मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि यदि किसी मृतक कर्मचारी के एक आश्रित (भाई) की अनुकंपा नियुक्ति आपराधिक रिकॉर्ड के कारण निरस्त कर दी जाती है, तो यह दूसरे पात्र आश्रित (बहन) को नियुक्ति के लिए आवेदन करने से नहीं रोकता है। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी ‘नियुक्ति देने’ और ‘नियुक्ति निरस्त होने’ के बीच के अंतर को समझने में विफल रहे हैं।
जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता प्रियंका पांडेय द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए सक्षम प्राधिकारी को उनकी नियुक्ति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने शासन द्वारा जारी उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें भाई की पूर्व में हुई चयन प्रक्रिया का हवाला देकर बहन का आवेदन खारिज कर दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता प्रियंका पांडेय ने हाईकोर्ट में प्रतिवादी (शासन) द्वारा जारी 30 अक्टूबर 2023 के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के तहत उनकी अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि वे 18 अगस्त 2008 की अनुकंपा नियुक्ति नीति की कंडिका 3, 13.1 और 13.2 के तहत अपात्र हैं।
मामले के तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता के पिता स्वर्गीय श्री सीताराम पांडेय, जो राजस्व निरीक्षक के पद पर कार्यरत थे, का निधन 10 दिसंबर 2010 को सेवाकाल के दौरान हो गया था। पिता की मृत्यु के बाद, याचिकाकर्ता के भाई संजीव पांडेय ने जनवरी 2011 में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। चयन के बाद उन्हें पटवारी पद के लिए प्रशिक्षण पर भेजा गया, जो 1 जुलाई 2014 से शुरू हुआ।
हालांकि, बाद में पुलिस सत्यापन (Police Verification) के दौरान पता चला कि भाई के खिलाफ जुआ अधिनियम (Gambling Act) की धारा 13 के तहत 2008 और 2009 में दो मामले दर्ज थे, जिनमें उन पर 100 रुपये का जुर्माना लगाया गया था। इस रिपोर्ट के आधार पर 8 जनवरी 2015 को भाई की उम्मीदवारी निरस्त कर दी गई।
इसके बाद, याचिकाकर्ता की मां ने 1 अक्टूबर 2016 को अपनी बेटी (याचिकाकर्ता) की नियुक्ति के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। शासन ने इस आवेदन को सात साल की समय सीमा और इस आधार पर खारिज कर दिया कि एक बार परिवार के किसी सदस्य को नियुक्ति मिलने के बाद उसे दूसरे को अंतरित (Transfer) नहीं किया जा सकता।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्री प्रसन्न आर. भटनागर ने तर्क दिया कि अनुकंपा नियुक्ति के दावे को खारिज करने वाला आदेश मनमाना और नीति के विपरीत है। उन्होंने कहा कि परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य की मृत्यु के बाद परिवार आर्थिक तंगी से गुजर रहा है।
अधिवक्ता ने जोर देकर कहा कि याचिकाकर्ता के भाई को वास्तव में कभी ‘नियुक्त’ माना ही नहीं जा सकता क्योंकि पुलिस सत्यापन के बाद उनकी उम्मीदवारी निरस्त कर दी गई थी। इसलिए, नीति की कंडिका 13.1 (पुन: नियुक्ति पर रोक) और 13.2 (नियुक्ति के अंतरण पर रोक) इस मामले में लागू नहीं होतीं। देरी के लिए उन्होंने विभाग की लंबी प्रक्रिया को जिम्मेदार ठहराया।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता सुश्री स्वाति उखले ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता के भाई को अनुकंपा नियुक्ति प्रदान की जा चुकी थी और वर्तमान स्थिति उनके स्वयं के आचरण के कारण उत्पन्न हुई है। उन्होंने कहा कि नीति के अनुसार, एक बार नियुक्ति प्रदान किए जाने के बाद उसे किसी अन्य परिवार के सदस्य को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन
जस्टिस जय कुमार पिल्लई ने रिकॉर्ड और 2008 की नीति का विस्तृत परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि भाई का आवेदन और बाद में मां द्वारा याचिकाकर्ता के लिए 1 अक्टूबर 2016 को दिया गया आवेदन, दोनों ही कर्मचारी की मृत्यु (2010) के सात वर्ष की समय सीमा के भीतर थे। अतः कंडिका 3 का उल्लंघन नहीं हुआ है।
कंडिका 13.1 और 13.2 पर शासन की दलीलों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि ये प्रावधान तब लागू होते हैं जब किसी को वैध रूप से नियुक्ति मिल चुकी हो। कंडिका 13.1 एक बार नियुक्ति मिलने के बाद दूसरी नियुक्ति को रोकती है, और 13.2 नियुक्ति को किसी और को ट्रांसफर करने से रोकती है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
“चूंकि याचिकाकर्ता के भाई की अनुकंपा नियुक्ति निरस्त कर दी गई थी, इसका सीधा अर्थ है कि मृतक कर्मचारी के परिवार के किसी भी सदस्य को अंततः अनुकंपा आधार पर नियुक्त नहीं किया गया था। परिणामस्वरूप, नीति की कंडिका 13.1 और 13.2 का प्रयोग पूरी तरह से भ्रामक है।”
कोर्ट ने अधिकारियों की प्रक्रियात्मक लापरवाही को भी रेखांकित किया। कंडिका 13.3 का हवाला देते हुए, जो नियुक्ति से पहले चरित्र सत्यापन अनिवार्य करती है, कोर्ट ने कहा:
“वर्तमान मामले के तथ्यों में, अधिकारियों ने पर्याप्त अवसर होने के बावजूद, याचिकाकर्ता के भाई को नियुक्त करने और प्रशिक्षण के लिए प्रतिनियुक्त करने से पहले चरित्र सत्यापन प्रक्रिया पूरी नहीं की। उनकी अनुकंपा नियुक्ति को बाद में निरस्त किया गया। इसलिए, देरी और प्रक्रियात्मक चूक स्पष्ट रूप से प्रतिवादियों की है, न कि याचिकाकर्ता या उनके परिवार की।”
कोर्ट ने माना कि अस्वीकृति आदेश इस “गलत धारणा” पर आधारित था कि परिवार पहले ही अनुकंपा नियुक्ति का लाभ उठा चुका है, जो कि रिकॉर्ड पर तथ्यात्मक रूप से गलत है।
निर्णय
हाईकोर्ट ने 30 अक्टूबर 2023 के impugned आदेश (विवादित आदेश) को रद्द कर दिया। कोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ता के अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन पर 18 अगस्त 2008 की नीति के अनुसार और कोर्ट की टिप्पणियों के आलोक में 60 दिनों के भीतर निर्णय लें।
केस विवरण
केस टाइटल: प्रियंका पांडेय बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य
केस नंबर: रिट याचिका संख्या 31332/2023
पीठ जज: जस्टिस जय कुमार पिल्लई

