दी और मूल आदेश के खिलाफ अपील लंबित है, इसलिए केवल “मध्यवर्ती घटना” (निर्वाचन प्रमाण पत्र) को चुनौती देना आधारहीन है। तदनुसार, विशेष अपील खारिज कर दी गई।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: डॉ. सुशील कुमार सिन्हा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य
  • केस नंबर: स्पेशल अपील संख्या 1195 ऑफ 2025
  • बेंच: मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र
  • अपीलकर्ता के अधिवक्ता: अनिल तिवारी (वरिष्ठ अधिवक्ता), अदीबा खातून, उदय प्रताप सिंह, अनमोल बर्तारिया
  • प्रतिवादियों के अधिवक्ता: आर.के. ओझा (वरिष्ठ अधिवक्ता), प्रभाकर अवस्थी (वरिष्ठ अधिवक्ता), राम एम. कौशिक, अनुज श्रीवास्तव, वरद नाथ, ए.के. गोयल (ए.सी.एस.सी.), जगदीश पाठक (एस.सी.)

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