बच्चों की कस्टडी केवल ‘कल्याण’ के अमूर्त सिद्धांत पर तय नहीं हो सकती; माता-पिता का आचरण, शिक्षा और जीवन स्तर भी महत्वपूर्ण: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू और कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें दो नाबालिग बच्चों की कस्टडी मां को सौंपी गई थी। शीर्ष अदालत ने मामले को पुनर्विचार के लिए हाईकोर्ट को वापस भेजते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने बच्चों के ‘कल्याण’ के सिद्धांत से परे महत्वपूर्ण कारकों—जैसे माता-पिता का आचरण, बच्चों की शिक्षा में व्यवधान और उनकी जीवन स्थितियों—की अनदेखी की है।

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने मोहताशेम बिल्लाह मलिक बनाम सना आफताब (सिविल अपील संख्या 2026) में फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह मामले का निपटारा तेजी से, अधिमानतः चार महीने के भीतर करे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील एक वैवाहिक विवाद से उत्पन्न हुई थी। अपीलकर्ता (पति) और प्रतिवादी (पत्नी) दोनों भारतीय नागरिक हैं, जिनका विवाह 2015 में श्रीनगर में हुआ था और वे कतर (Qatar) में रहते थे। उनके दो बेटे हैं—मलिक करीम बिल्लाह (जन्म 2017) और मलिक रहीम बिल्लाह (जन्म 2019)।

वैवाहिक कलह के बाद, कतर की फैमिली कोर्ट ने 29 मार्च, 2022 को तलाक की डिक्री दी थी। कतर की अदालत ने शुरू में बच्चों की कस्टडी मां को दी थी, जबकि संरक्षकता (Guardianship) और बच्चों के पासपोर् पिता के पास रहने का आदेश दिया था।

विवाद तब गहरा गया जब पत्नी 17/18 अगस्त, 2022 को पिता की सहमति के बिना और उनके पास मूल पासपोर्ट होने के बावजूद, कथित तौर पर बच्चों के लिए नए पासपोर्ट बनवाकर उन्हें कतर से भारत ले आई। पति ने जम्मू और कश्मीर हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की। इसके बाद एक लेटर्स पेटेंट अपील (LPA) दायर की गई, जिसका निपटारा 1 दिसंबर, 2022 को मां की इस ‘वचनबद्धता’ (Undertaking) पर किया गया कि वह जनवरी 2023 में स्कूल खुलने से पहले कतर वापस लौट जाएगी।

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हालांकि, पत्नी ने इस वचनबद्धता का उल्लंघन किया। इसके परिणाम गंभीर थे:

  1. कतर कोर्ट की कार्रवाई: 31 अक्टूबर, 2023 को कतर की अदालत ने बच्चों को अधिकार क्षेत्र से बाहर ले जाने के कारण मां की कस्टडी रद्द कर दी और पिता को कस्टडी सौंप दी।
  2. अवमानना कार्यवाही: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने वचनबद्धता का उल्लंघन करने के लिए 6 अगस्त, 2024 को पत्नी को अदालत की अवमानना (Contempt) का दोषी ठहराया।

इसके बाद पति ने श्रीनगर की फैमिली कोर्ट में गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 25 के तहत कस्टडी के लिए याचिका दायर की। फैमिली कोर्ट ने 2 जनवरी, 2025 को उसे कस्टडी दे दी। लेकिन अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 8 सितंबर, 2025 को इस फैसले को पलट दिया और कस्टडी मां को बहाल कर दी, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट में दलीलें

अपीलकर्ता-पति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने तर्क दिया कि पत्नी ने बच्चों को शैक्षणिक सत्र के बीच में कतर से हटाकर उनकी पढ़ाई बाधित की, जहां वे एक प्रतिष्ठित ब्रिटिश करिकुलम स्कूल में पढ़ रहे थे। उन्होंने कहा कि दो साल तक बच्चे स्कूल नहीं गए और श्रीनगर में उनकी उपस्थिति बहुत खराब रही। उन्होंने यह भी कहा कि:

  • मां बिना पिता की सहमति या मूल पासपोर्ट के बच्चों को भारत लाने का कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दे सकी।
  • बच्चे, विशेष रूप से बड़ा बेटा, अपनी पसंद बताने में सक्षम हैं और उन्होंने पिता के साथ रहने की इच्छा जताई है।
  • मां की नौकरी में काफी यात्रा करनी पड़ती है, जबकि पिता का काम लचीला (flexible) है जिससे वे बच्चों की देखभाल कर सकते हैं।
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प्रतिवादी-पत्नी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अल्ताफ हुसैन नाइक ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट के फैसले में कोई त्रुटि नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कस्टडी के मामलों में “बच्चों का कल्याण सर्वोपरि” होता है और पार्टियों की वित्तीय क्षमता या आचरण इस हित पर हावी नहीं होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हालांकि बच्चों का कल्याण वास्तव में सर्वोपरि विचार है, लेकिन हाईकोर्ट ने यह मानने में गलती की कि पार्टियों का आचरण, वित्तीय क्षमता और जीवन स्तर जैसे कारक “बहुत प्रासंगिक नहीं” हैं।

मां के आचरण पर: कोर्ट ने नोट किया कि हाईकोर्ट ने पत्नी के आचरण के प्रभाव पर विचार नहीं किया। पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस मिथल ने कहा:

“हाईकोर्ट ने अपनी राय में इस तथ्य का उल्लेख तो किया कि पत्नी ने पिता की सहमति के बिना… और फर्जी या डुप्लिकेट पासपोर्ट बनवाकर बच्चों को भारत ले आई… लेकिन निचली अदालत ने मां को कस्टडी देते समय इस आचरण के प्रभाव पर विचार नहीं किया।”

कतर कोर्ट के आदेश पर: पीठ ने इस बात पर प्रकाश डाला कि हाईकोर्ट ने कतर कोर्ट के 31 अक्टूबर, 2023 के आदेश की अनदेखी की, जिसने मां की कस्टडी को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि कस्टडी का रद्दीकरण एक महत्वपूर्ण सामग्री थी, और वास्तव में पत्नी के पक्ष में कस्टडी का कोई भी आदेश अस्तित्व में नहीं था।

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अदालत की अवमानना पर: सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि हाईकोर्ट ने उस अवमानना आदेश की भी अनदेखी की, जिसमें पत्नी को बच्चों को कतर वापस ले जाने की अपनी वचनबद्धता का उल्लंघन करने का दोषी ठहराया गया था।

“उक्त अवमानना आदेश अंतिम रूप ले चुका है और निर्णायक है, और इस प्रकार, प्रतिवादी-पत्नी अपने दोषी आचरण से पीछे नहीं हट सकती।”

बच्चों की पसंद: कोर्ट ने एक मीडिएशन रिपोर्ट का हवाला दिया जिसमें दोनों बच्चों ने पिता के साथ जाने का झुकाव दिखाया था। छोटा बच्चा “स्पष्ट रूप से परेशान” था और पिता के साथ जाने की इच्छा व्यक्त कर रहा था। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने इन भौतिक पहलुओं को “पूरी तरह से नजरअंदाज” कर दिया।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के 8 सितंबर, 2025 के फैसले को रद्द कर दिया।

“उपरोक्त तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, हमारा विचार है कि हाईकोर्ट द्वारा पारित निर्णय और आदेश… कानून में कायम नहीं रह सकता और इसे रद्द किया जाता है।”

मामले को गुण-दोष के आधार पर पुनर्विचार के लिए हाईकोर्ट को वापस (remand) भेज दिया गया है, साथ ही निर्देश दिया गया है कि मामले का निर्णय तेजी से, अधिमानतः चार महीनों के भीतर किया जाए।

केस डिटेल्स:

  • केस टाइटल: मोहताशेम बिल्लाह मलिक बनाम सना आफताब
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 2026 (एस.एल.पी. (सी) संख्या 28934/2025 से उत्पन्न)
  • कोरम: जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी

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