सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि तलाक के बाद पत्नी को उसी जीवन स्तर के साथ जीने का अधिकार है जैसा वह शादी के दौरान अपने पति के घर में जी रही थी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि पत्नी शिक्षित है या उसे माता-पिता का सहयोग प्राप्त है, पति का यह दायित्व समाप्त नहीं हो जाता कि वह उसे गरिमापूर्ण जीवन जीने में मदद करे।
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने निचली अदालतों द्वारा तय की गई गुजारा भत्ते की राशि को “बेहद अपर्याप्त” मानते हुए इसे 15,000 रुपये से बढ़ाकर 30,000 रुपये प्रति माह कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पति की आर्थिक क्षमता और बढ़ती महंगाई को देखते हुए यह बढ़ोतरी आवश्यक है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक वैवाहिक विवाद से जुड़ा है जिसमें अपीलकर्ता (पत्नी) और प्रतिवादी (पति) का विवाह 13 नवंबर 1994 को हुआ था। 1997 में उनके एक बेटे का जन्म हुआ। मतभेदों के चलते दोनों 2011 से अलग रहने लगे।
पेशे से डॉक्टर पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की अर्जी दाखिल की। फैमिली कोर्ट, भोपाल ने 30 नवंबर 2015 को तलाक की डिक्री मंजूर कर दी और पत्नी को 15,000 रुपये मासिक स्थायी गुजारा भत्ता और 50,000 रुपये की एकमुश्त राशि देने का आदेश दिया।
कम गुजारा भत्ते से असंतुष्ट पत्नी ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (जबलपुर बेंच) का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने 29 अगस्त 2018 को उसकी अपील खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट में पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि प्रतिवादी एक डॉक्टर है और उसकी मासिक आय लगभग 1,60,000 रुपये है। इसके अलावा, वह निजी प्रैक्टिस और किराये से भी आय अर्जित करता है, जिस पर हाईकोर्ट ने गौर नहीं किया। वकील ने यह भी कहा कि पति ने दूसरी शादी कर ली है और वह एक संपन्न जीवन जी रहा है, इसलिए 15,000 रुपये की राशि बहुत कम है।
दूसरी ओर, पति के वकील ने दलील दी कि पत्नी उच्च शिक्षित है और अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है। पति ने दावा किया कि वह अपने बेटे की पढ़ाई का खर्च उठा रहा है और नियमित रूप से गुजारा भत्ता दे रहा है। उसने यह भी कहा कि उसकी दूसरी शादी भी टूट चुकी है और उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह बढ़ी हुई राशि का भुगतान कर सके।
पत्नी ने इन दावों का खंडन किया और कोर्ट को बताया कि मध्यस्थता (Mediation) के दौरान पति 30,000 रुपये देने पर सहमत हुआ था, लेकिन बाद में वह अपनी बात से मुकर गया।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए कहा कि शादी भावनात्मक जुड़ाव और आपसी सहयोग पर आधारित होती है। पीठ ने कहा:
“जब ऐसी शादी टूटती है, तो पति का यह दायित्व समाप्त नहीं हो जाता कि वह यह सुनिश्चित करे कि पत्नी गरिमा के साथ जीवन व्यतीत कर सके, केवल इसलिए कि वह शिक्षित है या उसे माता-पिता का सहारा है। तलाक के बाद, पत्नी उस जीवन स्तर के अनुरूप जीने की हकदार है जिसकी वह शादी के दौरान आदी थी।”
कोर्ट ने भुवन मोहन सिंह बनाम मीना (2015) के फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि ‘भरण-पोषण’ का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं है, बल्कि गरिमा के साथ जीना है। पीठ ने कहा कि पत्नी को ऐसी स्थिति में नहीं छोड़ा जा सकता जहां वह केवल अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करे।
इसके अलावा, रजनीश बनाम नेहा (2021) के दिशा-निर्देशों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि पति की वित्तीय क्षमता, उसकी वास्तविक आय और पत्नी की उचित जरूरतों को संतुलित करना आवश्यक है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पति शारीरिक रूप से सक्षम है और उसके पास शैक्षणिक योग्यता है, तो वह आय का स्रोत न होने का बहाना बनाकर अपनी पत्नी के भरण-पोषण की नैतिक जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पति की कमाई की क्षमता पर्याप्त है। कोर्ट ने “महंगाई के प्रभाव और पिछले एक दशक में जीवन यापन की लागत में वृद्धि” को ध्यान में रखते हुए निचली अदालतों द्वारा तय की गई राशि को नाकाफी माना।
फैसला
सुनवाई के दौरान, जब कोर्ट ने गुजारा भत्ता बढ़ाने का संकेत दिया, तो दोनों पक्षों के वकील 30,000 रुपये की राशि पर सहमत हो गए। सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- स्थायी गुजारा भत्ता 15,000 रुपये से बढ़ाकर 30,000 रुपये प्रति माह किया जाता है।
- यह बढ़ी हुई राशि स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दायर करने की तारीख, यानी 2 जुलाई 2021 से लागू होगी।
- पति को हर महीने की 5 तारीख तक 30,000 रुपये का भुगतान करना होगा, जिसकी शुरुआत 5 फरवरी 2026 से होगी।
- जुलाई 2021 से जनवरी 2026 तक का बकाया (कुल 8,10,000 रुपये) पति को या तो एकमुश्त या अगले चार वर्षों में किस्तों में चुकाना होगा।

