2015 से पहले मध्यस्थ नियुक्त करने का आदेश ‘रेस ज्यूडिकाटा’ के रूप में लागू होता है; मध्यस्थता समझौते की वैधता को दोबारा चुनौती नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996) के 2015 के संशोधन से पूर्व, धारा 11 के तहत पारित मध्यस्थ नियुक्त करने का आदेश ‘रेस ज्यूडिकाटा’ (Res Judicata) के रूप में कार्य करता है। यदि ऐसा आदेश अंतिम हो जाता है, तो मध्यस्थता समझौते (Arbitration Agreement) के अस्तित्व और वैधता को बाद में आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल या अन्य कार्यवाही में चुनौती नहीं दी जा सकती।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एक आर्बिट्रल अवॉर्ड को इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि अनुबंध का क्लॉज 23 एक मध्यस्थता क्लॉज नहीं था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील मेसर्स एमिनेंट कॉलोनाइजर्स प्राइवेट लिमिटेड (अपीलकर्ता) और राजस्थान हाउसिंग बोर्ड (प्रतिवादी) के बीच एक विवाद से उत्पन्न हुई थी।

  • सिविल अपील संख्या 753/2026: अपीलकर्ता को 8 जुलाई, 2009 को जयपुर में एचआईजी (HIG) घरों के निर्माण का कार्य सौंपा गया था। लागत में वृद्धि (escalation costs) के लगभग 18.95 लाख रुपये के भुगतान को लेकर विवाद हुआ।
  • सिविल अपील संख्या 754/2026: अपीलकर्ता को 2007 में एलआईजी (LIG) फ्लैटों के निर्माण का कार्य मिला था, जिसमें एस्केलेशन बिल और पेनल्टी रिफंड को लेकर विवाद हुआ।

विवाद सुलझने पर, अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट के समक्ष धारा 11 के तहत आवेदन दायर किया। 23 मई, 2014 को (2015 के संशोधन से पहले), हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने आवेदन स्वीकार करते हुए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया। प्रतिवादियों ने इस नियुक्ति आदेश को चुनौती नहीं दी और यह अंतिम हो गया।

इसके बाद, अपीलकर्ता के पक्ष में अवॉर्ड पारित किए गए। प्रतिवादियों ने धारा 34 के तहत इन अवॉर्ड्स को चुनौती दी। कमर्शियल कोर्ट ने पिछले हाईकोर्ट के फैसलों (मोहम्मद आरिफ कॉन्ट्रैक्टर और मैसर्स मरुधर कंस्ट्रक्शन) का हवाला देते हुए अवॉर्ड को रद्द कर दिया और कहा कि क्लॉज 23 मध्यस्थता क्लॉज नहीं है। हाईकोर्ट ने भी कमर्शियल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि मध्यस्थ की नियुक्ति एसबीपी एंड कंपनी बनाम पटेल इंजीनियरिंग लिमिटेड (2005) के फैसले द्वारा शासित शासन के दौरान हुई थी, यानी 23 अक्टूबर, 2015 के विधायी संशोधनों से पहले। उस समय धारा 11 कोर्ट को मध्यस्थता समझौते के “अस्तित्व” और “वैधता” को निर्धारित करना होता था। चूंकि प्रतिवादियों ने नियुक्ति आदेश को स्वीकार कर लिया था, इसलिए उन्होंने आपत्ति करने का अधिकार खो दिया है।

वहीं, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि धारा 11 के तहत आदेश का कोई मिसाल (precedential) मूल्य नहीं था और इसमें विशेष रूप से क्लॉज 23 की वैधता पर कोई फैसला नहीं सुनाया गया था। इसलिए, यह प्रश्न आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल द्वारा तय किया जा सकता था।

कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

जस्टिस के.वी. विश्वनाथन ने पीठ के लिए निर्णय लिखते हुए स्पष्ट किया कि 2015 का संशोधन इस मामले में लागू नहीं होता क्योंकि मध्यस्थ की नियुक्ति 2015 से पहले हुई थी।

एसबीपी एंड कंपनी (SBP & Co.) का सिद्धांत: कोर्ट ने एसबीपी एंड कंपनी बनाम पटेल इंजीनियरिंग लिमिटेड (2005) के संविधान पीठ के फैसले पर भरोसा जताया। कोर्ट ने कहा:

“एसबीपी (सुप्रा) में सात-न्यायाधीशों की पीठ के स्पष्ट निर्णय को देखते हुए, हमें यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि धारा 34 कोर्ट ने क्लॉज 23 के अस्तित्व और वैधता की जांच करने में गलती की… मध्यस्थ की नियुक्ति मध्यस्थता अधिनियम में संशोधन से पहले हुई थी।”

कोर्ट ने दोहराया कि 2015 से पहले, चीफ जस्टिस या नामित जज न्यायिक शक्ति (judicial power) का प्रयोग करते थे, प्रशासनिक नहीं। वे यह तय करने के लिए बाध्य थे कि क्या एक वैध मध्यस्थता समझौता मौजूद है। ऐसा निष्कर्ष पक्षों पर बाध्यकारी होता है।

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निहित होल्डिंग (Implied Holding) और अंतिमता: सुप्रीम कोर्ट ने कमर्शियल कोर्ट के इस विचार को खारिज कर दिया कि धारा 11 के आदेश का कोई मूल्य नहीं था। पीठ ने कहा:

“पक्षकार इस आधार पर आगे बढ़े कि क्लॉज 23 एक मध्यस्थता क्लॉज था… एकमात्र संभावित निष्कर्ष यह है कि भले ही यह बहुत स्पष्ट न हो, मध्यस्थ नियुक्त करने वाले आदेश में मध्यस्थता समझौते के अस्तित्व और वैधता के बारे में एक निहित होल्डिंग (implied holding) है। यदि ऐसा नहीं होता, तो नियुक्ति नहीं की जा सकती थी।”

रेस ज्यूडिकाटा बनाम मिसाल (Precedent): सुप्रीम कोर्ट ने ‘मिसाल’ (जो सभी पर लागू होती है – in rem) और ‘रेस ज्यूडिकाटा’ (जो उन्हीं पक्षों के बीच लागू होती है – in personam) के बीच अंतर स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि कमर्शियल कोर्ट ने अन्य मामलों (मोहम्मद आरिफ आदि) का हवाला देकर इस मामले में पक्षों के बीच पारित विशिष्ट धारा 11 के आदेश को नकार कर गलती की।

“वर्तमान मामले में, जब विद्वान एकल न्यायाधीश ने धारा 11 के आवेदन पर विचार किया और संविदात्मक दस्तावेज की व्याख्या की, तो उनके पास ऐसा करने का अधिकार क्षेत्र था। सही हो या गलत, वह निर्णय बाध्यकारी होना चाहिए… मध्यस्थ नियुक्त करने का आदेश स्पष्ट रूप से ‘रेस ज्यूडिकाटा’ के रूप में कार्य करता है।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 20 फरवरी, 2020 के हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. कमर्शियल कोर्ट और हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाकर गलती की कि क्लॉज 23 एक मध्यस्थता क्लॉज नहीं था, क्योंकि यह मुद्दा ‘रेस ज्यूडिकाटा’ द्वारा बाधित था।
  2. कमर्शियल कोर्ट, जयपुर (न्यायाधीश संख्या 3) को निर्देश दिया गया कि वह धारा 34 के आवेदनों को मध्यस्थता क्लॉज की वैधता के अलावा अन्य आधारों पर सुने।
  3. चूंकि अवॉर्ड 2015 और 2016 के हैं, इसलिए कमर्शियल कोर्ट को तीन महीने के भीतर मामलों का निपटारा करने का निर्देश दिया गया।
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केस डिटेल्स

  • केस का नाम: मैसर्स एमिनेंट कॉलोनाइजर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम राजस्थान हाउसिंग बोर्ड और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 753/2026 (एस.एल.पी. (सी) संख्या 8299/2021 से उद्भूत) और सिविल अपील संख्या 754/2026
  • कोरम: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन

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